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भारत के विद्युत क्षेत्र में ‘मार्केट कपलिंग’

Lokesh Pal April 23, 2026 03:00 6 0

संदर्भ

केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (Central Electricity Regulatory Commission- CERC) ने विद्युत व्यापार में सुधार के लिए मार्केट कपलिंग’ (Market coupling) हेतु मसौदा विनियम जारी किए हैं।

केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (Central Electricity Regulatory Commission- CERC) के बारे में

  • केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग, केंद्रीय स्तर पर विद्युत क्षेत्र का एक वैधानिक नियामक है।
  • इसकी स्थापना विद्युत नियामक आयोग अधिनियम, 1998′ के तहत की गई थी, और बाद में विद्युत अधिनियम, 2003′ द्वारा इसे और अधिक सशक्त बनाया गया।
  • CERC के कार्य
    • टैरिफ (शुल्क) विनियमन
    • अंतर-राज्यीय विद्युत विनियमन
    • प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना।

संबंधित तथ्य

  • केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (विद्युत बाजार) (द्वितीय संशोधन) विनियम, 2026′ नामक मसौदा विनियम में, नियामक ने CERC (विद्युत बाजार) विनियम, 2021 में विभिन्न संशोधनों का प्रस्ताव किया है, जिसमें पहली बार  मार्केट कपलिंग’ (Market coupling) की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी।

पॉवर परचेज एग्रीमेंट (Power Purchase Agreements- PPAs) के बारे में

  • पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) एक विद्युत उत्पादक (genco) और एक खरीदार के बीच एक दीर्घकालिक अनुबंध है, जो आमतौर पर एक वितरण कंपनी (DISCOM) या एक बड़ा उपभोक्ता होता है।
  • PPA के तहत, उत्पादक एक पूर्व-निर्धारित मूल्य पर एक निश्चित अवधि के लिए विद्युत की आपूर्ति करने के लिए सहमत होता है, जो आमतौर पर 15 से 25 वर्ष तक होती है।
  • ये समझौते उत्पादकों के लिए सुनिश्चित राजस्व और खरीदारों के लिए विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।

मार्केट कपलिंग (Market Coupling) के बारे में

  • मार्केट कपलिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सभी विद्युत एक्सचेंजों की बोलियों (Bids) को एक साथ मिला दिया जाता है, ताकि एक एकीकृत विद्युत बाजार बनाया जा सके।
  • इस प्रणाली के तहत, एक्सचेंजों में समग्र माँग-आपूर्ति संतुलन के आधार पर एक एकल बाजार-समायोजित मूल्य (Market-clearing Price) निर्धारित किया जाता है।
  • एक नामित केंद्रीय ऑपरेटर इन बोलियों को एकत्रित करता है और इस तरह से मिलाता है जिससे आर्थिक अधिशेष, यानी खरीदारों और विक्रेताओं का संयुक्त लाभ अधिकतम हो सके।

मार्केट कपलिंग के तहत क्या प्रस्तावित किया गया है?

  • केंद्रीकृत मूल्य खोज (Centralised Price Discovery): ‘ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया’ को मार्केट कपलिंग ऑपरेटर (MCO) के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
    • यह सभी विद्युत एक्सचेंजों से बोलियाँ एकत्र करने और एक समान बाजार-समायोजित मूल्य निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार होगा।
  • मानकीकृत बोली प्रणाली (Standardised Bidding System): निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए सभी विद्युत एक्सचेंजों में एक समान बोली प्रारूप (Bid Format) अपनाया जाएगा।
    • एक्सचेंजों द्वारा एकत्र की गई बोलियाँ सुरक्षित संचार चैनलों के माध्यम से MCO को भेजी जाएँगी।
  • पॉवर मार्केट कपलिंग प्रोसेस’ (PMCP): ‘ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया’,  पॉवर मार्केट कपलिंग प्रोसेस (PMCP) तैयार करेगा। यह निम्नलिखित को परिभाषित करेगा:
    • हितधारकों की भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ
    • मानकीकृत बोली प्रारूप
    • प्राइस डिस्कवरी एल्गोरिदम (Price Discovery Algorithm) की विशेषताएँ।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: मार्केट कपलिंग को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। यह शुरू में डे-अहेड मार्केट (DAM) को कवर करेगा और बाद में रियल-टाइम मार्केट (RTM) और अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित होगा।

मार्केट कपलिंग के लाभ

  • कुशल मूल्य खोज: मार्केट कपलिंग सभी विद्युत एक्सचेंजों में एक समान मूल्य खोज तंत्र को सक्षम बनाता है।
    • यह कुल माँग और आपूर्ति के आधार पर एकल मार्केट-क्लियरिंग मूल्य निर्धारित करके कीमतों की विसंगतियों को समाप्त करता है।
  • बाजार पारदर्शिता में वृद्धि: एक एकीकृत मूल्य निर्धारण प्रणाली विद्युत व्यापार में पारदर्शिता बढ़ाती है।
    • यह बाजार सहभागियों के बीच विश्वास में सुधार करती है और कीमतों में बेहतर पूर्वानुमान सुनिश्चित करती है।
  • बेहतर संसाधन आवंटन: विद्युत का आवंटन अधिक कुशलता से होता है, और यह कम लागत वाले उत्पादन स्रोतों से अधिक माँग वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है।
    • इससे उपलब्ध संसाधनों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित होता है।
  • बाजार स्थिरता: मार्केट कपलिंग एक्सचेंजों के बीच कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुनाफा (वाणिज्यिक) के अवसरों को कम करता है।
    • यह एक अधिक स्थिर और एकीकृत विद्युत बाजार में योगदान देता है।
  • नीति निर्धारण के लिए बेंचमार्किंग: समान मार्केट-क्लियरिंग मूल्य नीति निर्माताओं के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ मूल्य के रूप में कार्य करता है।
    • यह टैरिफ, सब्सिडी और विद्युत क्षेत्र के सुधारों से संबंधित बेहतर निर्णय लेने में सहायता करता है।

मार्केट कपलिंग की सीमाएँँ

  • विद्युत एक्सचेंजों का विरोध: प्रमुख विद्युत एक्सचेंजइंडिया एनर्जी एक्सचेंज’ (IEX) ने मार्केट कपलिंग पर चिंता जताई है।
    • उसे डर है कि एक समान मूल्य निर्धारण तंत्र की शुरुआत से प्रतिस्पर्द्धी लाभ और बाजार हिस्सेदारी का नुकसान हो सकता है।
  • परिचालन जटिलता: मार्केट कपलिंग के कार्यान्वयन के लिए मूल्य खोज हेतु परिष्कृत एल्गोरिदम की आवश्यकता होती है।
    • कई एक्सचेंजों में रियल-टाइम समन्वय और एकीकरण सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण तकनीकी चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है।
  • नियामक और शासन संबंधी मुद्दे: केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) के निर्णयों से संबंधित इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद के बाद पारदर्शिता और शासन को लेकर चिंताएँ उभरी हैं।
    • यह नियामक विश्वसनीयता और निरीक्षण पर सवाल उठाता है।
  • केंद्रीकरण का जोखिम: ‘ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया’ को एकमात्र मार्केट कपलिंग ऑपरेटर के रूप में सौंपने से अति-केंद्रीकरण हो सकता है।
    • एक ही इकाई पर अत्यधिक निर्भरता दक्षता, जवाबदेही और सिस्टम लचीलेपन से संबंधित जोखिम उत्पन्न कर सकती है।

भारत में विद्युत का व्यापार कैसे होता है?

  • विद्युत उत्पादक आमतौर पर विद्युत बेचने के लिए PPA नामक दीर्घकालिक समझौतों में शामिल होते हैं, जो आमतौर पर 25 वर्षों तक चलते हैं, जबकि विद्युत एक्सचेंज अल्पकालिक विद्युत व्यापार की सुविधा प्रदान करते हैं।
  • यह बाजार-संचालित दृष्टिकोण उत्पादकों को अपने उत्पादन और राजस्व को अनुकूलित करने में सक्षम बनाता है, जबकि उपयोगिताओं को बोलियों और प्रस्तावों के माध्यम से परिवर्तनीय विद्युत माँगों को अधिक कुशलता से पूरा करने में मदद करता है।
  • बाजार-समायोजित मूल्य’ (वह मूल्य जिस पर विद्युत का व्यापार किया जाता है) माँग की बोलियों और आपूर्ति के प्रस्तावों के संतुलन द्वारा निर्धारित किया जाता है।

भारत में विद्युत व्यापार की वर्तमान प्रणाली

  • दीर्घकालिक बाजार (अनुबंध-आधारित व्यापार): विद्युत का व्यापार मुख्य रूप से पॉवर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के माध्यम से किया जाता है, जो दीर्घकालिक अनुबंध होते हैं, जो आमतौर पर लगभग 25 वर्षों तक चलते हैं।
    • ये समझौते विद्युत उत्पादकों (Gencos) और वितरण कंपनियों (DISCOMs) या बड़े उपभोक्ताओं के बीच हस्ताक्षरित होते हैं।
    • यह प्रणाली मूल्य स्थिरता और सुनिश्चित आपूर्ति सुनिश्चित करती है, जो भारत के विद्युत क्षेत्र का आधार है।
  • अल्पकालिक बाजार (विद्युत एक्सचेंज): अल्पकालिक विद्युत व्यापार की सुविधा विद्युत एक्सचेंजों के माध्यम से दी जाती है, जैसे: इंडिया एनर्जी एक्सचेंज (IEX), पॉवर एक्सचेंज इंडिया लिमिटेड (PXIL) और हिंदुस्तान पॉवर एक्सचेंज (HPX)।
    • ये एक्सचेंज उत्पादकों को अधिशेष विद्युत बेचने और खरीदारों को अल्पकालिक माँग के उतार-चढ़ाव को पूरा करने में सक्षम बनाते हैं।
    • वर्तमान में, प्रत्येक एक्सचेंज स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और माँग तथा आपूर्ति के आधार पर अपना बाजार-समायोजित मूल्य’ खोजता है, जिससे अलग-अलग एक्सचेंजों में कीमतों में भिन्नता होती है।

भारत में विद्युत बाजार 

विद्युत बाजार क्या है?

  • विद्युत बाजार एक ऐसा मंच है, जहाँ संरचित तंत्र के माध्यम से उत्पादकों और उपभोक्ताओं के मध्य विद्युत खरीदी तथा बेची जाती है।
  • यह माँग और आपूर्ति के आधार पर कुशल मूल्य खोज को सक्षम बनाता है तथा दीर्घकालिक व अल्पकालिक दोनों तरह के विद्युत व्यापार की सुविधा प्रदान करता है।
  • विद्युत बाजार संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने, ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करने और विद्युत क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने में मदद करते हैं।

भारत में विद्युत बाजारों के प्रकार

  • डे-अहेड मार्केट’ (DAM): ‘डे-अहेड मार्केट’ में अगले दिन की आपूर्ति के लिए विद्युत का व्यापार शामिल होता है।
    • लेन-देन 15-मिनट के समय-खंडों में बंद नीलामियों के माध्यम से किए जाते हैं, जिससे कुशल अल्पकालिक नियोजन संभव हो पाता है।
  • रियल-टाइम मार्केट (RTM): रियल-टाइम मार्केट लगभग तत्काल विद्युत वितरण की सुविधा प्रदान करता है।
    • यह माँग-आपूर्ति के अचानक होने वाले असंतुलन को प्रबंधित करने में मदद करता है और ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करता है।
  • इंट्रा-डे मार्केट (Intra-day Market): इंट्रा-डे मार्केट विद्युत के उसी दिन व्यापार की अनुमति देता है, जो आमतौर पर वितरण से कुछ घंटे पहले होता है।
    • यह बाजार सहभागियों को दिन के भीतर अपनी स्थिति को समायोजित करने का लचीलापन प्रदान करता है।
  • टर्म-अहेड मार्केट (TAM): टर्म-अहेड मार्केट 3 घंटे से लेकर 11 दिन पहले तक के अनुबंधों से संबंधित है।
    • यह सहभागियों को ‘डे-अहेड’ अवधि से परे अपनी अल्पकालिक आवश्यकताओं की योजना बनाने में मदद करता है।

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