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फुटपाथ पर चलने का अधिकार- एक मौलिक अधिकार

Lokesh Pal June 22, 2026 04:23 6 0

संदर्भ

मणियार इलियाज, शेख रियाज बनाम पी. अय्यप्पन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथों पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।

संबंधित तथ्य

  • यह मामला तब सामने आया, जब एक पाँच वर्षीय बालक की स्कूल जाते समय सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।

प्रमुख न्यायिक घोषणाएँ

  • पैदल चलने वालों को प्राथमिकता: अच्छी तरह से बनाए गए फुटपाथों पर चलना अब संविधान के भाग III के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है। यह अधिकार प्राथमिक है और मोटर वाहनों पर वरीयता रखता है।
  • सरकार का अनिवार्य कर्तव्य: यदि कोई सड़क मौजूद है, तो सरकार पर फुटपाथों का निर्माण और रखरखाव करने का कठोर सह-संबंधित कर्तव्य होता है।
  • कौन उत्तरदायी है: न्यायालय ने उन कर्तव्य-निभाने वाले निकायों (Duty-bearers) को सूचीबद्ध किया, जिन्हें फुटपाथों का निर्माण और संरक्षण करना चाहिए:
    • शहरी विकास प्राधिकरण
    • नगर निगम और नगरपालिकाएँ (शहरी सरकारें)
    • ग्राम पंचायतें (ग्रामीण सरकारें)।
  • हानि के लिए मुआवजे का अधिकार: यदि इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो नागरिक कानूनी उपायों का उपयोग कर प्रतिपूर्ति और मुआवजा (हानि या नुकसान के लिए धन) सीधे स्थानीय सरकारों से प्राप्त कर सकते हैं। यह प्रक्रिया मोटर वाहन अधिनियम से अलग है।

संबद्ध संवैधानिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य

  • मौलिक अधिकारों से संबंध: चलने का अधिकार अनुच्छेद-19(1)(d) (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा है, क्योंकि सुरक्षित मार्ग सार्वजनिक स्थानों में गरिमा और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • अन्य संबंधित अधिकार: चलना लोगों को मिलने-जुलने और बातचीत करने में सहायता करता है। इसलिए यह अनुच्छेद-19(1)(a), 19(1)(b) और 19(1)(c) (अभिव्यक्ति एवं संगठन से संबंधित स्वतंत्रताएँ जैसे भाषण, सभा तथा संगठन का निर्माण) से भी जुड़ा हुआ है।
  • इतिहास और संस्कृति: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में चलना एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। न्यायालय ने अनुच्छेद-51A (मौलिक कर्तव्य) का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों को इस विरासत का सम्मान करना चाहिए।
  • मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की कमी: न्यायालय ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 को एक बाधा बताया, क्योंकि यह वाहन-केंद्रित है और मानव सुरक्षा को द्वितीयक महत्त्व देता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

पैदल चलने वालों के लिए कानूनों की कमी को दूर करने हेतु, सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित कदमों का निर्देश दिया:-

  • मंत्रालयों द्वारा कार्यवाही: इस आदेश को तीन केंद्रीय मंत्रालयों—आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA), सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजा गया, ताकि एक नया वैधानिक ढाँचा (कानूनी प्रणाली) तैयार किया जा सके।
  • विधि आयोग की सहायता: भारत के विधि आयोग से अनुरोध किया गया कि वह एक स्पष्ट कानून का मसौदा तैयार करने में सहायता करे, जिसमें जिम्मेदारियों का निर्धारण हो तथा समस्याओं के लिए त्वरित कानूनी समाधान निर्धारित किए जाएँ।
  • नया निगरानी निकाय: एक पूर्णकालिक स्वतंत्र नियामक निकाय स्थापित करने का सुझाव दिया गया, जिसमें विशेषज्ञ शामिल हों, जो पूरे भारत में चलने के अधिकार की योजना, देख-रेख और क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।

निर्णय का महत्त्व

  • मौलिक अधिकारों का विस्तार: यह अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के दायरे को विस्तृत करता है, क्योंकि इसमें सुरक्षित पैदल आवागमन को गरिमापूर्ण जीवन का आवश्यक हिस्सा माना गया है।
    • यह संवैधानिक सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि सार्वजनिक अवसंरचना पहले लोगों के लिए होनी चाहिए, न कि वाहनों के लिए।
  • आवागमन की स्वतंत्रता को सुदृढ़ करना: यह अनुच्छेद-19(1)(d) को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है, जिससे नागरिक सार्वजनिक सड़कों पर सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से चल सकें।
    • यह बच्चों, महिलाओं, वृद्धों और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए पहुँच को बढ़ावा देता है।
  • सरकारी जवाबदेही में वृद्धि: यह सरकारों और स्थानीय निकायों पर फुटपाथों के निर्माण और रखरखाव की सकारात्मक जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है।
    • यह केवल सड़क निर्माण से हटकर पैदल यात्री-केंद्रित शहरी योजना की ओर ध्यान केंद्रित करता है।
  • सड़क सुरक्षा को बढ़ावा: यह भारत में पैदल यात्रियों की उच्च मृत्यु और दुर्घटना दर की समस्या को संबोधित करता है।
    • यह सुरक्षित और समावेशी परिवहन प्रणाली को प्रोत्साहित करता है।
  • सतत् शहरी गतिशीलता का समर्थन: यह पैदल चलने और गैर-मोटर चालित परिवहन को बढ़ावा देता है, जिससे भीड़भाड़, ईंधन खपत और प्रदूषण में कमी आती है।
    • यह सतत् और रहने योग्य शहरों के लक्ष्यों के अनुरूप है।
  • संवैधानिक मूल्यों की रक्षा: यह पैदल चलने के अधिकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा और संगठन के अधिकारों से जोड़ता है, क्योंकि यह साझा सार्वजनिक स्थानों में सामाजिक अंतःक्रिया को संभव बनाता है।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • व्यापक विधिक ढाँचे का अभाव: भारत में पैदल यात्री अधिकारों और फुटपाथ मानकों को नियंत्रित करने वाला कोई समर्पित राष्ट्रीय कानून नहीं है।
    • जिम्मेदारियाँ कई एजेंसियों के बीच विखंडित बनी हुई हैं।
  • कमजोर शहरी अवसंरचना: अनेक शहरों में अतिक्रमित, क्षतिग्रस्त, खंडित या अस्तित्वहीन फुटपाथ पाए जाते हैं।
    • शहरी योजना प्रायः पैदल यात्रियों के स्थान पर वाहनों को प्राथमिकता देती है।
  • सड़क विक्रेताओं के साथ टकराव: अनुच्छेद-19(1)(g) (जीविका का अधिकार) और अनुच्छेद-21 (चलने का अधिकार) के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल चुनौती है।
    • मनमाने उन्मूलन अभियान अनौपचारिक श्रमिकों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 का कमजोर क्रियान्वयन:टाउन वेंडिंग समितियों के गठन में देरी और वेंडिंग जोन का अपर्याप्त निर्धारण, पैदल यात्री अधिकारों और विक्रेताओं की आजीविका के बीच संघर्ष उत्पन्न करता है।
  • शहरी स्थानीय निकायों की सीमित क्षमता: नगर निकायों के पास अक्सर वित्तीय संसाधनों, मानव संसाधन और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी होती है।
    • पैदल अवसंरचना का रखरखाव अपर्याप्त बना रहता है।
  • मोटर वाहन-केंद्रित विकास: परिवहन नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से वाहनों के लिए सड़क क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित रही हैं, न कि पैदल अवसंरचना सुधारने पर।
  • क्रियान्वयन में कमी: मौजूदा योजना दिशा-निर्देशों का अक्सर सही ढंग से पालन नहीं होता।
    • निगरानी तंत्र के अभाव के कारण अतिक्रमण और असुरक्षित पैदल वातावरण लगातार बने रहते हैं।

आगे की राह

  • समर्पित पैदल यात्री अधिकार कानून का निर्माण: पैदल अवसंरचना के लिए अधिकार, जिम्मेदारियाँ, मानक और जवाबदेही तंत्र निर्धारित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय ढाँचा विकसित किया जाए।
  • पैदल यात्री-केंद्रित शहरी योजना: सभी शहरी और ग्रामीण सड़क परियोजनाओं में निरंतर, बाधा-रहित और सार्वभौमिक रूप से सुलभ फुटपाथ अनिवार्य किए जाएँ।
    • पैदल गतिशीलता को स्मार्ट सिटी और शहरी विकास योजनाओं में एकीकृत किया जाए।
  • स्थानीय शासन को सुदृढ़ करना: नगरपालिकाओं, शहरी विकास प्राधिकरणों और ग्राम पंचायतों को फुटपाथ निर्माण और रखरखाव के लिए अधिक वित्तीय और तकनीकी समर्थन प्रदान किया जाए।
  • जीविका और गतिशीलता में संतुलन: स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं सड़क विक्रय विनियमन) अधिनियम, 2014 का प्रभावी क्रियान्वयन कार्यात्मक टाउन वेंडिंग समितियों (TVCs) और वैज्ञानिक रूप से निर्धारित वेंडिंग जोन के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए।
  • स्वतंत्र नियामक तंत्र की स्थापना: पैदल अवसंरचना, सुरक्षा मानकों और शिकायत निवारण की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय या राज्य स्तर का समर्पित प्राधिकरण स्थापित किया जाए।
  • व्यावहारिक परिवर्तन को बढ़ावा: सड़क साझा करने, पैदल यात्री अधिकारों और जिम्मेदार ड्राइविंग व्यवहार पर जागरूकता अभियान संचालित किए जाएँ।
    • व्हीकल फर्स्ट” दृष्टिकोण से हटकर जन-केंद्रित गतिशीलता को प्रोत्साहित किया जाए।
  • प्रौद्योगिकी और डेटा का उपयोग: GIS मैपिंग, मोबिलिटी ऑडिट और पैदल सुरक्षा आकलन का उपयोग कर अवसंरचना की कमियों की पहचान की जाए और निवेश को प्राथमिकता दी जाए।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चलने के अधिकार की मान्यता, वाहन-केंद्रित से मानव-केंद्रित शहरी शासन की ओर एक परिवर्तनकारी परिवर्तन को दर्शाती है। हालाँकि, इस अधिकार के वास्तविक क्रियान्वयन के लिए समर्पित कानून, समावेशी शहरी योजना, सशक्त स्थानीय निकायों तथा पैदल यात्री अधिकारों और सड़क विक्रेताओं की आजीविका दोनों के संतुलित संरक्षण की आवश्यकता होगी।

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