Q. नैतिकता की एक ऐसी प्रणाली जो सापेक्ष भावनात्मक मूल्यों पर आधारित हो, भ्रम मात्र है जिसमें थोड़ी भी सच्चाई नहीं है।" – सुकरात (150 शब्द, 10 अंक)

August 9, 2023

GS Paper IVEthics, Integrity and Aptitude

उत्तर:

दृष्टिकोण:

  • परिचय:   इस उद्धरण के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  • मुख्य विषयवस्तु:
    • ऐसे कई उदाहरणों का उल्लेख कीजिए जहां भावनात्मक मूल्यों पर आधारित नैतिक व्यवस्था ने सामाजिक समस्याओं को जन्म दिया है।
    • इसका समाधान कैसे किया जा सकता है?
  • निष्कर्ष: आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष निकालिए।

परिचय:

सुकरात का कथन व्यक्तिपरक भावनात्मक मूल्यों पर आधारित होने के बजाय एक सुदृढ़ और वस्तुनिष्ठ नैतिक प्रणाली के महत्व पर प्रकाश डालता है। सापेक्ष भावनाओं पर आधारित एक नैतिक प्रणाली में निष्पक्षता का अभाव होता है और  व्यक्तिगत हितों के लिए इसमें हेरफेर किया जा सकता है, जिससे समाज में नैतिक भ्रम और अराजकता पैदा होती है।

मुख्य विषयवस्तु:

भारत में, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां भावनात्मक मूल्यों पर आधारित नैतिक व्यवस्था ने सामाजिक मुद्दों को जन्म दिया है

  • दहेज प्रथा: भारत में दहेज लेने और देने की प्रथा वस्तुनिष्ठ मानदंडों के बजाय भावनात्मक मूल्यों और सामाजिक दबाव पर आधारित है। इससे महिलाओं और उनके परिवारों का बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है और अकसर उनके खिलाफ उत्पीड़न और हिंसा होती है।
  • सांप्रदायिकता: भारत के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिकता प्रचलित है जहां लोगों की पहचान उनकी सामान्य मानवता के बजाय उनकी धार्मिक संबद्धता के आधार पर की जाती है। इस भावनात्मक मूल्य प्रणाली ने विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष, दंगों और सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया है।
  • बाल विवाह: भारत के कई हिस्सों में, बाल विवाह अभी भी प्रचलित है, जहां युवा लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले कर दी जाती है। यह अक्सर वस्तुनिष्ठ मानदंडों के बजाय पारिवारिक सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक स्थिति जैसे भावनात्मक मूल्यों पर आधारित होता है। मानदंड, और इसके परिणामस्वरूप बच्चे के अधिकारों और सेहत का उल्लंघन होता है।
  • लिंग और कामुकता के आधार पर भेदभाव: भारत में, अभी भी व्यक्तियों के खिलाफ उनके लिंग और यौन अभिविन्यास के आधार पर व्यापक भेदभाव होता है। यह भावनात्मक मूल्य प्रणाली वस्तुनिष्ठ मानदंडों के बजाय सामाजिक पूर्वाग्रहों पर आधारित है और इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों को समान अवसर, अधिकार और सम्मान से वंचित किया जाता है।
  • भ्रष्टाचार: भारत में भ्रष्टाचार , अक्सर  नैतिकता और वैधता के बजाय लालच, शक्ति और अधिकार जैसे भावनात्मक मूल्यों पर आधारित होता है। इसके परिणामस्वरूप देश की शासन प्रणालियों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी हो गई है, जिससे व्यापक सामाजिक और आर्थिक असमानता पैदा हो गई है।

निष्कर्ष:

सुकरात का कथन समाज में एक वस्तुनिष्ठ नैतिक व्यवस्था के महत्व पर जोर देता है, जो नैतिक व्यवहार और निर्णय लेने की नींव के रूप में काम कर सके। उपरोक्त उदाहरण व्यक्तिपरक भावनात्मक मूल्यों से उत्पन्न मुद्दों के समाधान के लिए समाज में एक मजबूत और उद्देश्यपूर्ण नैतिक प्रणाली की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं।

“A system of morality which is based on relative emotional values is a mere illusion, a thoroughly vulgar conception which has nothing sound in it and nothing true.” – Socrates in hindi

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