प्रश्न की मुख्य माँग
- प्रशासनिक विकेंद्रीकरण राजनीतिक सक्रियता का विकल्प नहीं है।
- प्रशासनिक विकेंद्रीकरण आंशिक रूप से राजनीतिक सक्रियता का पूरक (Substitute) हो सकता है।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
वर्ष 2019 में लद्दाख के पुनर्गठन के उपरांत, केंद्र सरकार ने प्रशासनिक पहुँच और सुशासन में सुधार के लिए नए जिलों के गठन की घोषणा की। इसके बावजूद, छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के दर्जे और विधायी सुरक्षा उपायों के लिए समानांतर रूप से उठ रही माँगे, यह स्पष्ट करती हैं कि केवल प्रशासनिक पुनर्गठन से इस क्षेत्र की पहचान, स्वायत्तता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी चिंताओं का समाधान नहीं किया जा सकता है।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण, राजनीतिक सक्रियता का विकल्प नहीं है
- प्रतिनिधित्व का अभाव: प्रशासनिक इकाइयाँ (जैसे नए जिले) लोक-सेवा वितरण में तो सुधार ला सकती हैं, परंतु वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों और विधायी प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी का स्थान कभी नहीं ले सकती हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2019 में लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने के बाद से वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की निरंतर माँग की जा रही है, तथापि यह क्षेत्र अब तक विधानसभा से वंचित है।
- छठी अनुसूची की आवश्यकता: जनजातीय पहचान, भूमि और संस्कृति को बाहरी दबावों से सुरक्षित रखने के लिए राजनीतिक सुरक्षा उपाय अपरिहार्य हैं।
- सहमति का सिद्धांत: वास्तविक लोकतंत्र का आधार जनता की विधायी और नीतिगत निर्णयों में सक्रिय सहभागिता है; इसे मात्र नौकरशाही-संचालित (Bureaucracy-driven) प्रशासनिक ढाँचे से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।
- उदाहरण: ‘लेह अपेक्स बॉडी’ (Leh Apex Body) और ‘कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस’ (Kargil Democratic Alliance) की आकांक्षाएँ केवल नए जिलों के गठन तक सीमित नहीं हैं; वे अपनी विशिष्ट पहचान के संरक्षण हेतु संवैधानिक सुरक्षा उपायों और सार्थक राजनीतिक विमर्श की माँग कर रहे हैं।
- रणनीतिक समावेशन: सीमा सुरक्षा तब और अधिक सुदृढ़ होती है, जब वहाँ के नागरिक राजनीतिक रूप से स्वयं को राष्ट्र का एक अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
- ऐतिहासिक सीख: यह तर्क देना कि कोई विशिष्ट क्षेत्र अभी ‘स्वशासन’ के लिए “तैयार नहीं” है, वास्तव में पितृसत्तात्मक शासन दृष्टिकोण को दर्शाता है।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण आंशिक रूप से राजनीतिक सक्रियता का पूरक (Substitute) हो सकता है
- सेवाओं की पहुँच: छोटे जिले, दुर्गम क्षेत्रों और कम आबादी वाले इलाकों में कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और सामान्य प्रशासन की पहुँच व वितरण में सुधार लाते हैं।
- रणनीतिक दक्षता: केंद्रीकृत शासन व्यवस्था संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में त्वरित निर्णय लेने की सुविधा प्रदान करती है।
- उदाहरण: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से लगे लद्दाख की रणनीतिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए वहाँ पृथक विधायिका के गठन का विरोध किया था।
- वित्तीय निर्भरता : जो क्षेत्र पूरी तरह से केंद्रीय कोष/अनुदान (Central funds) पर निर्भर हैं, उन्हें पूर्ण विधायी संस्थाओं के वित्तीय भार को वहन करने और उन्हें बनाए रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
- जनसंख्या की सीमाएँ: सीमित जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बड़े लोकतांत्रिक प्रतिनिधि संस्थानों का रखरखाव और उनका संचालन व्यावहारिक दृष्टिकोण से सुसंगत नहीं रह जाता है।
- स्थानीय शासन: विद्यमान स्वायत्त पर्वतीय परिषदें (Hill Councils) और जिला प्रशासन जमीनी स्तर पर पहले से ही सीमित मात्रा में स्थानीय स्वायत्तता और विकेंद्रीकृत लोकतांत्रिक सहभागिता का एक संस्थागत ढाँचा प्रदान करते हैं।
- उदाहरण: लेह और कारगिल में स्थित ‘लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद’ (LAHDC) कई स्थानीय विकासात्मक कार्यों का प्रबंधन करती है।
आगे की राह
- छठी अनुसूची में शामिल किया जाना: जनजातीय भूमि, संस्कृति और स्थानीय स्वायत्तता के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों का विस्तार करना।
- विधायी ढाँचा: लद्दाख की विशिष्ट और अद्वितीय परिस्थितियों के अनुकूल एक जन-प्रतिनिधित्व वाले विधायी ढाँचे का निर्माण करना।
- उदाहरण: भौगोलिक व जनसांख्यिकीय रूप से छोटा होने के बावजूद पुदुचेरी में निर्वाचित विधानसभा का होना, लद्दाख में विधायिका के गठन के पक्ष में एक मजबूत तार्किक आधार प्रदान करती है।
- संतुलित शासन व्यवस्था: प्रशासनिक दक्षता को लोकतांत्रिक जवाबदेही तंत्र के साथ एकीकृत कर एक सहकारी शासन का निर्माण किया जा सकता है।
- संस्थागत संवाद : केंद्र सरकार और लद्दाख के संगठनों के बीच संस्थागत विमर्श ही सुधारों का मार्ग प्रशस्त करने का आधार होना चाहिए।
- उदाहरण: लेह अपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के साथ निरंतर संवाद, क्षेत्रीय अलगाव को कम कर सकती है।
- समावेशी विकास: विकास नीतियाँ ऐसी होनी चाहिए, जो बुनियादी ढाँचे के विकास को सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी संरक्षण के साथ संतुलित करें।
- उदाहरण: नीति आयोग ने संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में ‘सतत् हिमालयी विकास’ पर विशेष बल दिया है।
निष्कर्ष
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण शासन की प्रभावशीलता में तो सुधार ला सकता है, परंतु दीर्घकालिक लोकतांत्रिक वैधता केवल राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक मान्यता के माध्यम से ही संभव है। लद्दाख के संदर्भ में, राष्ट्रीय सुरक्षा और जन-प्रतिनिधित्व वाले समावेशन के बीच का संतुलन ही यह निर्धारित करेगा कि वहाँ का विकास मात्र प्रशासनिक पहुँच तक सीमित रहता है या वास्तविक लोकतांत्रिक समावेशन का सृजन करता है।