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इस्तीफे के बाद न्यायाधीश के विरुद्ध संसदीय कार्यवाही

Lokesh Pal July 18, 2026 05:00 9 0

संदर्भ 

लोकसभा अध्यक्ष ने घोषणा की है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के विरुद्ध न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के अंतर्गत गठित जाँच समिति की रिपोर्ट 20 जुलाई, 2026 को संसद में प्रस्तुत की जाएगी, जबकि न्यायाधीश पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।

इस निर्णय ने इस प्रश्न पर संवैधानिक बहस को जन्म दिया है कि किसी न्यायाधीश के पद छोड़ देने के बाद संसद की शक्तियों की सीमा क्या है?

यह मुद्दा विवादास्पद क्यों है?

  • संविधान के अनुसार संसद को केवल पद पर कार्यरत न्यायाधीश को पद से हटाने की शक्ति प्राप्त है, न कि ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करने की जो पहले ही इस्तीफा दे चुका हो।
  • इस्तीफे के बाद जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करना ऐसी शक्ति का प्रयोग माना जा सकता है जिसका उद्देश्य पहले ही समाप्त हो चुका है।
  • इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर प्रश्न उठते हैं।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 121 – न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा
    • अनुच्छेद 121 संसद को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा करने से रोकता है।
    • इसका एकमात्र अपवाद वह स्थिति है जब न्यायाधीश को पद से हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो।
    • यह प्रावधान न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव से संरक्षण प्रदान करता है तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 124(4)
    • यह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया को निर्धारित करता है।
    • केवल सिद्ध दुराचार या असमर्थता के आधार पर संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से ही न्यायाधीश को हटाया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 217(1)(ख)
    • यह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने से संबंधित है।
    • इसकी प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के समान है।

न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968

  • उद्देश्य: यह अधिनियम संसद द्वारा न्यायाधीश को पद से हटाने पर विचार करने से पहले उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
  • सीमाएँ
    • इस अधिनियम का उद्देश्य केवल न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया को सुगम बनाना है।
    • इसके अंतर्गत दंड, जुर्माना या आपराधिक सजा नहीं दी जा सकती।
    • न्यायाधीश के इस्तीफा देने के बाद उसे पद से हटाने का उद्देश्य स्वतः समाप्त हो जाता है।

प्रमुख न्यायिक निर्णय

  • भारत संघ बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा (1978)
    • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का इस्तीफा एक एकपक्षीय संवैधानिक कार्य है।
    • इस्तीफे के प्रभावी होने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक नहीं होती।
    • इस्तीफा देते ही न्यायाधीश संवैधानिक पद पर नहीं रहता।
  • न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन मामला (2011)
    • महाभियोग की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान न्यायमूर्ति दिनाकरन ने इस्तीफा दे दिया।
    • इसके बाद जाँच समिति भंग कर दी गई तथा कार्यवाही समाप्त हो गई।
  • न्यायमूर्ति सौमित्र सेन मामला (2011)
    • राज्यसभा द्वारा पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद भी लोकसभा में प्रक्रिया पूरी होने से पहले न्यायमूर्ति सेन ने इस्तीफा दे दिया।
    • इसके पश्चात संसद ने कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाया ।

संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त चिंताएँ

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खतरा
    • यदि इस्तीफा देने वाले न्यायाधीशों के विरुद्ध भी संसद कार्यवाही जारी रखे, तो कार्यरत न्यायाधीशों में भय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
    • न्यायाधीश सरकार के विरुद्ध निर्णय देने में संकोच कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें सेवानिवृत्ति या इस्तीफे के बाद संसदीय जाँच का भय रहेगा।
  • संविधान की भावना का उल्लंघन
    • संसद को न्यायाधीश को पद से हटाने की शक्ति केवल कार्यरत न्यायाधीशों के लिए दी गई है।
    • इस्तीफे के बाद कार्यवाही जारी रखना संविधान द्वारा प्रदत्त संरक्षण को कमजोर करता है।
  • खतरनाक संवैधानिक परंपरा
    • इससे भविष्य में सरकारें सेवानिवृत्त या इस्तीफा दे चुके न्यायाधीशों के विरुद्ध राजनीतिक उद्देश्यों से संसदीय कार्यवाही शुरू कर सकती हैं।
    • इससे शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर हो सकता है।
  • संसदीय विशेषाधिकारों के दुरुपयोग की आशंका
    • संसदीय बहसें संवैधानिक जवाबदेही के बजाय राजनीतिक आलोचना का माध्यम बन सकती हैं।

वैकल्पिक कानूनी उपाय

  • संसद के बजाय पूर्व न्यायाधीशों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जाँच निम्न माध्यमों से की जा सकती है—
    • आपराधिक अपराधों के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा जाँच।
    • वित्तीय अपराधों के लिए प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जाँच।
    • लागू कानूनों के अनुसार आपराधिक अभियोजन।
    • जहाँ विधिसम्मत हो, वहाँ पेंशन संबंधी प्रावधानों का उपयोग।

आगे की राह

  • संसद की शक्तियों की संवैधानिक सीमाओं का सम्मान किया जाए।
  • इस्तीफे के बाद अनावश्यक संसदीय कार्यवाही से बचकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा जाए।
  • स्वतंत्र जाँच संस्थाओं के माध्यम से न्यायिक जवाबदेही की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
  • न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 में संशोधन कर यह स्पष्ट किया जाए कि जाँच के दौरान इस्तीफा देने की स्थिति में आगे की प्रक्रिया क्या होगी?
  • यदि किसी न्यायाधीश पर आपराधिक दुराचार के आरोप हों, तो उनका निपटारा संसदीय प्रक्रिया के बजाय सामान्य विधिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाए।

मुख्य परीक्षा आधारित प्रश्न : 

प्रश्न : “न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के मध्य संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य आवश्यकता है।” समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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