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भारत–चीन सीमा वार्ता

Lokesh Pal May 30, 2026 02:15 7 0

संदर्भ

भारत और चीन ने सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय हेतु कार्य-तंत्र (WMCC) की 35वीं बैठक आयोजित की, जो जुलाई 2025 के बाद सीमा स्थिति पर पहला उच्च-स्तरीय राजनयिक संवाद है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के बारे में

  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) भारत और चीन के बीच वास्तविक (De facto) सीमा है, जिसकी लंबाई लगभग 3,488 किमी. है और यह लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है।
  • यह कोई औपचारिक रूप से निर्धारित सीमा नहीं है, बल्कि दोनों देशों की भिन्न-भिन्न क्षेत्रीय धारणाओं का परिणाम है।
  • LAC के खंड
    • पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख, ~1,597 किमी.): अक्साई चिन को लेकर विवाद; गलवान संघर्ष (2020) का प्रमुख स्थल।
    • मध्य क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल, ~545 किमी.): सबसे कम विवादित क्षेत्र; सीमित गश्ती घटनाएँ होती हैं।
    • पूर्वी क्षेत्र (सिक्किम, अरुणाचल, ~1,346 किमी.): चीन, अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत” के रूप में दावा करता है; प्रमुख तनाव बिंदु में डोकलाम गतिरोध (2017) शामिल है।

संबंधित तथ्य

  • पूर्व विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता के परिणाम: वर्ष 2025 की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के दौरान भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सीमांकन के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में प्रारंभिक उपलब्धि” प्राप्त करने की संभावनाओं की पड़ताल हेतु एक विशेषज्ञ समूह गठित करने पर सहमति व्यक्त की।

वार्ता के प्रमुख बिंदु

  • सीमा पर शांति एवं स्थिरता में प्रगति: दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया, जबकि भारत ने इस बात पर बल दिया कि स्थायी सीमा स्थिरता ने द्विपक्षीय संबंधों के क्रमिक सामान्यीकरण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं।
    • इन वार्ताओं को दोनों पक्षों द्वारा रचनात्मक एवं दूरदर्शी” बताया गया, जो विश्वास निर्माण की दिशा में सावधानीपूर्ण किंतु सकारात्मक प्रगति को दर्शाता है।
  • सीमांकन एवं सीमा प्रबंधन पर ध्यान: भारत और चीन ने सीमांकन, सीमा प्रबंधन, तंत्र निर्माण तथा सीमा-पार सहयोग से जुड़े विविध मुद्दों पर चर्चा की, जो LAC के साथ दीर्घकालिक स्थिरता हेतु संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करने के प्रयासों को प्रतिबिंबित करता है।
    • दोनों पक्षों ने विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता के अगले दौर के लिए ठोस तैयारी करने पर सहमति व्यक्त की, जो सीमा विवाद के समाधान का प्रमुख राजनीतिक तंत्र बना हुआ है।
  • सीमा-पार नदी सहयोग: भारत ने सीमा-पार नदियों पर विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र की शीघ्र बैठक आयोजित करने के महत्त्व को रेखांकित किया, जिससे जल-वैज्ञानिक सहयोग एवं सूचना साझाकरण को सुदृढ़ किया जा सके।
  • व्यापक द्विपक्षीय एवं रणनीतिक संदर्भ: यद्यपि अरुणाचल प्रदेश और चीन-पाकिस्तान रणनीतिक संबंधों जैसे मुद्दों पर समय-समय पर तनाव उत्पन्न होता है, फिर भी सीमा पर शांति एवं बढ़ती आर्थिक व्यवहारिकता के कारण समग्र संबंध अपेक्षाकृत स्थिर बने हुए हैं।
    • दोनों देशों के बीच बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से संवाद भी विस्तृत हुआ है; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने हेतु चीन का दौरा किया था।
  • इसके अतिरिक्त, भारत आगामी BRICS शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भागीदारी की अपेक्षा कर रहा है, जो द्विपक्षीय मतभेदों के बावजूद बहुपक्षीय सहयोग के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है।

सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय हेतु कार्य-तंत्र (WMCC) के बारे में

  • सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय हेतु कार्य-तंत्र (WMCC): WMCC भारत और चीन के मध्य वर्ष 2012 में स्थापित एक संस्थागत कूटनीतिक तंत्र है।
    • इसी प्रकार, विशेष प्रतिनिधि (SR) संवाद सीमा विवाद के समाधान हेतु एक रूपरेखा तैयार करने के लिए उत्तरदायी सर्वोच्च राजनीतिक तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
  • अधिदेश: इसका उद्देश्य सीमा क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों का प्रबंधन करना तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ शांति एवं स्थिरता बनाए रखना है।

WMCC और विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ताओं के बीच संबंध

WMCC विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ताएँ
संचालनात्मक और कूटनीतिक तंत्र राजनीतिक-स्तर की वार्ता तंत्र
सीमा प्रबंधन पर केंद्रित अंतिम सीमा समाधान पर केंद्रित
तत्काल तनावों से संबंधित दीर्घकालिक समाधान से संबंधित
कूटनीतिक और सैन्य अधिकारियों द्वारा संचालित उच्च स्तरीय राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा संचालित

सीमा विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • भारत–चीन सीमा विवाद का मूल कारण वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के संरेखण को लेकर भिन्न-भिन्न धारणाएँ तथा पश्चिमी, मध्य एवं पूर्वी क्षेत्रों में अनसुलझे क्षेत्रीय दावे हैं।
  • विवाद के प्रमुख क्षेत्र (Major Areas of Dispute):
    • पश्चिमी क्षेत्र – अक्साई चिन क्षेत्र।
    • पूर्वी क्षेत्र – अरुणाचल प्रदेश, विशेष रूप से तवांग
    • मध्य क्षेत्र – उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश के अपेक्षाकृत कम विवादित क्षेत्र।
  • दोनों देशों के संबंधों में गंभीर गिरावट निम्नलिखित घटनाओं के पश्चात् देखी गई:
    • वर्ष 1962 का भारत–चीन युद्ध
    • आवर्ती सीमा घटनाएँ (Recurrent Border Incidents):
      • डेपसांग विवाद (2013)
      • डोकलाम विवाद (2017)
      • गलवान घाटी संघर्ष (2020)

वर्तमान कूटनीतिक शिथिलता का महत्त्व 

  • सीमा स्थिरता की पुनर्स्थापना: सीमा पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत–चीन द्विपक्षीय संबंध मूलतः सीमा स्थिरता पर आधारित हैं; दीर्घकालिक तनाव से सैन्य तैनाती की लागत, आर्थिक दबाव तथा अन्य क्षेत्रों में कूटनीतिक सहयोग में कमी उत्पन्न होती है।
  • सैन्य तनाव की रोकथाम: WMCC तथा विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता जैसे तंत्रों के माध्यम से सतत् कूटनीतिक संवाद आकस्मिक झड़पों, सैन्य टकराव एवं LAC पर तनाव वृद्धि के जोखिम को कम करता है।
  • व्यावहारिक आर्थिक संलग्नता: रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद, चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक बना हुआ है; दोनों अर्थव्यवस्थाएँ विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं, इलेक्ट्रॉनिक्स आयात, औषधीय मध्यवर्ती उत्पादों, दूरसंचार उपकरण एवं नवीकरणीय ऊर्जा घटकों के माध्यम से परस्पर संबंधित हैं, जो भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के मध्य आर्थिक व्यावहारिकता को दर्शाता है।
  • बहुपक्षीय मंचों का महत्त्व: भारत और चीन BRICS, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), G20 तथा जलवायु वार्ताओं जैसे मंचों पर सहयोग जारी रखते हैं, जो ‘ग्लोबल साउथ’ के मुद्दों के समन्वय, बहुध्रुवीयता को बढ़ावा देने एवं वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार की माँग को सुदृढ़ करता है।
  • संस्थागत तंत्रों का सुदृढ़ीकरण: WMCC बैठकों, सैन्य कमांडर-स्तरीय वार्ताओं एवं कूटनीतिक संवादों की निरंतरता इस जटिल सीमा विवाद के प्रबंधन में संस्थागत संवाद तंत्रों के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित करती है।
  • एशिया के लिए रणनीतिक महत्त्व: भारत–चीन संबंधों की स्थिरता एशिया की व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है, क्योंकि दोनों प्रमुख शक्तियों के मध्य तनाव क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार प्रवाह एवं संपर्क पहलों को प्रभावित कर सकता है।
  • कार्यात्मक सहयोग के अवसर: सीमा स्थिरता से व्यापार, जलवायु परिवर्तन, सीमा-पार नदियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं बहुपक्षीय विकास पहलों जैसे क्षेत्रों में सहयोग के अवसर उत्पन्न होते हैं, भले ही व्यापक रणनीतिक मतभेद बने रहें।
  • भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को समर्थन: चीन के साथ बेहतर कूटनीतिक संवाद भारत को रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाने में सक्षम बनाता है, जिसमें प्रतिस्पर्द्धा और सहयोग के मध्य संतुलन बनाए रखते हुए किसी एक भू-राजनीतिक गुट पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जाता है।
  • राजनीतिक परिपक्वता का संकेत: मतभेदों के बावजूद निरंतर संवाद यह दर्शाता है कि दोनों देश इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि प्रतिस्पर्द्धा को अनियंत्रित संघर्ष में परिवर्तित नहीं होने देना चाहिए, विशेषकर दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसी देशों के संदर्भ में।
  • विश्वास निर्माण उपायों (CBMs) को बढ़ावा: निरंतर संवाद विश्वास निर्माण उपायों की पुनर्स्थापना, सैन्य संचार में सुधार तथा भविष्य में संकटों की रोकथाम हेतु तंत्रों को सुदृढ़ करने में सहायक है।

भारत–चीन संबंधों में चुनौतियाँ

  • विश्वास का अभाव (Trust Deficit): हालिया कूटनीतिक संवाद के बावजूद गलवान घाटी संघर्ष (2020) के बाद का वातावरण गहन रणनीतिक अविश्वास, LAC पर सतत् सैन्य तैनाती तथा चीन की दीर्घकालिक भू-राजनीतिक मंशाओं को लेकर चिंताओं को जन्म देता है; यह विश्वास की कमी द्विपक्षीय संबंधों के पूर्ण सामान्यीकरण में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
  • चीन–पाकिस्तान रणनीतिक गठजोड़: चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए जा रहे बढ़ते रणनीतिक एवं आर्थिक समर्थन, विशेषकर चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) तथा पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में अवसंरचना विकास को लेकर भारत चिंतित है, जिससे द्वि-स्तरीय सुरक्षा चुनौती की आशंका बढ़ती है।
    • उदाहरण: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन द्वारा J-10C लड़ाकू विमान एवं PL-15 मिसाइलों जैसे उन्नत सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति ने पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को सुदृढ़ किया।
  • अरुणाचल प्रदेश मुद्दा: चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश पर बार-बार क्षेत्रीय दावे और स्थानों के पुनर्नामकरण के प्रयास भारत की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देते हैं एवं दीर्घकालिक सीमा समाधान को जटिल बनाते हैं।
  • इंडो-पैसिफिक में प्रतिस्पर्द्धा: भारत की QUAD तथा अन्य इंडो-पैसिफिक साझेदारियों में बढ़ती सक्रियता को, चीन संदेह की दृष्टि से देखता है, जबकि भारत, हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति को लेकर चिंतित है।
  • सीमा पर अवसंरचना प्रतिस्पर्द्धा: दोनों देश LAC के निकट सड़क, सुरंग, हवाई पट्टी एवं लॉजिस्टिक ढाँचे का तीव्र विस्तार कर रहे हैं, जिससे सैन्य तैयारी तो बढ़ती है, किंतु त्वरित सैनिक एकत्रीकरण एवं तनाव वृद्धि के जोखिम में भी बढोतरी होती है।
  • आर्थिक संबंधों में असंतुलन (Asymmetry): भारत को चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे, महत्त्वपूर्ण आयातों पर निर्भरता तथा इलेक्ट्रॉनिक्स, API (औषधीय कच्चा माल) एवं नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं में संवेदनशीलता को लेकर चिंता है।
    • उदाहरण: भारत–चीन द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, जिसमें भारत का निर्यात 14.3 अरब डॉलर तथा आयात 113.5 अरब डॉलर रहा, जिससे 99.2 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उत्पन्न हुआ।
  • प्रौद्योगिकी एवं साइबर चिंताएँ: भारत दूरसंचार, डिजिटल अवसंरचना, निगरानी प्रौद्योगिकी एवं साइबर नेटवर्क में चीन की भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा एवं डेटा संप्रभुता संबंधी चिंताओं के कारण सतर्क बना हुआ है।
  • क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्द्धा: दोनों देश दक्षिण एशिया, हिंद महासागर क्षेत्र एवं ग्लोबल साउथ में संपर्क परियोजनाओं, अवसंरचना निवेश एवं कूटनीतिक सक्रियता के माध्यम से प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्द्धा में संलग्न हैं।
  • सीमा का अंतिम समाधान न होना: स्पष्ट रूप से निर्धारित एवं पारस्परिक रूप से स्वीकृत सीमा का अभाव, इस विवाद की मूल संरचनात्मक समस्या है, जिसके कारण LAC की भिन्न व्याख्याएँ एवं बार-बार सैन्य टकराव होते हैं।
  • वैश्विक रणनीतिक दृष्टिकोण में अंतर: भारत का मुक्त, खुला एवं समावेशी इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण चीन की बढ़ती क्षेत्रीय आक्रामकता से भिन्न है, जिससे एशिया की उभरती रणनीतिक संरचना में व्यापक भू-राजनीतिक मतभेद उत्पन्न होते हैं।

चीन के प्रति भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण 

  • अनियंत्रित संघर्ष के बिना प्रतिस्पर्द्धा: भारत की विकसित होती चीन नीति अनियंत्रित संघर्ष के बिना प्रतिस्पर्द्धा” की रणनीति को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत नई दिल्ली अपने रणनीतिक एवं सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए सैन्य संघर्ष की स्थिति से बचाव करती है।
  • LAC के साथ सैन्य तैयारी: भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपनी सैन्य तैयारी को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है, जिसमें अतिरिक्त सैनिक तैनाती, सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण, उन्नत निगरानी क्षमता तथा त्वरित सैन्य जुटाव अवसंरचना शामिल है, जिससे विश्वसनीय निरोधक क्षमता सुनिश्चित होती है।
  • सीमावर्ती अवसंरचना विकास: सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, सुरंग, पुल, हवाई पट्टियों एवं लॉजिस्टिक नेटवर्क के निर्माण में तेजी लाई है, जिससे कनेक्टिविटी, सैन्य तत्परता एवं रणनीतिक प्रतिक्रिया क्षमता में वृद्धि होती है।
  • समान विचारधारा वाले देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी: भारत ने QUAD, इंडो-पैसिफिक साझेदारियों एवं रक्षा सहयोग तंत्रों के माध्यम से समान रणनीतिक चिंताओं वाले देशों के साथ सहयोग को विस्तारित किया है, जिसका उद्देश्य मुक्त एवं समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सुनिश्चित करना है।
  • कूटनीतिक संवाद की निरंतरता: सैन्य तनाव एवं भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद, भारत WMCC, विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता, सैन्य कमांडर-स्तरीय बैठकों तथा बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से चीन के साथ संवाद बनाए रखता है, जिससे संचार बना रहे एवं तनाव में वृद्धि को रोका जा सके।
  • आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण: भारत आर्थिक लचीलेपन को बढ़ाने हेतु घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित कर रहा है तथा इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधीय क्षेत्र एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता को कम करने के लिए आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण कर रहा है।
  • निरोध एवं सहभागिता के मध्य संतुलन: भारत का व्यापक उद्देश्य रणनीतिक निरोध और कूटनीतिक सहभागिता के मध्य संतुलन बनाए रखना है, जिससे चीन के साथ प्रतिस्पर्द्धा नियंत्रित रहे तथा क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा को अस्थिर न करे।

आगे की राह

  • विश्वास निर्माण उपायों (CBMs) का सुदृढ़ीकरण: भारत और चीन को सैन्य हॉटलाइन के विस्तार, सैनिक गतिविधियों में पारदर्शिता तथा नियमित कमांडर-स्तरीय बैठकों के माध्यम से मौजूदा विश्वास निर्माण तंत्रों को मजबूत करना चाहिए, ताकि LAC पर अस्पष्टताएँ कम हों एवं आकस्मिक तनाव वृद्धि को रोका जा सके।
  • सीमा वार्ताओं में तेजी: दोनों देशों को सीमांकन (Boundary delimitation) से संबंधित विशेषज्ञ समूहों के क्रियान्वयन को प्राथमिकता देनी चाहिए तथा क्षेत्र-विशिष्ट विश्वास निर्माण उपायों को बढ़ावा देकर न्यायसंगत, युक्तिसंगत एवं पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
  • सीमावर्ती अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: भारत को सड़क, सुरंग, उन्नत निगरानी प्रणाली, हवाई संपर्क एवं लॉजिस्टिक नेटवर्क के विकास के माध्यम से सीमा अवसंरचना को सुदृढ़ करते रहना चाहिए, जिससे प्रभावी सीमा प्रबंधन एवं विश्वसनीय निरोधक क्षमता सुनिश्चित हो सके।
  • कार्यात्मक सहयोग का विस्तार: रणनीतिक मतभेदों के बावजूद, दोनों पक्षों को जलवायु परिवर्तन, व्यापार स्थिरता, सीमा-पार नदी प्रबंधन, आपदा प्रतिक्रिया, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं वैश्विक शासन सुधार जैसे क्षेत्रों में सहयोग को गहन करना चाहिए, जहाँ पारस्परिक हित निहित हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना: भारत को कूटनीतिक संवाद एवं रणनीतिक निरोध के मध्य संतुलन बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता एवं स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना चाहिए।
  • संकट प्रबंधन तंत्रों का संस्थानीकरण: WMCC, सैन्य संवाद तंत्र एवं विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ताओं जैसे मंचों को और अधिक संस्थागत रूप प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि तनाव के समय समयबद्ध एवं प्रभावी संकट प्रबंधन सुनिश्चित हो सके।
  • आर्थिक संवेदनशीलताओं में कमी: भारत को आपूर्ति शृंखला विविधीकरण, घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन तथा इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार एवं औषधीय क्षेत्र जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना चाहिए।
  • जन-से-जन संपर्क को बढ़ावा: शैक्षणिक आदान-प्रदान, पर्यटन, सांस्कृतिक कूटनीति एवं थिंक-टैंक संवाद के माध्यम से आपसी समझ को बढ़ाकर दीर्घकालिक विश्वास निर्माण किया जा सकता है।
  • प्रतिस्पर्द्धा एवं सहयोग के मध्य संतुलन: दोनों देशों को यह स्वीकार करना होगा कि यद्यपि रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा बनी रह सकती है, परंतु इसे अनियंत्रित टकराव में परिवर्तित नहीं होने देना चाहिए, विशेषकर एशियाई स्थिरता, वैश्विक आर्थिक विकास एवं बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ में।

निष्कर्ष

  • भारत–चीन संबंध भविष्य में भी सहयोग, प्रतिस्पर्द्धा तथा सावधानीपूर्ण सह-अस्तित्व के जटिल मिश्रण से परिभाषित होते रहेंगे।
    • हालिया WMCC वार्ताएँ यह संकेत देती हैं कि दोनों देश इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि सीमा अस्थिरता को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभावी नहीं होने देना चाहिए।
  • यद्यपि गहरे संरचनात्मक मतभेद बने हुए हैं, फिर भी सतत् कूटनीतिक संवाद तथा प्रभावी सीमा प्रबंधन तंत्र एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
    • भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन के साथ व्यावहारिक कूटनीतिक संलग्नता को आगे बढ़ाते हुए अपनी संप्रभुता, रणनीतिक स्वायत्तता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की प्रभावी रूप से रक्षा करे।

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