//php print_r(get_the_ID()); ?>
Lokesh Pal
July 22, 2026 05:15
6
0
हाल के दौर में पश्चिम एशिया और यूरोप में एक साथ उत्पन्न हो रहे भू-राजनीतिक संकट एक बार फिर भारत की आर्थिक अवस्थिति तथा रणनीतिक धारणाओं की परीक्षा ले रहे हैं। वर्ष 1991 के अनुभव से ज्ञात होता है कि ऐसी बाह्य चुनौतियों का सामना केवल कूटनीतिक समायोजन से नहीं, बल्कि गहन घरेलू सुधारों के माध्यम से किया जा सकता है।
1991 की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि केवल कूटनीतिक लचीलापन भारत को वैश्विक प्रणालीगत संकटों से सुरक्षित नहीं रख सकता। वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता का आधार मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था, संस्थागत अनुकूलन क्षमता, क्षेत्रीय विशेषज्ञता तथा समय रहते सुधार करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है, ताकि बाह्य संकट राष्ट्रीय आपातस्थिति में परिवर्तित न हो सकें।
<div class="new-fform">
</div>

Latest Comments