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RBI तथा उसकी राजकोषीय भूमिका का विस्तार

Lokesh Pal June 20, 2026 05:00 13 0

संदर्भ:

सक्रिय विदेशी परिसंपत्ति प्रबंधन और ₹91.97 लाख करोड़ के विस्तारित तुलन पत्र के आधार पर, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा वित्त वर्ष 2026 (FY26) के लिए केंद्र सरकार को ₹2.87 लाख करोड़ का रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण एक संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है। इसके तहत केंद्रीय बैंक सरकारी वित्त को स्थिर करने के लिए महत्त्वपूर्ण, गैर-कर राजकोषीय स्थान (Non-tax Fiscal Space) का निर्माण कर रहा है।

अधिशेष सृजन और तुलन पत्र विस्तार का तंत्र

  • तुलन-पत्र में घातीय वृद्धि: मार्च 2026 तक आरबीआई का तुलन-पत्र एक ही वर्ष में 20.6% की दर से बढ़कर ₹91.97 लाख करोड़ के स्तर तक पहुँच गया, जबकि इस दौरान कुल आय में 26% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई ।
  • राजस्व लाभ के प्राथमिक स्रोत: यह आय मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार (जो मुख्य रूप से अमेरिकी ट्रेजरी में निवेशित है) पर उच्च ब्याज आय, आक्रामक मुद्रा उतार-चढ़ाव प्रबंधन से होने वाले लाभ तथा घरेलू तरलता संचालन से होने वाले लाभ से प्रेरित है।
  • बिमल जालान फ्रेमवर्क का अनुपालन: यह भुगतान व्यवस्थित रूप से संशोधित आर्थिक पूँजी ढाँचे (ECF) द्वारा शासित होता है। यह ढाँचा कानूनी रूप से अनिवार्य करता है, कि आरबीआई ब्लैक-स्वान वित्तीय संकटों (अत्याधिक दुर्लभ संकट) के खिलाफ अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से सुरक्षित रखने के लिए अपने कुल तुलन-पत्र (बैलेंस शीट) का 5.5% से 6.5% के बीच एक आकस्मिक जोखिम बफर (Contingent Risk Buffer – CRB) बनाए रखे।
  • नियमित आय के रूप में परिवर्तन: ऐतिहासिक रूप से ₹30,000 करोड़ से ₹65,000 करोड़ के बीच उतार-चढ़ाव वाले ये हस्तांतरण, हाल के वित्तीय वर्षों में लगातार कई लाख करोड़ रुपये के रहे हैं। इसने आम बजट के लिए केंद्रीय बैंक के लाभांश को गैर-कर राजस्व के एक पूर्वानुमेय स्रोत के रूप में स्थापित कर दिया है।

व्यापक आर्थिक प्रभाव तथा राजकोषीय प्रबंधन से संबंधित वास्तविकताएँ

  • राजकोषीय घाटे में कमी: यह बहु-लाख करोड़ का लाभांश केंद्रीय बजट को एक तत्काल गैर-मुद्रास्फीतिकारी सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे सरकार को अपने राजकोषीय घाटे को आक्रामक रूप से कम करने तथा संप्रभु बाजार से उधार लेने के समग्र दबाव में कमी में मदद मिलती है।
  • मानक उपकरणों से संरचनात्मक विचलन: राजकोषीय स्थान निर्माण के पारंपरिक तरीकों में कर वृद्धि या ऋण विस्तार शामिल है। केंद्रीय बैंक के ये हस्तांतरण नए करों का बोझ और नया ऋण जारी किए बिना, या घरेलू उत्पादक उत्पादन में अल्पावधि वृद्धि की आवश्यकता के बिना तत्काल व्यय की शक्ति प्रदान करते हैं।
  • पूंजीगत व्यय बनाम राजस्व व्यय का जाल: प्रमुख अर्थशास्त्री इस अनूठे अप्रत्याशित लाभ का उपयोग आवर्ती राजस्व व्ययों (जैसे- प्रशासनिक लागत और सब्सिडी) को चुकाने के लिए करने के खिलाफ चेतावनी देते हैं। इसके विपरीत, दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता की माँग है, कि उत्पादक क्षमता के निर्माण के लिए इन फंडों को प्रमुख रूप से पूंजीगत व्यय (Capex – बुनियादी ढाँचा विकास) में लगाया जाए।

राजकोषीय प्रभुत्व तथा संस्थागत अंतराल का संकट

  • नीतिगत समझौते का जोखिम: इस प्रवृत्ति का एक दीर्घकालिक खतरा ‘राजकोषीय प्रभुत्व’ है। इसके तहत मौद्रिक नीति का प्राथमिक वैधानिक जनादेश—यानी मूल्य स्थिरता बनाए रखना तथा मुद्रास्फीति को लक्षित करना—केंद्रीय बैंक की लाभप्रदता और लाभांश क्षमता को अधिकतम करने की प्राथमिकताओं के नीचे आ सकता है।
  • प्रणालीगत सुरक्षा बफर्स का क्षरण: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के दौर में लाभांश भुगतान को अधिकतम करने से रक्षात्मक भंडार समय से पहले समाप्त हो सकते हैं। इससे अचानक होने वाले वैश्विक पूँजी पलायन (Capital Flight) या गंभीर मुद्रा अवमूल्यन (Currency Depreciation) का मुकाबला करने के लिए दीर्घकालिक बफर कम रह जाते हैं।
  • धुंधली होती परिचालन सीमाएँ: पश्चिमी केंद्रीय बैंकों के विपरीत जिन्होंने बड़े पैमाने पर सरकारी बॉण्ड खरीदकर क्वान्टीटिव इजिंग (Quantitative Easing) को अपनाया था, भारत का राजकोषीय-मौद्रिक संबंध केंद्रीय बैंक की परिचालन आय पर बढ़ती संरचनात्मक निर्भरता के माध्यम से गहरा रहा है।

लोक वित्त में संघीय अनदेखी

  • विभाज्य कर पूल से बाहर: चूँकि अधिशेष हस्तांतरण को कठोरता से गैर-कर राजस्व (Non-tax Revenue) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, इसलिए इस पर पूरी तरह से केंद्र सरकार का अधिकार होता है। संविधान के अनुच्छेद 270 के तहत, यह वित्त आयोग के हस्तांतरण फार्मूले से पूरी तरह बाहर रहता है।
  • राज्य के विकासात्मक बोझ में असमानता: भारतीय राज्य विकास और कल्याणकारी व्ययों (शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) का 60% से अधिक वहन करते हैं, लेकिन उन्हें इस बहु-लाख करोड़ के सार्वजनिक संसाधन में से कोई हिस्सा प्राप्त नहीं होता है।
  • राज्यों के ऋण लेने की कठोर सीमाएँ: जहाँ केंद्र को आरबीआई के तुलन पत्र के माध्यम से पर्याप्त गैर-कर लचीलापन प्राप्त होता है, वहीं राज्य अनुच्छेद 293 के तहत कठोर ऋण सीमाओं से बंधे रहते हैं, जो भारतीय लोक वित्त के संरचनात्मक केंद्रीयकरण को और तीव्र करता है।

निष्कर्ष

आरबीआई का यह रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण प्रभावी रूप से केंद्र के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) का समर्थन करता है और तत्काल उधार के दबाव को कम करता है। हालाँकि, एक मौद्रिक स्थिरता बनाए रखने वाले संस्थान को नियमित राजकोषीय समर्थन में बदलना संस्थागत स्वतंत्रता की रेखाओं को धुंधला करने तथा संघीय असंतुलन को बढ़ाने का जोखिम उत्पन्न करता है। सतत व्यापक आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए, इन फंडों को दिन-प्रतिदिन के सरकारी उपभोग की बजाय सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण से मजबूती से जोड़ा जाना आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “आरबीआई की तुलन पत्र की बदलती प्रकृति और बढ़ता अधिशेष हस्तांतरण, मौद्रिक स्थिरता के संस्थान से राजकोषीय क्षमता के एक उपकरण के रूप में परिवर्तन का संकेत देता है।” भारत के राजकोषीय संघवाद के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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