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बजट और राजकोषीय समेकन की अनिवार्यता

Lokesh Pal February 05, 2026 05:15 5 0

संदर्भ:

केंद्रीय बजट 2026–27 भारत की राजकोषीय रणनीति को रेखांकित करता है, जिसका उद्देश्य विकास को तेज करना और वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था में रूपांतरण को सक्षम बनाना है। हालाँकि, क्रियान्वयन क्षमता, राजस्व लोच (Buoyancy), केंद्र–राज्य वित्तीय संबंधों तथा राजकोषीय समेकन की गति को लेकर चिंताएँ विद्यमान हैं।

बजट विज़न 2047 और औद्योगिक उद्देश्य

  • विकसित भारत @2047 विज़न: बजट भारत की विकास रणनीति को चौथी औद्योगिक क्रांति के अनुरूप संरेखित करता है, ताकि 2047 तक विकसित राष्ट्र का दर्जा प्राप्त किया जा सके।
  • रणनीतिक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों में प्राथमिक निवेश का प्रस्ताव, जिससे भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता निर्मित की जा सके।
  • दुर्लभ मृदा गलियारा पहल: उच्च-प्रौद्योगिकी और हरित उद्योगों के लिए आवश्यक रणनीतिक खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु एक समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारे की परिकल्पना की गई है।
  • अवसर की खिड़की बनाम क्रियान्वयन जोखिम: निवेश में देरी से उस महत्वपूर्ण अवसर के चूक जाने का जोखिम है, जैसा कि चीन के 1980 के दशक के विनिर्माण उछाल के दौरान अन्य देशों के साथ हुआ था। साथ ही, परियोजनाओं के त्वरित और प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर संदेह अभी भी विद्यमान है।

व्यय पुनर्संरचना: पूंजीगत व्यय बनाम राजस्व व्यय

  • संपत्ति सृजन की ओर झुकाव: सरकारी व्यय को राजस्व व्यय से हटाकर पूंजीगत व्यय की ओर पुनर्संरचित किया जा रहा है, जिसमें वेतन, पेंशन और सब्सिडी की तुलना में परिसंपत्ति निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है।
  • राजस्व व्यय के हिस्से में गिरावट: कुल व्यय में राजस्व व्यय का हिस्सा 2014–15 में 88% से घटकर 2026 में 77% हो गया है। इसके साथ ही सब्सिडी में 11% की कमी आई है, जो बार-बार होने वाले और उपभोग-आधारित खर्च में कटौती के माध्यम से बेहतर राजकोषीय अनुशासन को दर्शाता है।
  • उच्च विकास गुणक: पूंजीगत व्यय आर्थिक रूप से लाभकारी है, क्योंकि इसका गुणक प्रभाव अधिक होता है—जहाँ ₹1 का पूंजीगत व्यय समग्र आर्थिक उत्पादन में ₹3 तक निर्मित कर सकता है।
  • पूंजीगत व्यय की घटती वृद्धि दर: कोविड-19 के बाद की अवधि में जीडीपी के अनुपात में केंद्र का पूंजीगत व्यय उच्च बना हुआ है, जिससे आर्थिक विकास को समर्थन मिला है।
    • हालाँकि, पूंजीगत व्यय की वार्षिक वृद्धि दर 2023–24 में 28.3% से घटकर 2024–25 में 10.8% और 2025–26 (संशोधित अनुमान, RE) में 4.2% रह गई है, जिससे इसकी विकास-प्रेरक क्षमता कमजोर हुई है।
  • पूंजीगत व्यय में लगभग ठहराव: 2026–27 (बजट अनुमान, BE) में पूंजीगत व्यय वृद्धि को 11.5% तक बढ़ाने का अनुमान है, जो नाममात्र जीडीपी वृद्धि (10%) से केवल थोड़ा अधिक है।
    • परिणामस्वरूप, पूंजीगत व्यय 2025–26 (RE) और 2026–27 (BE) दोनों में जीडीपी के लगभग 3.1% पर स्थिर रहने की संभावना है, जिससे अतिरिक्त विकास प्रोत्साहन सीमित हो जाता है।

कर लोच/उछाल (Tax Buoyancy) और GST संरचना

  • परिभाषा: कर लोच (Tax Buoyancy) यह मापती है कि कर राजस्व की वृद्धि जीडीपी वृद्धि के प्रति कितनी संवेदनशील है और आदर्श रूप से यह 1 से अधिक होनी चाहिए।
    • वर्ष 2026 में कुल कर लोच 0.8 है।
  • संरचना: प्रत्यक्ष करों (आयकर और कॉरपोरेट कर) की लोच 1.1 के साथ मजबूत है, जबकि GST के अंतर्गत अप्रत्यक्ष करों की लोच मात्र 0.3 है।
  • निहितार्थ: GST की कम लोच (0.3) के कारण 2026–27 (BE) में केंद्र का सकल कर राजस्व नाममात्र जीडीपी की तुलना में धीमी गति से बढ़ रहा है, जो अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में संरचनात्मक समस्याओं की ओर संकेत करता है।
    • अप्रत्यक्ष कर लोच को 0.3 से बढ़ाकर 1 के करीब लाने के लिए GST सुधार आवश्यक हैं, ताकि राजस्व वृद्धि आर्थिक वृद्धि के अनुरूप हो सके।

सहकारी संघवाद के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ

  • अधिक विभाज्य हिस्से की माँग: राज्यों ने 16वें वित्त आयोग में विभाज्य पूल में अपनी हिस्सेदारी 50% करने की माँग की थी, लेकिन आयोग ने इसे 41% पर ही बनाए रखा।
  • राजस्व घाटा अनुदानों में तीव्र कटौती: राजस्व घाटा अनुदानों की समाप्ति से राज्यों का कुल हस्तांतरण 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत जीडीपी के 4.3% से घटकर मात्र 0.33% रह गया है।
  • सहकारी संघवाद पर दबाव: राजकोषीय समर्थन में यह संकुचन राज्यों पर सीमित केंद्रीय सहायता के साथ अधिक व्यय दायित्व वहन करने का दबाव डालेगा, जिससे सहकारी संघवाद कमजोर हो सकता है।

राजकोषीय समेकन, राजकोषीय घाटा और ऋण प्रबंधन

  • धीमा राजकोषीय समेकन: राजकोषीय घाटा 4.4% से घटकर 4.3% हो गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में समेकन की धीमी गति को दर्शाता है।
  • FRBM लक्ष्यों से विचलन: घाटा अब भी FRBM अधिनियम, 2018 के तहत निर्धारित 3% सीमा से काफी ऊपर है, जो कमजोर राजकोषीय अनुशासन को दर्शाता है।
  • घाटा–ऋण संबंध: हालाँकि सरकार ऋण–जीडीपी अनुपात घटाने पर बल देती है, लेकिन लगातार उच्च घाटा अनिवार्य रूप से सार्वजनिक ऋण में वृद्धि करता है।
  • ऋण–जीडीपी अनुपात: यह किसी देश के कुल सार्वजनिक ऋण की तुलना उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से करता है।

उच्च ऋण–जीडीपी अनुपात के परिणाम

  • निजी निवेश का बहिष्करण: उच्च सरकारी उधारी उपलब्ध पूंजी को अवशोषित कर देती है, जिससे निजी कंपनियों के लिए ऋण प्राप्त करना कठिन हो जाता है और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • ब्याज भार में वृद्धि: राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40% हिस्सा ब्याज भुगतान में चला जाता है, जिससे स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे प्राथमिक क्षेत्रों के लिए राजकोषीय गुंजाइश सीमित हो जाती है।
  • समष्टि-आर्थिक असुरक्षा: उच्च ऋण स्तर ब्याज दरों के बदलाव, मुद्रास्फीतिक दबावों और बाह्य वित्तीय अस्थिरता के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाता है।
  • नीतिगत विश्वसनीयता में कमी: लगातार उच्च ऋण निवेशकों के विश्वास और संप्रभु क्रेडिट रेटिंग को कमजोर कर सकता है, जिससे ऋण की लागत और बढ़ जाती है।

निष्कर्ष

हालाँकि बजट विकसित भारत 2047 की दिशा में एक विश्वसनीय रोडमैप प्रस्तुत करता है और प्रमुख विकास क्षेत्रों की पहचान करता है, लेकिन इस दृष्टि की सफलता राजकोषीय समेकन की बहाली तथा सतत मौद्रिक और राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित करने पर निर्भर करेगी।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: सतत आर्थिक विकास के लिए केवल व्यय प्राथमिकताएँ ही नहीं, बल्कि मौद्रिक और राजकोषीय स्थिरता भी आवश्यक है। केंद्रीय बजट 2026–27 के संदर्भ में राजकोषीय समेकन की अनिवार्यता का विश्लेषण कीजिए। अत्यधिक उच्च ऋण–जीडीपी अनुपात सरकार के विकासात्मक लक्ष्यों और निजी निवेश को किस प्रकार प्रभावित करता है?

(15 अंक, 250 शब्द)

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