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भारत का निम्न-प्रजनन क्षमता वाला भविष्य तथा उसकी आवश्यकता

Lokesh Pal June 25, 2026 05:15 6 0

संदर्भ:

भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) गिरकर प्रति महिला 1.9 बच्चे हो गई है, जो कि प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। यह जनसंख्या-वृद्धि की चिंताओं से हटकर उम्र बढ़ने, श्रम-बाजार असंतुलन और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियों की ओर एक बड़े रणनीतिक परिवर्तन का संकेत है।

भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण

  • राष्ट्रीय स्तर पर निम्न प्रजनन क्षमता: भारत निम्न-प्रजनन चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसकी प्रजनन दर 2.2 के वैश्विक औसत और जनसंख्या स्थिरता के लिए आवश्यक प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे है।
  • असमान प्रजनन गिरावट: ग्रामीण प्रजनन क्षमता अभी भी प्रतिस्थापन स्तर के समीप है, जबकि शहरी प्रजनन क्षमता तेजी से गिरकर 1.5 पर आ गई है, जो एक सुदृढ़ ग्रामीण-शहरी जनसांख्यिकीय विभाजन को दर्शाती है।
  • क्षेत्रीय भिन्नता: दिल्ली की प्रजनन दर अति-निम्न 1.2 है, जबकि केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल 1.3 पर हैं। इसके विपरीत, बिहार अभी भी 2.9, उत्तर प्रदेश 2.6, मध्य प्रदेश 2.4 और राजस्थान 2.3 पर बना हुआ है।
  • विविध जनसांख्यिकीय अर्थव्यवस्थाएँ: भारत ने एक राष्ट्र के रूप में निम्न प्रजनन क्षमता को पार कर लिया है, लेकिन एक एकल जनसांख्यिकीय अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं; क्योंकि कुछ राज्य तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे हैं जबकि अन्य राज्यों में अभी भी कार्यबल में प्रवेश करने वाली महत्त्वपूर्ण युवा आबादी है।

प्रमुख जनसांख्यिकीय तथा सामाजिक चुनौतियाँ:

  • समय पूर्व वृद्धावस्था: भारत उच्च आय, औपचारिक रोजगार और मजबूत कल्याणकारी क्षमता हासिल करने से पूर्व ही ‘एजिंग फेज’ (वृद्धावस्था के चरण) में प्रवेश कर रहा है, जिसकी सहायता से पश्चिमी यूरोप और जापान ने अपनी वृद्ध आबादी का प्रबंधन किया था।
  • कमजोर वित्तीय आधार : भारत की प्रतिव्यक्ति आय कम है, प्रत्यक्ष कर आधार संकीर्ण तथा सामाजिक-क्षेत्र के व्यय के लिए उत्तरदायी राज्य सरकारें पहले से ही वित्तीय रूप से सीमित हैं।
  • अनौपचारिक कार्यबल: अधिकांश श्रमिक अनौपचारिक या अर्द्ध-औपचारिक रोजगार में बने हुए हैं, जिससे योगदान-आधारित पेंशन प्रणालियों को लागू करना कठिन हो जाता है क्योंकि उनकी आय अस्थिर है।
  • अपर्याप्त पेंशन सहायता: राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के तहत मौजूदा वृद्धावस्था पेंशन वास्तविक आय सुरक्षा प्रदान करने या वृद्धों की निर्भरता को कम करने के लिए अत्यंत कम है।
  • कमजोर घरेलू सुरक्षा जाल: शहरीकरण, प्रवसन, एकल परिवारों और महिलाओं की बढ़ती शैक्षिक व कार्य आकांक्षाओं के कारण संयुक्त परिवारों तथा अवैतनिक महिला देखभाल के माध्यम से प्राप्त होने वाला पारंपरिक समर्थन कमजोर हो रहा है।
  • वृद्धों की बढ़ती आबादी: भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की जनसंख्या 2050 तक लगभग 150 मिलियन से बढ़कर 347 मिलियन होने का अनुमान है, जिससे पेंशन, स्वास्थ्य देखभाल तथा देखभाल प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा।
  • स्वास्थ्य देखभाल संक्रमण: आयु में वृद्धि से उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मनोभ्रंश (dementia), दिव्यांगता और उपशामक निर्भरता (palliative dependence) से संबंधित दीर्घकालिक देखभाल की माँग बढ़ेगी, जो वर्तमान मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य लक्ष्यों से अत्यंत भिन्न है।
  • प्रवसन समस्याएँ: तेजी से वृद्ध होने वाले राज्य युवा आबादी वाले राज्यों के श्रमिकों पर अधिक निर्भर होंगे, लेकिन पोर्टेबल कल्याण और कौशल विकास के बिना, ऐसा प्रवसन निम्न वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र के संकट को और गहरा कर सकता है।

भारत की प्रजनन क्षमता में गिरावट का महत्त्व

  • जनसांख्यिकीय लाभांश का प्रबंधन: युवा आबादी वाले राज्यों को शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल के माध्यम से बड़ी कार्य-आयु वाले समूहों को उत्पादक मानव पूँजी में परिवर्तित करना होगा।
  • वृद्धावस्था की तैयारी: अधिक आयु और कम प्रजनन क्षमता वाले राज्यों को बढ़ती निर्भरता को प्रबंधित करने के लिए आय सुरक्षा, जेरियाट्रिक (वृद्धावस्था) स्वास्थ्य देखभाल तथा देखभाल अवसंरचना को मजबूत करना होगा।
  • संघीय श्रम संतुलन: आंतरिक प्रवासन एक राष्ट्रीय संतुलन तंत्र बन सकता है, बशर्ते कि गंतव्य अर्थव्यवस्थाओं में प्रवासी श्रमिकों को केवल अस्थायी श्रम की बजाय योगदानकर्ता के रूप में माना जाए।
  • सामाजिक सुरक्षा सुधार: भारत के इस भविष्य के लिए सार्वजनिक प्रणालियों को धीरे-धीरे उन जिम्मेदारियों को संभालना होगा, जो पहले बड़े परिवारों और अवैतनिक घरेलू देखभाल द्वारा उठाई जाती थीं।

वृद्ध भारत के लिए नीतिगत प्राथमिकताएँ

  • न्यूनतम पेंशन फ्लोर: भारत को अंशदायी पेंशन प्रणालियों को बदले बिना, एक बुनियादी सार्वजनिक सुरक्षा स्तर के रूप में मुद्रास्फीति-अनुक्रमित न्यूनतम पेंशन की आवश्यकता है।
  • अंशदायी प्रणालियों को मजबूत करना: अटल पेंशन योजना (APY) जैसी योजनाओं को अनियमित और अस्थिर आय वाले अनौपचारिक श्रमिकों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए।
  • जेरियाट्रिक (वृद्धावस्था) स्वास्थ्य देखभाल मिशन: वृद्धावस्था देखभाल (Geriatric care) को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, नर्सिंग अभ्यास, जिला स्वास्थ्य योजना और सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना में गहराई से एकीकृत किया जाना चाहिए।
  • युवा राज्यों में निवेश: बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और अन्य युवा राज्यों को स्कूली शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य देखभाल तथा रोजगार सृजन में आक्रामक निवेश की आवश्यकता है।
  • पोर्टेबल कल्याण लाभ: सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य कवरेज, खाद्य पात्रता और श्रम सुरक्षा को राज्य की सीमाओं के पार श्रमिकों के साथ पोर्टेबल (स्थानांतरण योग्य) होना चाहिए।
  • प्रवासी-समावेशी शासन: वृद्ध और धनी राज्यों को प्रवासियों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने वाले नागरिकों के रूप में पहचानना चाहिए, और उन्हें आवास, कल्याण तथा बुनियादी सेवाएँ प्रदान करनी चाहिए।
  • पारिवारिक-आधारित देखभाल से परिवर्तन: सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के तहत संयुक्त-परिवार प्रणालियों के कमजोर होने पर सार्वजनिक संस्थानों को आय, स्वास्थ्य तथा देखभाल सहायता का विस्तार करना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत की प्रजनन दर में गिरावट तभी समृद्धि का समर्थन कर सकती है, जब आयु में वृद्धि, अनौपचारिकता, प्रवासन और सामाजिक-सुरक्षा अंतराल को एक साथ संबोधित किया जाए। भारत के इस जनसांख्यिकीय संक्रमण को बनाए रखने के लिए मजबूत सार्वजनिक प्रणाली, पोर्टेबल कल्याण और विशिष्ट वृद्धावस्था स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना तैयार करना अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भारत एक निम्न-प्रजनन क्षमता वाले भविष्य की ओर बढ़ रहा है, जो जनसांख्यिकीय विषमता की प्रमुख विशेषता है। विश्लेषण कीजिए, कि यह संक्रमण किस प्रकार की वित्तीय, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करता है तथा वृद्ध होती आबादी के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक ढाँचे का सुझाव दीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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