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डिजिटल सतर्कतावाद (Digital Vigilantism)

Lokesh Pal April 30, 2026 05:15 5 0

संदर्भ:

डिजिटल सतर्कतावाद का मुद्दा हाल के समय में प्रमुखता से सामने आया है, खासकर सोशल मीडिया की चर्चित घटनाओं के बाद—जैसे एक घरेलू उड़ान का वायरल वीडियो, जिसमें एक महिला ने सह-यात्री के कथित दुर्व्यवहार को रिकॉर्ड किया।

  • यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि लोग अब औपचारिक कानूनी प्रक्रिया से बाहर जाकर डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से तुरंत “न्याय” पाने की कोशिश कर रहे हैं।

डिजिटल सतर्कतावाद के बारे में

  • यह तब होता है जब व्यक्ति या समूह सोशल मीडिया का उपयोग करके कानून अपने हाथ में ले लेते हैं और सार्वजनिक रूप से दूसरों को शर्मिंदा करते हुए उनकी दोषी या निर्दोष होने का निर्णय करते हैं।
  • इसके तहत औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के बजाय वायरल सामग्री और जन-आक्रोश के माध्यम से “न्याय” स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।
  • विशेषज्ञ विश्लेषण: विद्वान लेस जॉनस्टन द्वारा सतर्कतावाद (विजिलैंटिज़्म) को परिभाषित करने वाली चार स्थितियों की पहचान की गई है:
    • यह जानबूझकर किया गया, पूर्व-नियोजित होना चाहिए, निजी नागरिकों द्वारा किया जाना चाहिए, और इसका उद्देश्य स्थापित व्यवस्था की रक्षा करना तथा इसमें शामिल लोगों को सुरक्षा प्रदान करना होना चाहिए।

एक्ट-1 – चिंगारी: क्या हुआ?

  • घटना: एक घरेलू उड़ान में एक महिला ने सह-यात्री के कथित “दुर्व्यवहार” का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया, जिसे बाद में सेलिब्रिटी और मीडिया संस्थानों द्वारा व्यापक रूप से प्रसारित किया गया।
  • न्यायालय की प्रतिक्रिया: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होने के बावजूद, बिना उचित न्यायिक प्रक्रिया के किसी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना उचित नहीं है।
  • मुख्य प्रश्न: क्या अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति को पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर ऑनलाइन “सार्वजनिक ट्रायल” करने का पूर्ण अधिकार प्रदान करता है?

एक्ट-2 – मुख्य कारण: तंत्रगत उदासीनता

पीड़ित पहले सोशल मीडिया का सहारा क्यों लेता है?

  • क्योंकि औपचारिक न्याय प्रणाली अत्यंत धीमी है।
  • न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है (Justice delayed is justice denied)”ग्लैडस्टोन

भारत की न्याय प्रणाली में विद्यमान समस्याएँ:

प्रमुख समितियाँ:

  • प्रकाश सिंह समिति: कानून प्रवर्तन एजेंसियों के रवैये में सुधार लाने हेतु पुलिस सुधारों पर केंद्रित।
  • मालिमाथ समिति: इसका उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार करना है, जिसमें न्यायपालिका और जेलें शामिल हैं।
  • विधि सेंटर: फास्ट-ट्रैक अदालतों और डिजिटल फाइलिंग प्रणालियों की स्थापना का सुझाव दिया।

  • लगभग 5 करोड़ मामले वर्त्तमान में अदालतों में लंबित हैं।
  • पुलिस का रवैया अक्सर असंवेदनशील और पीड़ित को दोषी ठहराने वाला होता है।
  • “आपने क्या पहना था?” — कई बार प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है।

विद्वान सारा विटमर का शब्द:

  • क्राउड-सोर्स्ड प्रतिशोधात्मक कार्रवाई” (Crowd-sourced Retributive Action)
  • जब संस्थाएँ विफल हो जाती हैं, तो भीड़ ऑनलाइन प्रतिशोध देती है (जैसे #MeToo आंदोलन)।

एक्ट-3 – क्या एक ट्वीट वास्तव में सतर्कतावाद (विजिलैंटिज़्म) है?

विद्वान लेस जॉनस्टन की सतर्कतावाद संबंधी शर्तें

  • पूर्व नियोजित (पहले से योजना बनाई गई हो)।
  • निजी नागरिकों द्वारा किया गया हो।
  • ‘स्थापित व्यवस्था’ की रक्षा का उद्देश्य हो।
  • प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता हो।

फ्लाइट केस पर लागू करना

प्रमुख शब्द 

डॉक्सिंग (Doxxing): यह एक दुर्भावनापूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें किसी पीड़ित या लक्षित व्यक्ति की निजी जानकारी—जैसे उसका नाम, घर का पता आदि—सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से साझा कर दी जाती है, जिससे आगे और उत्पीड़न (Abuse) की संभावना बढ़ जाती है।

  • कोई योजना नहीं — पीड़ित ने अचानक हुई हताशा में यह कदम उठाया।
  • कोई भी स्थापित व्यवस्था सुरक्षित नहीं है।
  • कोई सुरक्षा नहीं — पीड़ित को ऑनलाइन ट्रोलिंग और डॉक्सिंग (निजी जानकारी सार्वजनिक करना) का सामना करना पड़ता है।

निष्कर्ष

इसे ‘सतर्कतावाद (विजिलैंटिज़्म)’ कहना उचित नहीं है — यह एक विफल प्रणाली से उत्पन्न मदद की पुकार है।

एक्ट-4 – दोधारी तलवार

  • डिजिटल सतर्कतावाद (विजिलैंटिज़्म) एक “दोधारी तलवार” है, क्योंकि यह तेजी से वास्तविक समस्याओं को उजागर कर सकता है, लेकिन साथ ही इसमें गंभीर जोखिम भी शामिल होते हैं।
  • इसमें अक्सर “दूसरे पक्ष की बात सुनो” ( Audi Alteram Partem) के सिद्धांत का अभाव होता है, जिसका अर्थ है कि आरोपी को बोलने का अवसर दिए बिना ही उसे दोषी ठहरा दिया जाता है।
  • इसके अलावा, गंभीर मुद्दे कई बार केवल मनोरंजन या “हैशटैग ट्रेंड” बनकर रह जाते हैं, जहाँ लोग सार्थक समाधान की बजाय व्यूज़ और लोकप्रियता के लिए कंटेंट का निर्माण करते हैं।

एक्ट-5 – उपभोक्ता बनाम न्याय प्रणाली का तुलनात्मक उदाहरण

केस स्टडी: एयर इंडिया पेशाब कांड (नवंबर 2022)

  • एयरलाइन ने प्रारंभिक शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की।
  • जैसे ही मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ — तुरंत कार्रवाई की गई।

ब्रांड्स के मामले में शर्मिंदा करना (shaming) काम क्यों करता है, लेकिन न्याय व्यवस्था के मामले में नहीं?

  • ब्रांड्स (जैसे Zomato, IndiGo) अपनी प्रतिष्ठा खोने से डरते हैं, इसलिए वे शिकायत निवारण टीमों के माध्यम से तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं।
  • पुलिस और अदालतों को निष्क्रियता के लिए किसी भी वित्तीय दंड का सामना नहीं करना पड़ता।

आगे की राह 

  • प्रणालीगत सुधार: पुलिस सुधार के लिए प्रकाश सिंह समिति के दिशा-निर्देशों और आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए मालिमाथ समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन।
  • तकनीकी हस्तक्षेप: समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल FIR प्रणाली और फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना।
  •  प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: सोशल मीडिया कंपनियों को सामग्री के सत्यापन की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, ताकि मानहानि रोकी जा सके और अनुच्छेद 19(2) का पालन सुनिश्चित हो सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: डिजिटल सतर्कतावाद (विजिलैंटिज़्म)का बढ़ना केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं है, बल्कि औपचारिक न्याय वितरण प्रणाली के भीतर विद्यमान तंत्रगत उदासीनता का एक स्पष्ट लक्षण भी है। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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