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Q. रणनीतिक खनिजों तक पहुँच अब केवल एक वाणिज्यिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि एक भू-राजनीतिक अनिवार्यता बन गई है। खनिज-समृद्ध देशों के साथ भारत की सहभागिता के संदर्भ में इस कथन की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

January 15, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • खनिज-समृद्ध देशों के साथ भारत की रणनीतिक सहभागिता

उत्तर

21वीं सदी में, हरित ऊर्जा और उच्च तकनीक रक्षा की ओर बढ़ते रुझान ने रणनीतिक खनिजों को वाणिज्यिक वस्तुओं से भू-राजनीतिक अनिवार्यता के रूप में स्थापित कर दिया है। भारत के लिए, लीथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा धातुओं जैसे खनिजों को सुरक्षित करना आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने और वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने के लिए आवश्यक है।

खनिज समृद्ध देशों के साथ भारत की रणनीतिक भागीदारी

भारत ने एक बहुआयामी “खनिज कूटनीति” रणनीति अपनाई है, जिसके तहत वह वैश्विक परिसंपत्तियों में केवल एक खरीदार होने के स्थान पर एक सक्रिय भागीदार बन गया है।

1. लैटिन अमेरिकी ‘लीथियम त्रिकोण’ (अर्जेंटीना, चिली, बोलीविया)

  • स्रोत परिसंपत्ति अधिग्रहण: भारत अपने इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिए दीर्घकालिक अन्वेषण अधिकार हासिल कर रहा है।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 की शुरुआत में, KABIL (खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड) ने अर्जेंटीना की CAMYEN के साथ कैटामार्का में पाँच लीथियम ब्राइन ब्लॉकों के अन्वेषण और विकास के लिए ₹200 करोड़ का समझौता किया।
  • रणनीतिक दृष्टिकोण: चिली और ब्राजील के साथ चल रही बातचीत लीथियम और ताँबे पर केंद्रित है, जो भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों को समर्थन प्रदान करती है।

2. ऑस्ट्रेलिया: विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार

  • चीन-मुक्त आपूर्ति शृंखलाएँ: भारत, महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन पर अपनी शत-प्रतिशत निर्भरता को कम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया को एक राजनीतिक रूप से स्थिर विकल्प के रूप में देखता है।
    • उदाहरण: भारत-ऑस्ट्रेलिया महत्त्वपूर्ण खनिज निवेश साझेदारी के तहत, संयुक्त निवेश के लिए पाँच लक्षित परियोजनाएँ (लीथियम और कोबाल्ट) चुनी गईं।

3. अफ्रीकी सीमांत (नामीबिया, जांबिया, DRC)

  • वैश्विक दक्षिण सहयोग: भारत, अफ्रीका के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों का लाभ उठाते हुए ताँबा और कोबाल्ट का अधिग्रहण करता है और बदले में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की पेशकश करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में जांबिया और नामीबिया की हालिया उच्च-स्तरीय यात्राओं का उद्देश्य मूल्यवर्द्धित साझेदारियों के माध्यम से ताँबे के भंडार और दुर्लभ-मृदा तत्त्वों का अधिग्रहण करना था।

4. बहुपक्षीय रणनीतिक गठबंधन

  • खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP): अमेरिका के नेतृत्व वाले इस “महत्त्वपूर्ण खनिज क्लब” के सदस्य के रूप में, भारत 13 अन्य देशों के साथ मिलकर टिकाऊ आपूर्ति शृंखलाओं में सार्वजनिक और निजी निवेश को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: MSP में भारत की भागीदारी उच्च स्तरीय प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों तक पहुँच सुनिश्चित करती है और बड़े पैमाने पर विदेशी खनन परियोजनाओं के जोखिम को कम करती है।
  • क्वाड ढाँचा: क्वाड के अंतर्गत, भारत जानबूझकर किए गए बाजार व्यवधानों का सामना करने के लिए “भंडारण और पुनर्चक्रण” मॉडल पर जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ समन्वय करता है।

5. रूस और ‘कार्यक्रम 2030’

  • रणनीतिक सुरक्षा: पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, भारत अपने आपूर्तिकर्ताओं के विविध पोर्टफोलियो को सुनिश्चित करने के लिए निकल और कोबाल्ट के लिए रूस के साथ संबंध बनाए रखता है।
    • उदाहरण: दिसंबर 2025 में हस्ताक्षरित भारत-रूस कार्यक्रम वर्ष 2030 में महत्त्वपूर्ण खनिजों को उच्च-तकनीकी आर्थिक सहयोग के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

भू-राजनीतिक अनिवार्यताएँ सहभागिता को बढ़ावा दे रही हैं

  • चीन के प्रभुत्व का मुकाबला: चीन दुर्लभ खनिजों की वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता के लगभग 85-90% हिस्से पर नियंत्रण रखता है; भारत की कूटनीति का उद्देश्य इस ‘संसाधन के शस्त्रीकरण’ को दरकिनार करना है।
  • रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा: उन्नत हथियार प्रणालियाँ और एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म टाइटेनियम और नियोडिमियम जैसे खनिजों की सुनिश्चित उपलब्धता पर निर्भर करते हैं, जिससे यह रणनीतिक स्वायत्तता का विषय बन जाता है।
  • जलवायु और ऊर्जा सुरक्षा: बैटरी खनिजों की स्थिर आपूर्ति के बिना वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य प्राप्त करना भौतिक रूप से असंभव है।

निष्कर्ष

ऐसा माना जाता है कि, “प्रसंस्करण क्षमता की बिना पहुँच से लचीलापन नहीं प्राप्त किया सकता है।” वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत का भविष्य “निष्कर्षण-आधारित” दृष्टिकोण से “मूल्य-शृंखला” साझेदारी मॉडल की ओर बढ़ने पर निर्भर करता है। राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (2024) जैसे घरेलू सुधारों को स्मार्ट, बहु-महाद्वीपीय कूटनीति के साथ एकीकृत करके, भारत 21वीं सदी की तकनीकी व्यवस्था का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक कच्चे माल को सुरक्षित कर सकता है।

Access to strategic minerals is no longer a commercial issue alone, but a geopolitical imperative. Discuss this statement with reference to India’s engagement with mineral-rich countries. in hindi

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