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आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार

Lokesh Pal January 24, 2026 05:00 61 0

संदर्भ:

आशा (ASHA) और आँगनवाड़ी कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल में “स्वयंसेवकों/कार्यकर्ताओं” (Volunteers/Activists) के रूप में माने जाने की बजाय औपचारिक कर्मचारियों के रूप में मान्यता के लिए विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, साथ ही वे न्यूनतम मासिक वेतन और स्थायी सेवा स्थिति की भी माँग कर रही हैं।

मुख्य माँगें और आर्थिक चुनौतियाँ:

  • वेतन अंतराल (Wage Gap): कार्यकर्ता मुद्रास्फीति के बीच बुनियादी अस्तित्व संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, कम-से-कम ₹15,000 के निश्चित मासिक वेतन के लिए विरोध कर रहे हैं।
  • मानदेय बनाम वेतन: वर्तमान में, उन्हें मानदेय प्राप्त होता है, जिसे कानूनी रूप से ‘वेतन’ की बजाय “प्रशंसा के प्रतीक” (Token of appreciation) के रूप में देखा जाता है।
    • वेतन के विपरीत, मानदेय एक विधिक अधिकार नहीं है और यह उन्हें श्रम कानूनों के तहत लाभ योग्य नहीं बनाता है।
  • स्वयंसेवक बनाम कर्मचारी: सरकार उन्हें स्थायी कर्मचारियों के रूप में मान्यता देने से इनकार करती है, जो राज्य को पेंशन और न्यूनतम वेतन प्रदान करने से बचने की अनुमति देता है।

आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मुख्य भूमिका:

  • आँगनवाड़ी कार्यकर्ता: एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) के तहत 1975 में स्थापित। उनकी प्राथमिक भूमिका 0-6 वर्ष की आयु के बच्चों का पोषण और पूर्व-स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करना है।
  • आशा (ASHA) कार्यकर्ता: मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (Accredited Social Health Activist) के लिए प्रयुक्त, इसे 2005 के आसपास राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के तहत निर्धारित किया गया था।
  • ‘सेतु’ (Bridge): आशा कार्यकर्ता अस्पतालों और समुदाय के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी या सेतु के रूप में कार्य करती हैं, जो जागरूकता और टीकाकरण को सुविधाजनक बनाता हैं। आमतौर पर प्रत्येक 1,000 लोगों पर एक आशा कार्यकर्ता होती है, जो ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण की ‘रीढ़’ के रूप में कार्य करती है।

ऐतिहासिक और विधिक पृष्ठभूमि:

  • जानबूझकर किया गया वर्गीकरण: 1975 से, सरकार ने श्रम अधिकारों पर राजकोषीय व्यय को कम करने के लिए, उन्हें “सामाजिक कार्यकर्ता” या ‘कार्यकर्ता’ के रूप में संदर्भित किया है।
  • 1989 में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन: बढ़ते कार्यभार के कारण, नियमित माँग के लिए कार्यकर्ताओं ने 1989 में एक राष्ट्रीय संघ का गठन किया।
  • योजना कार्यकर्ता: 1991 के सुधारों के बाद, सरकार ने उन्हें ‘योजना कार्यकर्ता’ के रूप में वर्गीकृत किया, जिससे स्थायी रोजगार सृजन के बिना सामाजिक योजनाओं का विस्तार किया गया।
  • न्यायिक निर्णय: कर्नाटक राज्य बनाम अमीरबी (1996) में, एक न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया कि आँगनवाड़ी कार्यकर्ता “नागरिक पद” धारण नहीं करते हैं, और इसलिए वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं।
  • 2004 की विडंबना: जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2004 में भोजन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का विस्तार किया, इसने आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संबंधित कानूनी अधिकार दिए बिना उनकी जिम्मेदारियों को बढ़ा दिया।

प्रणालीगत और राजकोषीय चुनौतियाँ:

  • उपेक्षित सिफारिशें: 45वें श्रम सम्मेलन ने सिफारिश की, कि इन कार्यकर्ताओं को नियमित किया जाए और न्यूनतम वेतन, पेंशन तथा ग्रेच्युटी प्रदान की जाए, लेकिन सरकारों ने निरंतर इन सिफारिशों की अनदेखी की।
  • बजट में कमी: 2015 में, NDA सरकार ने ICDS बजट कम कर दिया, और 2018 में केंद्र ने अपने वित्तीय योगदान को रोक दिया, जिससे कार्यकर्ताओं को मुद्रास्फीति का “राजकोषीय झटका” सहन करने हेतु बाध्य होना पड़ा।
  • राजकोषीय संघवाद: जबकि राज्य इन कार्यकर्ताओं को नियुक्त करते हैं, उनके पास अक्सर उन्हें बेहतर भुगतान करने के लिए संसाधनों की कमी होती है। केरल और तेलंगाना जैसे अमीर राज्य अतिरिक्त धन प्रदान करते हैं, जबकि बिहार जैसे गरीब राज्य ऐसा नहीं कर सकते।
  • संवैधानिक उल्लंघन: इस असमानता के परिणामस्वरूप “समान कार्य के लिए अलग-अलग वेतन” मिलता है, जो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 39D (समान कार्य के लिए समान वेतन) का उल्लंघन करता है।
  • गिग वर्कर्स से तुलना: आशा/आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की तुलना गिग वर्कर्स (जैसे- उबर या जोमेटो) से की जा सकती है, जिन्हें रोजगार सुरक्षा की कमी को छिपाने के लिए “एक्जीक्यूटिव” जैसी उपाधियाँ दी जाती हैं।

आगे की राह

  • कानूनी वर्गीकरण: सरकार को उन्हें “स्वयंसेवक” कहना बंद करना चाहिए और कानूनी रूप से उन्हें कर्मचारियों के रूप में पुनर्वर्गीकृत करना चाहिए, ताकि उन्हें श्रम कानूनों के तहत व्यापक सुरक्षा प्रदान की जा सके।
  • सुनिश्चित लाभ: उन्हें गारंटीकृत न्यूनतम वेतन और लाभ प्रदान किए जाने चाहिए।
  • केंद्र-राज्य सहयोग: केंद्र सरकार को राज्यों के लिए अपने बजटीय समर्थन में वृद्धि करनी चाहिए, क्योंकि राज्यों के पास अकेले इन सामाजिक कल्याण लागतों को कवर करने के लिए सीमित संसाधन हैं।
  • कैडर का व्यावसायीकरण: सेवा वितरण को स्थिर करने के लिए सरकारों को संरचित प्रशिक्षण, पदोन्नति के मार्ग और शिकायत निवारण तंत्र की व्यवस्था करनी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत संरचनात्मक रूप से असुरक्षित श्रम पर मानव विकास के परिणाम नहीं निर्मित कर सकता। फ्रंटलाइन सेवा वितरण और संवैधानिक न्याय को बनाए रखने के लिए, विधिक मान्यता और सामाजिक सुरक्षा आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. परीक्षण कीजिए, कि आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का ‘स्वयंसेवकों’ या ‘योजना कार्यकर्ताओं’ के रूप में वर्गीकरण उनकी सामाजिक सुरक्षा और श्रम अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित करता है। इन मुद्दों को संबोधित करने के लिए आवश्यक उपाय सुझाइए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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