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Lokesh Pal
June 06, 2026 05:30
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23–26 मई 2026 के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के पश्चात भारत–अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में स्पष्ट गतिरोध दिखाई देने लगा है। रणनीतिक विशेषज्ञों और विभिन्न थिंक टैंकों का मानना है कि अमेरिका की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियाँ तथा कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव उस साझेदारी को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं, जिसे कभी 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी माना जाता था।
सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) की रिपोर्ट “रिपेयरिंग द ब्रीच: गेटिंग U.S.-इंडिया टाइज़ बैक ऑन ट्रैक” के अनुसार, वर्ष 2025 के उत्तरार्ध में भारत–अमेरिका द्विपक्षीय संबंध तीन प्रमुख विवादास्पद मुद्दों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुए और संबंधों की प्रगति में उल्लेखनीय बाधा उत्पन्न हुई:
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की बहुप्रतीक्षित यात्रा रणनीतिक आश्वासन देने में विफल रही। इसके बजाय, इसने “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत की लेन-देन आधारित प्रकृति को और स्पष्ट कर दिया।
वर्तमान कूटनीतिक और लेन-देन संबंधी तनावों के बावजूद, गहराई से निहित संरचनात्मक वास्तविकताएँ दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक द्विपक्षीय सामंजस्य की आवश्यकता को कायम रखती हैं:
यद्यपि भारत-अमेरिका साझेदारी का दीर्घकालिक संरचनात्मक आधार अभी भी मजबूत और तर्कसंगत बना हुआ है, वर्तमान संबंध अप्रत्याशित एवं लेन-देन आधारित नीतियों से उत्पन्न गहरे विश्वास-संकट से प्रभावित हैं। इस संबंध को पुनर्जीवित करने के लिए कठोर संरक्षणवाद से आगे बढ़ना होगा तथा अल्पकालिक राजनीतिक लाभों के बजाय साझा रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय उद्देश्यों के आधार पर दोनों देशों के हितों का पुनः संरेखण करना होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:प्रश्न: ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अंतर्गत भारत-अमेरिका संबंधों में आए हालिया बदलावों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। बढ़ती हुई लेन-देन आधारित कूटनीति के बीच भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को किस प्रकार संतुलित करना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द) |
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