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न्यायालय की अवमानना और न्यायिक स्वतंत्रता

Lokesh Pal April 02, 2026 05:00 64 0

संदर्भ

न्यायालय की अवमानना और न्यायिक स्वतंत्रता संबंधी मुद्दा तब चर्चा के केंद्र में आया जबकि NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के न्यायपालिका अध्याय में न्यायिक प्रणाली में भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया।

  • इसके पश्चात इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लिया गया, जिसके उपरांत NCERT ने पुस्तक वापस ले ली और माफीनामा जारी किया।

अवमानना शक्तियों का संवैधानिक आधार

  • अनुच्छेद 129 (सर्वोच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना): सर्वोच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंड देने का अधिकार प्रदान करता है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा और अधिकार सुनिश्चित होता है।
  • अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना): उच्च न्यायालयों को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्रदान करता है, ताकि न्यायिक कार्यवाही की अखंडता बनी रहे।
  • एच. एन. सान्याल समिति: एच. एन. सान्याल समिति का गठन वर्ष 1963 में न्यायालय की अवमानना से संबंधित प्रचलित कानून की समीक्षा के लिए किया गया था।
    • इसकी सिफारिशों ने सीधे तौर पर अवमानना अधिनियम, 1971 के आधार का निर्माण किया।
  • अवमानना अधिनियम, 1971: यह अधिनियम न्यायालय की सिविल और आपराधिक अवमानना को परिभाषित और विनियमित करने के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिससे न्यायिक अधिकार और न्याय प्रशासन की रक्षा सुनिश्चित होती है।

न्यायालय की अवमानना के प्रकार

  • सिविल अवमानना: न्यायालय के आदेश, निर्णय, निर्देश की जानबूझकर अवहेलना या न्यायालय को दिए गए आश्वासन का उल्लंघन।
  • आपराधिक अवमानना: ऐसे कार्य जो न्याय प्रशासन में बाधा डालते हैं, जैसे—
    • बाधा उत्पन्न करना: न्यायालय की कार्यवाही या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना।
    • निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित करना: ऐसे कार्य जो लंबित न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करें या उसमें हस्तक्षेप करें।
    • न्यायालय को बदनाम करना: ऐसे बयान या प्रकाशन जो न्यायालय के अधिकार को कम करें या न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कमजोर करें।

मुख्य न्यायिक अवधारणाएँ और सिद्धांत

  • रचनात्मक आलोचना (Constructive Criticism): सद्भावना से की गई आलोचना जिसका उद्देश्य संस्था को सुधारना है, न कि उसे नष्ट करना।
  • विस्तृत सहनशीलता दृष्टिकोण (Broad Shoulder Approach): न्यायालय की यह क्षमता कि वह मामूली आलोचनाओं को अवमानना शक्ति का प्रयोग किए बिना सहन कर सके।
  • शक्ति का आधार (Substratum of Power): न्यायिक अधिकार का वास्तविक आधार—कानून या बल नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है।
  • न्यायालय को बदनाम करना (Scandalising the Court): झूठी/गलत जानकारी प्रकाशित करना जिससे न्यायपालिका में जनता का विश्वास कमजोर हो।
  • संस्थागत विश्वसनीयता (Institutional Credibility): जनता की दृष्टि में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और अधिकार।
  • न्यायिक प्रक्रिया (Due Process): किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पहले निष्पक्ष, कानूनी रूप से निर्धारित और संतुलित प्रक्रियाओं का पालन।

न्यायिक शक्ति और जनविश्वास

  • सीमित संस्थागत शक्ति: अलेक्जेंडर हैमिल्टन के विचारों के अनुसार, न्यायपालिका के पास “न तो तलवार है और न ही पर्स,” क्योंकि जबरदस्ती की शक्ति कार्यपालिका के पास है और वित्तीय शक्ति विधायिका के पास है।
  • जनता के विश्वास पर निर्भरता: न्यायपालिका का अधिकार मुख्य रूप से जनता के विश्वास, संस्थागत विश्वसनीयता और नैतिक वैधता पर आधारित होता है, न कि भौतिक या वित्तीय शक्ति पर।
  • आपराधिक अवमानना का उद्देश्य: आपराधिक अवमानना की शक्ति का उद्देश्य न्यायालयों के अधिकार की रक्षा करना और कार्यपालिका तथा विधायिका द्वारा न्यायिक आदेशों का पालन सुनिश्चित करना है।
  • संस्थागत सुरक्षा, व्यक्तिगत संरक्षण नहीं: अवमानना की शक्तियों का उद्देश्य न्यायिक संस्था की गरिमा की रक्षा करना है, न कि किसी व्यक्तिगत न्यायाधीश की प्रतिष्ठा या अहंकार की सेवा करना।

आलोचना पर न्यायिक दृष्टिकोण

  • CJI सब्यसाची मुखर्जी: इन्होंने कहा कि न्यायिक देरी की आलोचना से आत्ममंथन और संस्थागत सुधार होना चाहिए, न कि आलोचकों को अवमानना शक्तियों के माध्यम से दंडित किया जाना चाहिए।
  • CJI पी. बी. गजेन्द्रगडकर: इन्होंने यह तर्क दिया कि न्यायिक सम्मान निडर और निष्पक्ष निर्णयों के माध्यम से अर्जित किया जाना चाहिए, न कि क्रोध या जबरदस्ती से थोपकर।
  • CJI एस. पी. भरुचा: मेघा पाटकर और अरुंधति रॉय से जुड़े एक मामले में, उन्होंने अवमानना कार्यवाही रद्द कर दी और कहा कि “न्यायालय के कंधे आलोचना सहने के लिए पर्याप्त चौड़े हैं।”
  • लॉर्ड डेनिंग (UK): इनके अनुसार न्यायपालिका की सबसे अच्छी रक्षा उसका अपना आचरण है, और अवमानना शक्तियों का प्रयोग वैध आलोचना या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  • लॉर्ड टेम्पलमैन (UK): वर्ष 1987 के “स्पाईकैचर” मामले में, इन्होंने एक समाचार पत्र को न्यायाधीशों को “पुराने मूर्ख” कहने के लिए दंडित करने से इनकार कर दिया और हास्यपूर्ण ढंग से कहा कि उनकी उम्र तो एक तथ्य है, लेकिन मूर्ख होना केवल लेखक की राय है।

न्यायिक समीक्षा और लोकतंत्र

  • न्यायिक समीक्षा की भूमिका: न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा की शक्ति इसे विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका के कार्यों की गहन जाँच करने में सक्षम बनाती है, जिससे संवैधानिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  • संस्थागत अधिकार की रक्षा: न्यायपालिका को बदनाम करने के लापरवाह या दुर्भावनापूर्ण प्रयास जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं, जिससे यह अन्य सरकारी शाखाओं की प्रभावी जाँच करने की अपनी क्षमता खो सकती है।
  • आलोचना की सीमा: हालाँकि लोकतंत्र में न्यायपालिका की निष्पक्ष और तथ्य-आधारित आलोचना स्वीकार्य है, संस्था को दुर्भावनापूर्ण रूप से बदनाम करने या जनता के विश्वास को कमजोर करने वाली आलोचना स्वीकार्य नहीं है।

आंतरिक जवाबदेही और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार

  • भ्रष्टाचार का अस्तित्व: न्यायपालिका के भीतर कुछ ही भ्रष्ट व्यक्ति पूरे संस्थान की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
  • महाभियोग (अनुच्छेद 124(4)): सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया लंबी, जटिल और अक्सर राजनीतिक रंग ले लेने वाली होती है, इसलिए इसका उपयोग बहुत कम होता है।
  • न्यायाधीशों का स्थानांतरण: किसी न्यायाधीश को दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करना समस्या को केवल भौगोलिक रूप से स्थानांतरित कर सकता है, बिना मूल कदाचार को हल किए।
  • आंतरिक जाँच प्रणाली: न्यायपालिका न्यायाधीशों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की आंतरिक रूप से जाँच करती है (जैसे न्यायाधीश यशवंत वर्मा से संबंधित जाँच), लेकिन यदि मजबूत संस्थागत प्रतिरोध मौजूद हो तो ऐसे तंत्र अप्रभावी हो सकते हैं।

निष्कर्ष

कुछ व्यक्तियों द्वारा कदाचार से न्यायपालिका की विश्वसनीयता को धूमिल होने से रोकने के लिए आंतरिक जवाबदेही तंत्र और संस्थागत सुरक्षा को मजबूत करना आवश्यक है, साथ ही न्यायिक स्वतंत्रता और जनता का विश्वास बनाए रखना भी सुनिश्चित करना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: क्या आप मानते हैं कि भारत का संविधान शक्तियों के कठोर पृथक्करण के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, बल्कि ‘नियंत्रण और संतुलन’ (Checks and Balances) के सिद्धांत पर आधारित है? व्याख्या कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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