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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की

Lokesh Pal June 29, 2026 02:45 5 0

संदर्भ 

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 38 के अंतर्गत संकटग्रस्त प्रजातियों की वैज्ञानिक पहचान एवं अधिसूचना के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है।

SOP की प्रमुख विशेषताएँ 

SOP का उद्देश्य राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान, मूल्यांकन एवं अधिसूचना हेतु एक एकरूप, पारदर्शी एवं वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ ढाँचा स्थापित करना है, जिससे भारत में जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ किया जा सके।

  • वैज्ञानिक मूल्यांकन: SOP उन प्रजातियों की पहचान के लिए एक मानकीकृत वैज्ञानिक पद्धति निर्धारित करता है, जो विलुप्ति की कगार पर हैं या निकट भविष्य में विलुप्त होने की संभावना है।
  • चरणबद्ध रूपरेखा: यह प्रजातियों की पहचान, मूल्यांकन, हितधारकों से परामर्श, विशेषज्ञों द्वारा सत्यापन, अधिसूचना, संरक्षण योजना, निगरानी तथा आवधिक समीक्षा को शामिल करते हुए एक संरचित प्रक्रिया प्रदान करता है।
  • साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण: SOP, संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान के दौरान वैज्ञानिक अनुसंधान, क्षेत्र-आधारित मूल्यांकन, पारिस्थितिकीय आँकड़ों तथा पारंपरिक ज्ञान के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।

  • सहभागी शासन: इसमें राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs), केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषद (UTBCs), जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs), स्थानीय समुदायों, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI), शैक्षणिक संस्थानों तथा विषय विशेषज्ञों की सहभागिता अनिवार्य की गई है।
  • प्रजाति पुनर्प्राप्ति योजनाएँ: अधिसूचना के बाद राज्यों को नियमित निगरानी एवं आवधिक मूल्यांकन के साथ प्रजाति पुनर्प्राप्ति एवं संरक्षण कार्ययोजनाएँ तैयार करनी होंगी।

इस मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का महत्त्व

  • प्रजातियों के विलुप्त होने की रोकथाम: विलुप्ति के उच्च जोखिम का सामना कर रही प्रजातियों की समय पर पहचान एवं संरक्षण सुनिश्चित करता है।
  • वैज्ञानिक निर्णय-निर्माण: सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में संकटग्रस्त प्रजातियों की अधिसूचना के लिए एकरूप एवं पारदर्शी मानदंड स्थापित करता है।
  • संरक्षण योजना को सुदृढ़ करना: प्रजाति-विशिष्ट पुनर्प्राप्ति कार्यक्रमों के माध्यम से लक्षित संरक्षण उपायों को सुगम बनाता है।

  • सामुदायिक सहभागिता: पारंपरिक पारिस्थितिकीय ज्ञान को समाहित करता है तथा जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।
  • नीति-निर्माण में सहयोग: साक्ष्य-आधारित जैव विविधता नीतियों एवं संरक्षण योजना के निर्माण हेतु विश्वसनीय वैज्ञानिक आँकड़े उपलब्ध कराता है।
  • लाभों का साझाकरण: जैव विविधता (जैविक संसाधनों एवं उनसे संबद्ध ज्ञान तक पहुँच तथा लाभों का न्यायसंगत एवं समान साझाकरण) विनियम, 2025 के कार्यान्वयन को समर्थन देता है, जो अधिसूचित संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए भिन्न-भिन्न लाभ-साझाकरण दायित्व का प्रावधान करते हैं।

जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 38 के बारे में

  • अधिसूचना की शक्ति: केंद्र सरकार को, संबंधित राज्य सरकार से परामर्श के उपरांत, विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी अथवा निकट भविष्य में विलुप्त होने की संभावना वाली प्रजातियों को संकटग्रस्त प्रजातियों के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करती है।
  • संरक्षण उपाय: सरकार को ऐसी प्रजातियों के संग्रह को विनियमित अथवा प्रतिबंधित करने तथा उनके पुनर्वास एवं संरक्षण के लिए आवश्यक उपाय करने का अधिकार प्रदान करती है।
  • शक्तियों का प्रत्यायोजन: केंद्र सरकार, संकटग्रस्त प्रजातियों को अधिसूचित करने की शक्ति राज्य सरकारों को प्रत्यायोजित कर सकती है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के बारे में

  • स्थापना: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत जैविक संसाधनों के विनियमन एवं संरक्षण के लिए की गई है।
  • नोडल मंत्रालय: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • संरचना: NBA में एक अध्यक्ष, पदेन (Ex-officio) सरकारी सदस्य तथा गैर-सरकारी विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इसे राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) तथा स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) का सहयोग प्राप्त होता है।
  • प्रमुख दायित्व
    • जैविक संसाधनों का विनियमन: NBA, जैविक संसाधनों तक पहुँच का विनियमन करता है तथा लाभों के न्यायसंगत एवं समान साझाकरण (Equitable Benefit Sharing) को सुनिश्चित करता है।
    • नीति परामर्श: यह सरकार को जैव विविधता संरक्षण, सतत् उपयोग तथा संबंधित विधिक ढाँचे पर परामर्श प्रदान करता है।
    • पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण: यह स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करता है तथा भारतीय जैविक संसाधनों पर अवैध बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) दावों का विरोध करता है।
    • संरक्षण को बढ़ावा: यह जैव विविधता धरोहर स्थलों की पहचान में सहयोग करता है तथा संरक्षण पहलों को प्रोत्साहित करता है।
    • समन्वय एवं जन-जागरूकता: यह राष्ट्रीय, राज्य एवं स्थानीय निकायों के मध्य समन्वय स्थापित करता है तथा जन-जागरूकता एवं सार्वजनिक सहभागिता को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना (NBSAP) 2024–30 के बारे में

राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्ययोजना (NBSAP) 2024–30 को कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के अनुरूप अद्यतित किया गया है। इसमें “सम्पूर्ण सरकार दृष्टिकोण” के माध्यम से जैव विविधता ह्रास से निपटने हेतु 23 राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।

प्रमुख लक्ष्य

  • 30×30 संरक्षण: संरक्षित क्षेत्रों एवं अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECMs) का विस्तार कर स्थलीय एवं समुद्री क्षेत्रों के 30% भाग को संरक्षण के दायरे में लाना।
  • पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन: स्थलीय, तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के कम-से-कम 30% क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का पुनर्स्थापन करना।
  • सतत प्रबंधन: सतत् कृषि, मत्स्यपालन एवं वानिकी को बढ़ावा देना तथा जैव विविधता से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत साझाकरण सुनिश्चित करना।
  • प्रदूषण एवं जोखिम में कमी: प्रदूषण संबंधी जोखिमों को कम करना तथा आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रभावी प्रबंधन करना।
  • समेकन एवं वित्तपोषण: जैव विविधता को विकास योजना में समाहित करना (लक्ष्य-14) तथा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का संकलन करना।

इन लक्ष्यों का उद्देश्य आवास विनाश को रोकना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना तथा “सम्पूर्ण समाज दृष्टिकोण” के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ करना है।

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