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गर्भधारण-पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम

Lokesh Pal June 15, 2026 03:43 9 0

संदर्भ

हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम [Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (PCPNDT) Act] की धारा 23 के तहत आरोपों को चुनौती देने वाली एक चिकित्सक की अपील को खारिज कर दिया।

  • न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि गहरी जड़ें जमा चुकीं पितृसत्तात्मक मानसिकताएँ राष्ट्रीय लिंग कल्याण कार्यक्रमों के कार्यान्वयन को लगातार नुकसान पहुँचा रही हैं।

PCPNDT अधिनियम की धारा 23 अवैध लिंग चयन और प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण के लिए दंड का प्रावधान करती है, जिसमें कारावास, जुर्माना, चिकित्सा पंजीकरण का निलंबन/रद्द करना और ऐसी सेवाओं की माँग करने वाले व्यक्तियों के लिए सजा शामिल है, जबकि दबाव में लाई गई महिलाओं को दंड से बचाया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य बिंदु

  • सामाजिक विकृति (Societal Pathology): सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर बनी हुई, (सभी वर्गों में व्याप्त सामाजिक पुत्र-प्राथमिकता और गुप्त रूप से लिंग-चयनात्मक तौर-तरीके अपनाए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
  • कल्याणकारी योजनाओं की विफलता: न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि महिलाओं के विकास के लिए बड़े पैमाने पर चलाई जा रही सरकारी योजनाएँ, गहरी जड़ें जमा चुकीं पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण एक संरचनात्मक गतिरोध का सामना कर रही हैं।
  • न्यायिक कठोरता (Judicial Non-Leniency): न्यायालय ने चिकित्सा पेशेवरों को एक कड़ा संदेश दिया और यह स्पष्ट किया कि कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने के आरोपियों को बचाने के लिए प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी खामियों (कानूनी कमियों) का सहारा लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम [Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (PCPNDT) Act] के बारे में 

  • पृष्ठभूमि: भारत में लगातार हो रहे लैंगिक भेदभाव और बालकों (पुत्रों) के प्रति मजबूत प्राथमिकता के कारण बाल लिंगानुपात में गिरावट देखी गई है।
    • बालिका शिशु हत्या (कन्या शिशु हत्या), कन्या भ्रूण हत्या और पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल तथा विकास में लड़कियों की उपेक्षा जैसी प्रथाओं ने प्रतिकूल लिंगानुपात में योगदान दिया है।
    • प्रसव पूर्व निदान तकनीकों में प्रगति ने लिंग निर्धारण और लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिए इसके दुरुपयोग को सक्षम बनाया, जिससे यह समस्या और गंभीर हो गई।
  • अधिनियम की आवश्यकता: गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग के कारण व्यापक स्तर पर लिंग चयन हुआ, जिसने बाल लिंगानुपात को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया।
    • इस मुद्दे के समाधान के लिए, गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन का प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 [Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (Prohibition of Sex Selection) Act, 1994] लागू किया गया था।

  • अधिनियम के उद्देश्य
    • गर्भधारण से पहले और बाद में लिंग चयन को प्रतिबंधित करना।
    • लिंग निर्धारण के लिए निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना।
    • कन्या भ्रूण हत्या को समाप्त करना और लैंगिक संतुलन को बढ़ावा देना।
    • वैध चिकित्सा उद्देश्यों के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के उपयोग को विनियमित करना।
  • PCPNDT अधिनियम, 1994 के तहत दंड
    • चिकित्सा पेशेवरों/क्लीनिकों के लिए दंड: अधिनियम के उल्लंघन पर पहली बार अपराध करने के लिए 3 वर्ष तक का कारावास और ₹10,000 तक का जुर्माना, तथा बाद के अपराधों के लिए उच्च जुर्माने के साथ 5 वर्ष तक का कारावास हो सकता है।
    • चिकित्सा पंजीकरण का निलंबन/रद्द करना: आरोप तय होने पर संबंधित डॉक्टर का पंजीकरण निलंबित किया जा सकता है और दोषसिद्धि (सजा होने) पर पहली बार में 5 वर्ष के लिए और बाद की दोषसिद्धि पर स्थायी रूप से पंजीकरण हटाया जा सकता है।
    • लिंग निर्धारण की माँग करने के लिए दंड: लिंग चयन/लिंग निर्धारण की माँग करने या इसे बढ़ावा देने वाले किसी भी व्यक्ति को पहली बार अपराध करने पर 3 वर्ष तक की कैद और ₹50,000 का जुर्माना, तथा दोबारा अपराध करने पर 5 वर्ष तक की कैद और ₹1 लाख का जुर्माना हो सकता है।
    • लिंग चयन के विज्ञापनों पर प्रतिबंध: लिंग चयन या प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण से संबंधित सेवाओं का विज्ञापन करना प्रतिबंधित है और अधिनियम के तहत दंडनीय है।
  • कार्यान्वयन तंत्र: इस अधिनियम में कई कड़े कानूनी प्रावधान और दंड शामिल हैं।
    • इसकी सफलता प्रभावी प्रवर्तन और निगरानी पर निर्भर करती है।
    • कार्यान्वयन को वैधानिक निकायों के माध्यम से पूरा किया जाता है जैसे कि:-
      • राज्य निगरानी बोर्ड (State Supervisory Board)
      • राज्य सलाहकार समिति (State Advisory Committee)
      • राज्य उचित प्राधिकरण (State Appropriate Authority)
      • जिला उचित प्राधिकरण (District Appropriate Authority)
      • जिला सलाहकार समिति (District Advisory Committee)
  • महत्त्व
    • लिंग-चयनात्मक तौर-तरीकों और लिंग निर्धारण पर आधारित अवैध गर्भपातों पर रोक लगाने में सहायता करता है।
    • इसका उद्देश्य बाल लिंगानुपात में सुधार करना और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है।
    • यह लिंग चयन के विरुद्ध जन जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।
    • यह बालिकाओं (लड़कियों) के अधिकारों और गरिमा की रक्षा के लिए एक प्रमुख कानूनी उपकरण के रूप में कार्य करता है।

मुख्य मुद्दा – बाल लिंगानुपात में कमी (Child Sex Ratio- CSR) 

  • बाल लिंगानुपात (Child Sex Ratio – CSR): बाल लिंगानुपात (CSR) 0 से 6 वर्ष के आयु वर्ग में प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को दर्शाता है। भारत की दशकीय जनगणना (Decadal Census) के आँकड़े इसमें भारी गिरावट को दर्शाते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि तकनीक कितनी तेजी से कानूनी प्रवर्तन (कानून को लागू करने की व्यवस्था) से आगे निकल गई।
  • सरकारी आंकड़ों की अंतर्दृष्टि: हालांकि, भारत के महापंजीयक कार्यालय (ORGI) द्वारा जारी की गई ‘नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024’ यह दर्शाती है कि भारत के ‘जन्म के समय लिंगानुपात’ (Sex Ratio at Birth – SRB) में मामूली सुधार हुआ है और यह (वर्ष 2022-24 की अवधि के लिए) 918 हो गया है, फिर भी यह लगभग 950 के प्राकृतिक जैविक मानदंड (Natural Biological Benchmark) से गंभीर रूप से नीचे बना हुआ है।

व्युत्क्रम लिंगानुपात (Inverted Sex Ratio) के कारण

  • पितृसत्तात्मक पुत्र-प्राथमिकता और वृद्धावस्था सुरक्षा (Patriarchal Son Preference & Old-Age Security): सांस्कृतिक रूप से, पुत्रों को वंश चलाने (पैतृक परंपरा) के लिए आवश्यक माना जाता है।
    • आर्थिक रूप से, वे वृद्धावस्था में वित्तीय सहायता के लिए एक पारंपरिक बीमा पॉलिसी के रूप में कार्य करते हैं।
  • विवाह प्रथाएँ और देनदारियाँ (Marriage Customs and Liabilities): दहेज प्रथा का अवैध लेकिन व्यापक रूप से जारी रहना और पितृस्थानीयता (Patrilocality) (अर्थात् विवाह के बाद बेटियों का अपने पति के घर चले जाना) की परंपरा के कारण परिवार बालिका के जन्म को एक गंभीर आर्थिक बोझ के रूप में देखते हैं।
  • प्रणालीगत लैंगिक असमानता (Systemic Gender Inequality): संपत्ति के स्वामित्व, रोजगार और सुरक्षा के मामलों में महिलाओं की कम भागीदारी समाज में उनके अनुमानित मूल्य को कम कर देती है।
    • यह संरचनात्मक अंतर वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देता है:
      • वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (विश्व आर्थिक मंच) की ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट’ आर्थिक भागीदारी और स्वास्थ्य मानकों में भारत को लगातार निचली रैंकिंग पर रखती है।
      • ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025’ में 148 देशों की सूची में भारत का स्थान 129वें से गिरकर 131वें पर आ गया, जो लगातार बनी हुई लैंगिक असमानताओं को उजागर करता है।
  • चिकित्सा तकनीक का दुरुपयोग (Weaponization of Medical Technology): भ्रूण के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए बनाए गए छोटे, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड स्कैनर और उन्नत आनुवंशिक (जेनेटिक) परीक्षणों का दुरुपयोग इसके विपरीत चुनिंदा रूप से कन्याओं की  हत्या करने वाले औजारों के रूप में किया जा रहा है।
  • कमजोर आपराधिक प्रवर्तन (Lax Criminal Enforcement): नए लागू किए गए ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) के तहत कानूनी तंत्र का अभी भी बहुत कम उपयोग हो पा रहा है। मामलों में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया कमजोर होने के कारण दोषसिद्धि (सजा होने) की दर काफी कम है और कानूनी डर भी कमजोर पड़ जाता है।

भारत द्वारा की गई पहल और कार्रवाई

  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP): गिरते हुए बाल लिंगानुपात (CSR) से जमीनी स्तर पर निपटने के लिए शुरू की गई इस योजना को अब महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ‘मिशन शक्ति’ में रणनीतिक रूप से एकीकृत कर दिया गया है, ताकि सुरक्षा और शिक्षा के लिए मिलने वाले फंड को व्यवस्थित किया जा सके।
  • सुकन्या समृद्धि योजना (SSY): यह एक उच्च-ब्याज वाली, कर-मुक्त खुदरा बचत योजना है, जिसे बालिकाओं के दीर्घकालिक वित्तीय सशक्तीकरण की गारंटी देने और भविष्य में उनकी उच्च शिक्षा एवं विवाह के खर्चों की भरपाई करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
  • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY): सामाजिक व्यवहार में सक्रिय रूप से बदलाव लाने के लिए, इस सशर्त नकद-हस्तांतरण कार्यक्रम में सुधार किया गया है, ताकि किसी माँ को उसकी दूसरी संतान लड़की होने पर सीधा वित्तीय लाभ प्रदान किया जा सके।

वैश्विक कार्य और पहल

  • संयुक्त राष्ट्र अंतर-एजेंसी वक्तव्य: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA), यूनिसेफ (UNICEF) और यूएन वीमेन (UN Women) द्वारा साझा रूप से जारी एक वैश्विक अधिदेश, जो विशेष रूप से लैंगिक पूर्वाग्रह से प्रेरित लिंग चयन के कारण होने वाले मानवाधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करता है।
  • ICPD कार्ययोजना (ICPD Programme of Action): जनसंख्या और विकास पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (ICPD) के तहत, सदस्य देश ऐसी नीतियाँ लागू करने के लिए बाध्य हैं जो बालिका शिशुओं के विरुद्ध चली आ रही पारंपरिक (पीढ़ी-दर-पीढ़ी) भेदभाव की भावना को पूरी तरह से समाप्त करती हैं।
  • सतत् विकास लक्ष्य (SDG) लक्ष्य 5.1: संयुक्त राष्ट्र वैश्विक लैंगिक समानता (Gender Equality) की दिशा में होने वाली प्रगति के मूल्यांकन के लिए एक प्राथमिक पैमाने के रूप में, जन्म के समय वैश्विक जैविक लिंगानुपात की कड़ाई से निगरानी करता है।

लिंग असंतुलन को नियंत्रित करने की आवश्यकता क्यों है?

  • जनसांख्यिकीय विकृति: अत्यधिक विषम (असंतुलित) पुरुष-महिला अनुपात एक गंभीर ‘मैरिज स्क्वीज’ (विवाह संकट – जहां बड़ी संख्या में अविवाहित पुरुषों को जीवनसाथी नहीं मिल पाता) को जन्म देता है।
  • लैंगिक हिंसा में वृद्धि: संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC) द्वारा महिलाओं की आबादी में कमी को सीधे तौर पर सीमा पार बालिकाओं के अपहरण और महिला तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) में आने वाली तेजी से जोड़ा गया है।
  • सामाजिक-आर्थिक ठहराव: महिलाओं को बहिष्कृत करने या उन्हें समाप्त करने से देश की मानव पूँजी सीमित होती है।

आगे की राह

  • कानूनी प्रवर्तन और निगरानी को मजबूत करना
    • डिजिटल ऑडिट ट्रेल्स की अनिवार्यता: PCPNDT अधिनियम के तहत दुरुपयोग को रोकने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम के माध्यम से सभी अल्ट्रासाउंड मशीनों की केंद्रीकृत रियल-टाइम निगरानी लागू करना, जिसमें मरीज का विवरण, स्कैन का कारण, ऑपरेटर की जानकारी और समय दर्ज हो।
    • जाँच और दोषसिद्धि दर में सुधार: PCPNDT मामलों के लिए समर्पित फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करना और साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया को मजबूत करने तथा अपराधियों के विरुद्ध त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड, फोरेंसिक ऑडिट और AI आधारित विसंगति पहचान का लाभ उठाना।
  • सामाजिक मानदंडों में बदलाव को बढ़ावा देना
    • शिक्षा के माध्यम से लैंगिक संवेदीकरण: कम आयु से ही पुत्र-प्राथमिकता और पितृसत्तात्मक रूढ़ियों को चुनौती देने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों में लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और बालिकाओं के अधिकारों पर मॉड्यूल शामिल करना।
    • समुदाय के नेतृत्व में व्यवहार परिवर्तन: बाल लिंगानुपात (CSR) में सुधार के लिए जागरूकता अभियान, सामुदायिक निगरानी और प्रोत्साहन-आधारित मान्यता कार्यक्रमों को संचालित करने हेतु पंचायती राज संस्थाओं (PRIs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और स्थानीय नेताओं को एकजुट करना।
  • बालिका का आर्थिक मूल्य और सुरक्षा बढ़ाना
    • बालिका कल्याण योजनाओं को मजबूत करना: बेटियों के प्रति सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहों को कम करने के लिए लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के दायरे और प्रभावशीलता का विस्तार करना।
    • महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देना: महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कौशल विकास, रोजगार के अवसरों, उद्यमशीलता सहायता और वित्तीय समावेशन तक उनकी पहुँच बढ़ाना।
  • डेटा-संचालित शासन दृष्टिकोण अपनाना
    • उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करना और उन्हें लक्षित करना: विषम (असंतुलित) लिंगानुपात वाले जिलों का पता लगाने और वहाँ केंद्रित सुधारात्मक उपाय लागू करने के लिए जनगणना, नागरिक पंजीकरण प्रणाली (CRS) और स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) के डेटा का उपयोग करना।
    • प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता निर्माण: PCPNDT ढाँचे के कार्यान्वयन में सुधार के लिए उचित प्राधिकारियों, पुलिस कर्मियों, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षित करना।
  • महिलाओं के अधिकारों और जन जागरूकता को मजबूत करना
    • प्रभावी संपत्ति और विरासत अधिकार सुनिश्चित करना: पुत्र-प्राथमिकता के पीछे के आर्थिक कारणों के समाधान के लिए विरासत और संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन को बढ़ावा देना।
    • सतत् व्यापक जागरूकता अभियान: बालिकाओं के महत्त्व को बढ़ावा देने और लैंगिक रूप से न्यायसंगत सामाजिक मानदंडों को विकसित करने के लिए मीडिया, नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थानों और सामुदायिक प्रभावकों को शामिल करना।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा रुख यह सिद्ध करता है कि गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक समस्याओं को केवल कानूनी ढाँचे के बल पर ठीक नहीं किया जा सकता है। भारत की महिला आबादी के अस्तित्व को सुरक्षित करने के लिए, सरकार को तकनीक के दुरुपयोग के विरुद्ध अपनी कठोर प्रशासनिक शून्य-सहनशीलता की नीति के साथ-साथ एक बड़े सांस्कृतिक परिवर्तन में संतुलन बनाना होगा, जो बेटियों को समान, स्वतंत्र आर्थिक और सामाजिक संपत्ति के रूप में महत्त्व दे।

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