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भारत में सड़क सुरक्षा

Lokesh Pal June 27, 2026 02:30 6 0

संदर्भ

सालाना लगभग 1.77 लाख सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को दर्ज करने के बावजूद, भारत के  राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य ट्रामा केयर नेटवर्क स्थापित नही हुआ है, जिससे गोल्डन ऑवर (स्वर्णिम घंटा) अर्थात ‘दुर्घटना पीड़ितों को बचाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहले 60 मिनट’ के प्रभावी उपयोग को नुकसान पहुँच रहा है।

‘स्थिति रिपोर्ट- सर्वोच्च न्यायालय के आदेश बनाम राज्यों की वास्तविकता’ (Status Report- Supreme Court Mandates vs. State Reality) 

रोड सेफ्टी ग्रुप सेवलाइफ फाउंडेशन (SaveLIFE Foundation) की एक याचिका के बाद शुरू हुई सर्वोच्च न्यायालय की समीक्षा में जीवन बचाने वाले पाँच प्रमुख उपायों पर ध्यान केंद्रित किया गया। राज्यों द्वारा किया गया वास्तविक कार्य बड़े अंतरालों को दर्शाता है:-

  • एकल आपातकालीन नंबर (112 NERS): भ्रम से बचने के लिए सभी आपातकालीन लाइनों (पुलिस, अग्निशमन, स्वास्थ्य) को एक नंबर में मिलाने के लिए वर्ष 2019 में इस देशव्यापी प्रणाली की शुरुआत की गई थी।
    • हालाँकि, भारत में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में से दो-तिहाई मौतों के लिए जिम्मेदार आठ राज्यों में से सात ने अभी तक अपनी चिकित्सा आपातकालीन लाइनों को इस एकल 112 नंबर में शामिल नहीं किया है।

  • एंबुलेंस में जीपीएस (GPS): न्यायालय ने आदेश दिया था कि निजी बेड़े सहित सभी एंबुलेंसों में जीपीएस ट्रैकिंग होनी चाहिए, जो एक सार्वजनिक डैशबोर्ड से जुड़ी हो।
    • वर्तमान में, 13 राज्यों में कोई जीपीएस नहीं है या बहुत कम जीपीएस ट्रैकिंग है (जो केवल सरकारी वाहनों तक सीमित है)। इसके अलावा, छह राज्यों ने अपने ट्रैकिंग डैशबोर्ड को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है।
  • नेक मददगारों (गुड समैरिटन्स) का संरक्षण: भले ही मोटर वाहन अधिनियम दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले राहगीरों को सुरक्षा प्रदान करता है, फिर भी लोग पुलिस उत्पीड़न से डरते हैं।
    • सबसे अधिक मृत्यु दर वाले आठ राज्यों में से केवल दो (महाराष्ट्र और कर्नाटक) ने इन मददगार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक उचित शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance System) स्थापित की है।
  • डिजिटल ट्रामा रजिस्ट्री (Digital Trauma Registries): ट्रामा रजिस्ट्री एक डिजिटल डेटाबेस है, जो दुर्घटना स्थल से लेकर, एंबुलेंस के माध्यम से, अस्पताल के इलाज और छुट्टी मिलने तक एक घायल मरीज के सफर को ट्रैक करता है।
    • चिकित्सीय देखभाल के ऑडिट और उसमें सुधार के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में, 22 राज्यों के पास ट्रामा रजिस्ट्री नहीं है और वे इसके बजाय स्थानीय अस्पतालों में मैनुअल तरीके पर निर्भर हैं।
  • घटनास्थल पर बचाव प्रोटोकॉल (On-Scene Rescue Protocols): हालाँकि 17 राज्यों ने बचाव कार्य के लिए मानक नियम बनाए हैं, लेकिन कर्नाटक जैसे उच्च-मृत्यु दर वाले राज्यों में अभी भी पीड़ितों को दुर्घटना स्थलों से सुरक्षित रूप से अस्पतालों तक ले जाने के लिए एक औपचारिक, संयुक्त प्रोटोकॉल की कमी है।

राज्य आपातकालीन प्रणालियाँ क्यों विफल हो रही हैं:

  • समन्वय की कमी: सड़क सुरक्षा के लिए तीन विभागों [परिवहन, गृह (पुलिस) और स्वास्थ्य] के बीच सहयोग की आवश्यकता होती है।
    • राज्य स्तर पर, ये विभाग अलग-अलग (एक-दूसरे से अलग होकर) काम करते हैं, जो आपातकालीन प्रणालियों के एकीकरण को बाधित करता है।
  • निजी एंबुलेंसों को बाहर रखना: राज्यों की ट्रैकिंग प्रणालियाँ अधिकतर निजी एंबुलेंसों को नजरअंदाज करती हैं। चूँकि वे एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष (सेंट्रल कंट्रोल रूम) से जुड़ी नहीं हैं, इसलिए आपातकालीन ऑपरेटर दुर्घटना स्थल के सबसे नजदीक मौजूद निजी एंबुलेंस का पता लगाने या उसे वहाँ भेजने में असमर्थ रहते हैं।
  • कागजी रिकॉर्ड पर निर्भरता: डिजिटल और रियल-टाइम डेटा संग्रह के बिना, राज्य के स्वास्थ्य विभाग यह ट्रैक नहीं कर सकते कि पीड़ित को अस्पताल पहुँचने में कितना समय लगता है, जिससे आपातकालीन देखभाल में होने वाली देरी को ठीक करना असंभव हो जाता है।
  • उत्पीड़न का डर: हालाँकि केंद्रीय कानून नेक मददगारों (गुड समैरिटन्स) को सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन स्थानीय जवाबदेही की कमी के कारण नागरिकों को अभी भी पुलिस या अस्पतालों द्वारा पूछताछ किए जाने का डर रहता है, जो उन्हें पीड़ितों की सहायता करने से रोकता है।

प्रणालीगत प्रभाव- यह विफलता जानलेवा क्यों है

  • गोल्डन ऑवर का नुकसान: समन्वय की कमी के कारण दुर्घटना के समय और एंबुलेंस के पहुँचने के बीच भारी देरी होती है, जिससे ऐसी चोटें भी जानलेवा बन जाती हैं, जिनका इलाज किया जा सकता था।
  • कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं: एंबुलेंस ट्रैकिंग डैशबोर्ड को जनता से छिपाकर रखने का तात्पर्य है कि धीमी प्रतिक्रिया या गलत जगह एंबुलेंस भेजने जैसी समस्याएँ पूरी तरह से अनियंत्रित (बिना किसी निगरानी के) रह जाती हैं।
  • बिना सोचे-समझे नीतिगत निर्णय: केंद्रीकृत ट्रामा रजिस्ट्री के बिना, राज्यों को यह पता नहीं चल पाता कि राजमार्गों के किन हिस्सों में मृत्यु दर सबसे अधिक है, जिससे वे उन जगहों पर ट्रामा सेंटर स्थापित नहीं कर पाते, जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

आगे बढ़ने के लिए आसान नीतिगत समाधान

  • वित्तीय अनुदानों को प्रदर्शन से जोड़ना: केंद्र सरकार को अतिरिक्त विकास कोष केवल उन्हीं राज्यों को देना चाहिए, जो 112 नेटवर्क को पूरी तरह से लागू करते हैं और अपनी एंबुलेंस ट्रैकिंग को जनता के लिए खोलते हैं।
  • डिजिटल रजिस्ट्रियों को अनिवार्य करना: राज्यों को मैनुअल (हाथ से लिखी) लॉगबुक का उपयोग बंद करना चाहिए और तमिलनाडु के रियल-टाइम मॉडल जैसी एकीकृत प्रणालियों को अपनाना चाहिए, जो एक ही डिजिटल स्क्रीन पर एंबुलेंस के समय और मरीज के स्वास्थ्य डेटा को ट्रैक करती है।
  • एक एकीकृत सड़क सुरक्षा प्राधिकरण बनाना: विभागों के मध्य के समन्वय के लिए, राज्यों को एक एकल, कानूनी प्राधिकरण की आवश्यकता है, जिसके पास यातायात, पुलिस और आपातकालीन चिकित्सा बेड़े (Ambulances) पर सीधा अधिकार हो।
  • अनिवार्य जीपीएस लाइसेंसिंग: राज्य परिवहन कानूनों को किसी भी व्यावसायिक या निजी एंबुलेंस को लाइसेंस देने के लिए सार्वजनिक जीपीएस ट्रैकिंग को एक अनिवार्य शर्त बनाना चाहिए।

भारत की स्थिति और कानूनी विकल्प

  • वैश्विक प्रतिबद्धता: भारत सतत् विकास लक्ष्य 3.6 के प्रति प्रतिबद्ध है, जिसका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों और चोटों को आधा करना है, जबकि सरकार ने सड़क सुरक्षा को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में चिह्नित किया है।
  • कार्यान्वयन में अंतर: विदेशों में मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) अभियानों में भारत के मजबूत रिकॉर्ड के बावजूद, देशव्यापी ट्रामा केयर नेटवर्क की अनुपस्थिति नीति के इरादे और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक बड़े अंतर को दर्शाती है।
  • संवैधानिक प्रवर्तन: केंद्र सरकार राज्यों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य ट्रामा केयर उपायों को लागू करने का निर्देश देने के लिए अनुच्छेद-256 का उपयोग कर सकती है, जिससे जीवन के अधिकार (अनुच्छेद-21) के संरक्षण को मजबूती मिलेगी।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय के निष्कर्ष सिद्ध करते हैं कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं की उच्च मृत्यु दर मुख्य रूप से एक प्रशासनिक और कार्यान्वयन की विफलता है, न कि कानूनों की कमी। राष्ट्रीय राजमार्गों पर जीवन बचाने के लिए केवल नियम बनाने की बजाय सत्यापन योग्य आपातकालीन बुनियादी ढाँचे के निर्माण और त्वरित ट्रामा केयर को नागरिकों के एक बुनियादी अधिकार के रूप में देखने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।

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