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पश्चिम एशिया संकट और नया वैश्विक व्यवस्था

Lokesh Pal March 03, 2026 05:00 109 0

संदर्भ

28 फरवरी 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर एक समन्वित हमला किया, जिसमें सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई की मृत्यु हो गई और ईरान के सैन्य तथा परमाणु-संबंधित बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया। 

  • ईरान के इस्लामिक गणराज्य के विरुद्ध इस बड़े पैमाने के समन्वित सैन्य अभियान को अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury)” और इज़राइली रक्षा बलों द्वारा “ऑपरेशन रोअरिंग लायन (Operation Roaring Lion)” नाम दिया गया है।

पृष्ठभूमि 

  • राजशाही से धर्मतंत्र (1979): वर्त्तमान संकट की जड़ें 1979 की इस्लामी क्रांति से संबंधित हैं, जिसने शाह वंश को सत्ता से हटा दिया और राजशाही के स्थान पर धर्मगुरुओं (उलेमा) के नेतृत्व वाला एक धर्मतांत्रिक शासन स्थापित किया।
  • सर्वोच्च सत्ता का केंद्रीकरण: दशकों तक आयतुल्ला अली ख़ामेनेई ने सर्वोच्च नेता के रूप में अंतिम राजनीतिक और धार्मिक अधिकार का प्रयोग किया और सत्ता को धार्मिक प्रतिष्ठान (क्लेरिकल एस्टैब्लिशमेंट) के भीतर केंद्रीकृत रखा।
  • नेतृत्व का शून्य और अंतरिम व्यवस्था: सर्वोच्च नेता आयतुल्ला ख़ामेनेई तथा कई वरिष्ठ अधिकारियों की मृत्यु के बाद सत्ता में शून्य की स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसे वर्त्तमान में तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद द्वारा संभाला जा रहा है।
  • संरचनात्मक और क्षेत्रीय प्रभाव: इस हमले ने न केवल अयातुल्लाह अली खामेनेई के 37‑साल के शासन का अंत कर दिया, बल्कि ईरान की आंतरिक सत्ता संरचना को अस्थिर कर दिया, पश्चिम एशिया में रणनीतिक संतुलन को प्रभावित किया, और इज़राइल द्वारा अप्रतिपादित क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास की धारणाओं को और तीव्र कर दिया

आंतरिक पतन और कट्टरपंथी शासन की संभावना

  • प्रणालीगत अस्थिरता: सुदृढ़ केंद्रीकृत नेतृत्व के बावजूद, ईरान ने मुद्रास्फीति और आर्थिक संकट से प्रेरित कई विरोध प्रदर्शनों का अनुभव किया है।
    • वर्त्तमान संक्रमणकालीन नेतृत्व को बढ़ते बाह्य दबावों के बीच आंतरिक असंतोष को नियंत्रित करने में कठिनाई हो सकती है।
  • विकेंद्रीकरण और सत्ता संघर्ष: एकमात्र सर्वोच्च नेता से सामूहिक परिषद की ओर परिवर्तन दलगत प्रतिस्पर्धा के खतरे को जन्म दे सकता है।
  • IRGC का प्रभुत्व: इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), जो कथित तौर पर ईरान की अर्थव्यवस्था के लगभग 60% हिस्से पर नियंत्रण रखता है, राजनीतिक सत्ता को सुदृढ़ कर सकता है, जिससे कट्टरपंथी प्रभुत्व और मजबूत होगा।
  • स्थिरता और शांति पर प्रभाव: यदि कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में आती हैं, तो वे सैन्य राष्ट्रवाद और कठोर, समझौता-रहित नीति को प्राथमिकता देंगी।
    • इससे आंतरिक सुलह और क्षेत्रीय तनाव कम करने की प्रक्रिया और कठिन हो जाएगी।

शासन परिवर्तन का विरोधाभास

  • “बोर्ड ऑफ पीस” का रणनीतिक विरोधाभास: हालाँकि इसे दावोस में शांति पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया, इसे व्यापक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय कानून को दरकिनार करने का प्रयास माना जा रहा है, जिसमें कूटनीति को बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी के लिए एक आवरण के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
  •  रणनीतिक लक्ष्य में बदलाव: प्रारंभ में, अमेरिकी नेतृत्व की बयानबाजी से शासन परिवर्तन के लक्ष्य का संकेत मिलता था।
    • हालाँकि बाद में इसका उद्देश्य ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को ध्वस्त करना तक सीमित कर दिया गया।

वैश्विक आर्थिक व्यवधान — तेल संकट

  • ऊर्जा मार्गों में रणनीतिक बाधा: रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है, जिससे समुद्री मार्ग बाधित होने का खतरा है। विश्व की लगभग पाँचवाँ हिस्सा तेल आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है।
    •  इससे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में भारी व्यवधानउत्पन्न हो सकता है।
  • क्षेत्रीय विस्तार: इन हमलों का दायरा बढ़कर बहरीन, UAE और कतर के तेल प्रतिष्ठानों के साथ-साथ ओमान के दुक़म बंदरगाह (एक तटस्थ मध्यस्थ) तक पहुँच गया है।
  • तेल की कीमतों में उछाल: प्रमुख ऊर्जा ढाँचों, जिनमें सऊदी अरामको भी शामिल हैं, पर हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गईं और इनके 150 डॉलर तक जाने की आशंका है।

अतिरिक्त जानकारी:

रूबियो(Rubio’s) का “फोर्ट्रेस वेस्ट(Fortress West) ” सिद्धांत

  • फोर्ट्रेस वेस्ट (Fortress West): एक रणनीतिक सिद्धांत जिसका उद्देश्य पश्चिमी देशों को बाहरी निर्भरताओं और भू-राजनीतिक कमजोरियों से सुरक्षित रखते हुए उनकी आपूर्ति श्रृंखलाओं, महत्वपूर्ण संसाधनों और आर्थिक नेटवर्क को सुरक्षित और सुदृढ़ करना है।
  • सांस्कृतिक अहंकार (Cultural Arrogance): अमेरिकी विदेश सचिव रुबियो का दावा है कि पश्चिमी सभ्यता अद्वितीय और 5,000 वर्षों के इतिहास में सबसे महान है, जो प्रभावी रूप से भारत, चीन और मिस्र जैसी अन्य प्रमुख सभ्यताओं को हाशिये पर रखता है।
  • वैश्वीकरण-विरोध (Anti-globalisation): उन्होंने मुक्त व्यापार को एक खतरनाक भ्रांति बताया।
  • औपनिवेशिकवाद का समर्थन (Defence of Colonialism): औपनिवेशिक इतिहास का बचाव और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों को कम महत्त्व देना यह संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पुराने शक्ति असंतुलनों (Power Asymmetries) को सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है।
  • बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद (Majoritarian Nationalism): प्रवासियों (Migrants) को अस्तित्वगत खतरे के रूप में प्रस्तुत करना संरक्षणवादी नीतियों और पहचान-आधारित राजनीति को मजबूत करता है।
  • ऐतिहासिक समानता (Historical Parallel): सभ्यात्मक श्रेष्ठता का प्रदर्शन ऐतिहासिक श्रेष्ठतावादी सिद्धांतों, जैसे कि एडॉल्फ हिटलर की आर्य जाति की विचारधारा, से मिलता-जुलता है, जिसने वर्चस्व और बहिष्कार को न्यायसंगत ठहराया।

भारत के लिए निहितार्थ

  • ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित भेद्यता: भारत के लगभग 52% कच्चे तेल के आयात होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरते हैं। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
  • समष्टि आर्थिक प्रभाव: कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और परिवहन लागत चालू खाता घाटा (CAD) को बढ़ा सकती हैं जो मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकती हैं।
  • प्रवासी भारतीयों की चिंता: खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, जिससे भारत को मिलने वाली रेमिटेंस (विदेश से भेजी जाने वाली धनराशि) पर भी असर पड़ सकता है।
  • रणनीतिक निवेशों पर खतरा: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की रणनीतिक परियोजनाओं को प्रभावित कर सकती है, विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह परियोजना, जो भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

किसी एक सभ्यता को अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ मानना वैश्विक समानता और सहयोग को कमजोर करता है।

एक स्थिर और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था के लिए पारस्परिक सम्मान, संवाद और समावेशी बहुपक्षवाद (Inclusive Multilateralism) आवश्यक हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत की पश्चिम एशिया नीति बहु-संरेखण (Multi-alignment) और रणनीतिक संतुलन पर आधारित है। मूल्यांकन कीजिए कि अमेरिका–इज़राइल के बढ़ते समन्वय से भारत की क्षेत्रीय रणनीति (Regional Calculus) किस प्रकार प्रभावित होती है।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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