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Lokesh Pal
June 20, 2026 05:15
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अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के दायरे का विस्तार करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने सीमांकित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को एक मूल अधिकार घोषित किया है। यह पैदल यात्रियों की सुरक्षा के साथ रेहड़ी-पटरी वालों (street vendors) की सामाजिक-आर्थिक आजीविका को संतुलित करने की एक जटिल न्यायिक चुनौती प्रस्तुत करता है।
अधिकारों पर आधारित भारत के कानून अक्सर जनता की स्थापित आदतों को बदलने में तब संघर्ष करते हैं, जब वे केवल न्यायिक या वैधानिक घोषणाओं पर निर्भर होते हैं:
सर्वोच्च न्यायालय के इस संवैधानिक प्रोत्साहन का उपयोग सड़कों के भद्रकरण (Gentrify) करने या शहरी गरीबों को विस्थापित करने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। वास्तविक पैदल यात्री सुरक्षा और जीवंत सार्वजनिक स्थान केवल तभी प्राप्त किए जा सकते हैं, जब भारत समावेशी शहरी नियोजन की ओर बढ़े—जहाँ शहर के बजट सक्रिय रूप से निरंतर फुटपाथों के निर्माण को प्राथमिकता दें, और टाउन वेंडिंग कमेटियों को निर्बाध मार्ग के अधिकार के साथ आजीविका के अधिकार को संतुलित करने के लिए विधिक रूप से सशक्त किया जाए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्नप्रश्न. “सुरक्षित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को मूल अधिकार घोषित करना एक स्वागत योग्य संवैधानिक प्रोत्साहन है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल प्रतिकारात्मक उपचारों की बजाय एक सांस्कृतिक बदलाव और मानव-केंद्रित शहरी नियोजन में निहित है।” भारत में शहरी शासन के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) |
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