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भारत में सड़क दुर्घटनाएँ तथा मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता

Lokesh Pal January 01, 2026 05:30 136 0

सन्दर्भ:

सड़क दुर्घटना होने पर, कानून किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य निर्धारित करने से पूर्व उसकी आय जानने पर बल देता है। यह समानता और गरिमा संबंधी वादे का उल्लंघन है।

नैतिक दुविधा – न्याय बनाम गणित

  • मानवीय क्षति बनाम सांख्यिकीय मूल्यांकन: सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें, विशेषकर नए वर्ष की पूर्व संध्या के आसपास एक गंभीर मानवीय क्षति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे आँकड़ों में नहीं बदला जा सकता है।
  • दुःख से गणना तकमोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण आय-आधारित सूत्रों के माध्यम से व्यक्तिगत त्रासदी को संख्यात्मक मुआवजे में परिवर्तित करता है।
  • कल्याणकारी कानूनों में बाजार तर्क: राहत प्रदान करने के उद्देश्य से बनाए गए एक कल्याणकारी कानून ने आय की क्षमता के अनुसार जीवन का मूल्यांकन करके बाजार तर्क को अपनाया है।

न्यायालय मृत्यु की गणना कैसे करते हैं?

  • वैधानिक आधार: मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 168 न्यायाधिकरणों को उचित प्रतीत होने वाले मुआवजे को प्रदान करने का अधिकार देती है।
  • न्यायिक मानकीकरण: सरला वर्मा और प्रणय सेठी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए गुणक पद्धति को संस्थागत रूप दिया।
  • मुआवजे के घटक: मुआवजे की गणना वार्षिक आय को आयु-आधारित गुणक से गुणा करके तथा निश्चित पारंपरिक मदों को जोड़कर की जाती है।
  • उद्देश्य: यह हालाँकि सभी मामलों में पुरस्कारों में एकरूपता के माध्यम से निष्पक्षता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।

अदृश्य पीड़ित – ‘काल्पनिक आय’ का जाल

  • आय को प्राथमिक मापदंड के रूप में: औपचारिक आय के बिना पीड़ितों को एक काल्पनिक आय सौंपी जाती है, जो उनके वास्तविक सामाजिक योगदान से अलग होती है।
  • अवैतनिक श्रम का हाशिए पर जाना: बच्चे, गृहिणी और अनौपचारिक श्रमिक अपनी आवश्यक भूमिकाओं के बावजूद प्रतीकात्मक मुआवजा प्राप्त करते हैं।
  • सीमित न्यायिक सुधार: यद्यपि कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस मामले में अवैतनिक घरेलू कार्य को श्रम के रूप में मान्यता दी गई थी, फिर भी आय मूल्यांकन का केंद्र बनी हुई है।
  • संरचनात्मक बहिष्कार: समाज की देखभाल, पालन-पोषण और निर्माण करने वालों को मुआवजे की गणना में व्यवस्थित रूप से कम आँका जाता है।

संवैधानिक संकट – अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21

  • विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14): आय के आधार पर अलग-अलग मुआवजा विधि के समक्ष समता के संवैधानिक वादे को कमजोर करता है
  • गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21): मुआवजे को आय से जोड़ना गरिमा को अंतर्निहित की बजाय सशर्त बना देता है।
  • नैतिक असंगति: कानून राजमिस्त्रीगृहिणी या ऐसे बच्चे की गरिमा को समान रूप से मान्यता देने में विफल है, जिसने कभी स्थायी आय अर्जित नहीं की।

तुलनात्मक विश्लेषण – सड़क बनाम रेल/हवाई मार्ग

  • रेल अधिनियम, 1989: रेल अधिनियम प्रत्येक मृत यात्री के लिए ₹8 लाख का निश्चित मुआवजा प्रदान करता है।
  • हवाई परिवहन अधिनियम, 1972: हवाई यात्रियों की मृत्यु होने पर आय की चिंता किए बिना एकसमान मुआवजा दिया जाता है
  • सड़क परिवहन संबंधी विसंगति:जबकि सड़क दुर्घटना के मुआवजे का निर्धारण विशेष रूप से पीड़ित की आय पर निर्भर करता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण

  • असीमित दायित्व का भ्रम: यद्यपि धारा 147 के तहत दायित्व सैद्धांतिक रूप से असीमित है, व्यवहार में यह आय-आधारित मूल्यांकन द्वारा सीमित है।
  • लोन फुलर की “विधि की आंतरिक नैतिकता”: जीवन को आजीविका के बराबर मानने वाली व्यवस्था सुसंगति तथा निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
  • रोनाल्ड ड्वोरकिन का “अखंडता के रूप में कानून”: जीवन का भिन्न मूल्यांकन समान चिंता और सम्मान के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
  • मार्था नुसबॉम का “क्षमता के रूप में गरिमा”: गरिमा केवल आय में नहीं, बल्कि मानवीय क्षमता और समृद्धि में निहित है।

आगे की राह:

  • सार्वभौमिक गरिमा का न्यूनतम स्तर: प्रत्येक मृत्यु या गंभीर चोट के लिए आय की चिंता किए बिना एक निश्चित आधारभूत मुआवजा प्राप्त होना चाहिए।
  • आय से संबंधित अतिरिक्त भुगतान: अतिरिक्त मुआवजा समानता को कम किए बिना वास्तविक वित्तीय हानि की भरपाई कर सकता है।
  • मानहानि क्षतिपूर्ति: भावनात्मक क्षति के लिए एक अलग श्रेणी बनाई जानी चाहिए।
  • प्रक्रिया सुधार: MACAD मॉडल दर्शाता है, कि कैसे प्रौद्योगिकी त्वरित और पारदर्शी मुआवजे को सुनिश्चित कर सकती है।

निष्कर्ष

स्पष्ट है, कि सामाजिक कानून का लक्ष्य बाजार की हू-ब-हू नकल करना नहीं बल्कि उसकी विकृतियों को दूर करना है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत में मोटर वाहन अधिनियम के तहत सड़क दुर्घटना क्षतिपूर्ति मुख्यतः आय पर आधारित है। अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत यह दृष्टिकोण किस प्रकार समानता तथा गरिमा संबंधी मुद्दों को उठाता है, विश्लेषण कीजिए। कल्याणकारी राज्य में ‘उचित क्षतिपूर्ति’ सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधारों को बताइए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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