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यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफिक कमांड (PACOM) : एक हटाए गए उपसर्ग के पीछे का मूल अर्थ

Lokesh Pal June 25, 2026 05:30 5 0

संदर्भ:

अमेरिकी सेना का “INDOPACOM” से वापस “PACOM” पर लौटना केवल नाममात्र का बदलाव नहीं है। यह वाशिंगटन की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं, भारत की रणनीतिक प्रासंगिकता और हिंद-प्रशांत भू-राजनीति के भविष्य में संभावित परिवर्तनों का संकेत देता है।

मुख्य बिन्दु

  • नाम में बदलाव: अमेरिका ने अपने कमांड का नाम ‘यूनाइटेड स्टेट्स इंडो-पैसिफिक कमांड’ (INDOPACOM) से बदलकर वापस ‘यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफिक कमांड’ (PACOM) कर दिया है। यह 2018 के उस बदलाव को बदल देता है, जिसने हिंद महासागर, भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के बढ़ते महत्त्व को मान्यता दी थी।
  • अपरिवर्तित परिचालन क्षेत्र: कमांड का औपचारिक उत्तरदयित्व क्षेत्र (formal area of responsibility) अभी भी अपरिवर्तित है, जो अमेरिकी पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ है।
  • हिंद-प्रशांत ढाँचा: 2018 के बाद से, हिंद-प्रशांत अवधारणा भारत के रणनीतिक आकलन का केंद्र रही है, विशेष रूप से क्वाड (Quad) और अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया के साथ समुद्री सहयोग के माध्यम से।
  • महत्त्व में कमी: हाल के अमेरिकी रणनीतिक संदेशों में “हिंद-प्रशांत” के संदर्भों की अनुपस्थिति यह बताती है, कि वाशिंगटन का दृष्टिकोण भारत-केंद्रित हिंद-प्रशांत ढाँचे से दूर जा रहा है।

उभरती रणनीतिक चिंताएँ 

  • क्वाड (Quad) के महत्त्व में कमी: ऐसा प्रतीत होता है, कि क्वाड अपनी रणनीतिक केंद्रीयता खो रहा है, और इसका एजेंडा समुद्री सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि, महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों, खनिजों और आपदा प्रतिक्रिया तक सीमित हो गया है।
  • अमेरिका-चीन समझौता: चीन के प्रति अमेरिका की बढ़ती पहुँच और संभावित “G-2” व्यवस्था के संदर्भ विश्व के प्रभाव क्षेत्रों (spheres of influence) में विभाजित होने की चिंता उत्पन्न करते हैं, जिसमें चीन को एशिया में प्रमुख महाद्वीपीय शक्ति के रूप में माना जा सकता है।
  • ताइवान पर सतर्कता: ताइवान सहित चीन से जुड़ी संवेदनशीलता पर वाशिंगटन का नरम रुख बीजिंग के साथ एक संभावित रणनीतिक सामंजस्य का संकेत देता है।
  • भारत के प्रभाव में कमी: यदि अमेरिकी नीति में हिंद-प्रशांत ढाँचा अपना महत्त्व खो देता है, तो वाशिंगटन के एशियाई ढाँचे में भारत का रणनीतिक भार कम हो सकता है।
  • पश्चिम एशिया में अस्थिरता: अमेरिका-ईरान समझ और पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरण क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकते हैं, विशेष रूप से ईरान, ओमान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की और खाड़ी देशों के आसपास।
  • ईरान नीति की दुविधा: यदि वाशिंगटन स्वयं तेहरान के प्रति लचीला दृष्टिकोण अपनाता है, तो भारत को ईरानी तेल और चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी प्रतिबंधों के अनुपालन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।
  • दक्षिण एशिया में हस्तक्षेप: अमेरिका द्वारा एक क्षेत्रीय दूत की नियुक्ति और नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा मालदीव में बढ़ती व्यस्तता भारत के पड़ोस में अमेरिकी महत्त्वाकांक्षा को दर्शाती है।
  • कमजोर क्षेत्रीय मंच: सार्क (SAARC) के पतन और बिम्सटेक (BIMSTEC) की सीमित प्रभावशीलता ने अमेरिका तथा चीन जैसी बाह्य शक्तियों के लिए दक्षिण एशिया में प्रभाव विस्तार का स्थान बना दिया है।

इस बदलाव का भारत के लिए महत्त्व

  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को किसी भी एक अमेरिका-नेतृत्व वाले क्षेत्रीय ढाँचे पर अत्यधिक निर्भरता से बचना चाहिए, और अपने स्वतंत्र रणनीतिक विकल्पों को सुरक्षित रखना चाहिए।
  • समुद्री सुरक्षा: क्वाड की गति कमजोर होने से समुद्री डोमेन जागरूकता, समुद्री मार्ग सुरक्षा और हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र में समन्वय प्रभावित हो सकता है।
  • पड़ोस में नेतृत्व: दक्षिण एशिया में बाह्य प्रतिस्पर्धा भारत की पारंपरिक क्षेत्रीय प्रधानता को चुनौती देती है और इसके लिए नए राजनयिक प्रयासों की आवश्यकता है।
  • पश्चिम एशिया में हित: भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी हित, कनेक्टिविटी परियोजनाएँ और चाबहार रणनीति एक स्थिर तथा संतुलित पश्चिम एशिया नीति पर निर्भर करती है।
  • बहुध्रुवीय एशिया: यदि अमेरिका और चीन क्षेत्रीय राज्यों के द्विपक्षीय प्रबंधन की ओर बढ़ते हैं, तो एक बहुध्रुवीय एशिया का भारत का दृष्टिकोण कमजोर हो सकता है।

भारत के लिए नीतिगत आवश्यकताएँ अथवा निहितार्थ

  • हिंद-प्रशांत रणनीति का पुनर्मूल्यांकन: भारत को इसकी समीक्षा करनी चाहिए, कि क्या अमेरिका हिंद-प्रशांत ढाँचे के प्रति प्रतिबद्ध है, या वह एक संकीर्ण प्रशांत-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है।
  • वैकल्पिक गठबंधनों को पुनर्जीवित करना: भारत को भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान त्रिपक्षीय जैसे लघु-पक्षीय मंचों को मजबूत करना चाहिए, तथा लचीले समुद्री गठबंधनों का पता लगाना चाहिए।
  • क्वाड के कठोर परिणामों पर बल: भारत को समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, महत्त्वपूर्ण खनिजों, आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा आपदा प्रतिक्रिया में कठोर क्वाड परिणामों के लिए दबाव डालना चाहिए।
  • पश्चिम एशिया नीति का पुनर्संतुलन: नई दिल्ली को उभरती क्षेत्रीय संरचनाओं के आलोक में ईरान, इज़राइल, यूएई, सऊदी अरब, ओमान और कतर के साथ संबंधों को पुनः शामिल करना चाहिए।
  • चाबहार हितों की रक्षा: भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति के साथ स्वचालित संरेखण की बजाय राष्ट्रीय हित के आधार पर अपनी चाबहार तथा ईरानी ऊर्जा नीति का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए।
  • क्षेत्रीय नेतृत्व की बहाली: भारत को जहाँ संभव हो सार्क जैसे क्षेत्रीय जुड़ाव को पुनर्जीवित करना चाहिए, और बाह्य रणनीतिक अतिक्रमण का मुकाबला करने के लिए बिम्सटेक, IORA तथा SCO मंचों का उपयोग करना चाहिए।
  • कनेक्टिविटी कूटनीति का विस्तार: व्यापार, कनेक्टिविटी, गतिशीलता तथा विकास साझेदारी के माध्यम से क्षेत्रीय एकीकरण दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकता है।

निष्कर्ष

INDOPACOM से PACOM में बदलाव चीन, पश्चिम एशिया तथा दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्राथमिकताओं में गहन परिवर्तन का संकेत देता है। भारत को बदलते एशियाई क्रम में अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए रणनीतिक स्वायत्तता, मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व, विविध साझेदारी तथा तीव्र समुद्री कूटनीति के माध्यम से जवाब देना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. संयुक्त राज्य अमेरिका की रणनीति का INDOPACOM से वापस PACOM में बदलना केवल नामकरण में बदलाव नहीं, बल्कि गहन भू-राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और क्वाड (QUAD) के भविष्य पर इस परिवर्तन के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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