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Q. आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई नीतियों को भारतीय संविधान में हाशिए पर पड़े समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली ऐतिहासिक और संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने के साधन के रूप में परिकल्पित किया गया था। इस संदर्भ में, उच्च शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के पर्याप्त प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

March 7, 2026

GS Paper IIIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
  • सार्वजनिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व की चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

आरक्षण के माध्यम से सकारात्मक भेदभाव को संविधान में शामिल किया गया ताकि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक भेदभाव और संरचनात्मक बहिष्करण की भरपाई की जा सके। संविधान के अनुच्छेद-15(4), 16(4) और 46 का उद्देश्य शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में उनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना है। फिर भी अनेक संरचनात्मक और संस्थागत चुनौतियाँ इन लक्ष्यों की प्रभावी प्राप्ति को सीमित करती रहती हैं।

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उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की चुनौतियाँ

  • पहुँच का अंतर: सामाजिक-आर्थिक वंचनाएँ हाशिए पर स्थित छात्रों की उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुँच को सीमित करती हैं।
    • उदाहरण: उच्च शिक्षा सर्वेक्षण की रिपोर्टों के अनुसार, अनुसूचित जनजाति के छात्रों का सकल नामांकन अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम बना हुआ है।
  • तैयारी में असमानता: विद्यालयी शिक्षा और कोचिंग सुविधाओं तक असमान पहुँच प्रवेश परीक्षाओं में प्रतिस्पर्द्धा को कम करती है।
    • उदाहरण: आरक्षित सीटों के बावजूद IIT-JEE एडवांस रैंक में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों का प्रतिनिधित्व कम देखा जाता है।
  • संस्थागत स्तर पर पढ़ाई छोड़ना: शैक्षणिक दबाव और सहायक व्यवस्थाओं की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ने की दर अधिक रहती है।
  • शिक्षक स्तर पर सीमित प्रतिनिधित्व: विश्वविद्यालयों के अध्यापक वर्ग में वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व कम है।
    • उदाहरण: संसद में हुई चर्चाओं में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अध्यापकों की कम मौजूदगी का उल्लेख किया गया।
  • सामाजिक भेदभाव: सूक्ष्म जातिगत भेदभाव और बहिष्करणात्मक परिसर संस्कृति छात्रों की भागीदारी और निरंतरता को प्रभावित करती है।
    • उदाहरण: उच्च शिक्षा परिसरों में छात्रावासों में अलगावपूर्ण व्यवहार और भेदभाव से संबंधित शिकायतों की रिपोर्टें सामने आती रही हैं।

सार्वजनिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व की चुनौतियाँ

  • क्रियान्वयन में अंतराल: प्रशासनिक विलंब या भर्ती प्रक्रियाओं के कारण आरक्षित पद अक्सर रिक्त रह जाते हैं।
    • उदाहरण: संसदीय समितियों ने केंद्रीय सरकारी विभागों में आरक्षित पदों के रिक्त रहने पर चिंता व्यक्त की है।
  • पदोन्नति में बाधाएँ: पदोन्नति में आरक्षण का प्रश्न कानूनी और प्रशासनिक रूप से विवादित बना हुआ है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय—एम. नागराज (2006) और जर्नैल सिंह (2018)—में पदोन्नति में आरक्षण को उचित ठहराने के लिए आँकड़ों की आवश्यकता पर बल दिया गया।
  • क्रीमी लेयर की बहस: अन्य पिछड़े वर्गों के भीतर पात्रता निर्धारित करना नीतिगत जटिलता उत्पन्न करता है।
    • उदाहरण: केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर क्रीमी लेयर की आय सीमा का पुनरीक्षण किया जाता है।
  • संस्थागत प्रतिरोध: नौकरशाही दृष्टिकोण और प्रशासनिक विवेक कभी-कभी आरक्षण के क्रियान्वयन को कमजोर कर देते हैं।
    • उदाहरण: सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती प्रक्रियाओं में आरक्षण रोस्टर लागू करने में विलंब देखा जाता है।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ: विभिन्न राज्यों और संस्थानों में आरक्षण के क्रियान्वयन में व्यापक भिन्नता पाई जाती है।
    • उदाहरण: केंद्रीय संस्थानों और राज्य विश्वविद्यालयों की आरक्षण नीतियों में अंतर देखा जाता है।

निष्कर्ष

यद्यपि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए सकारात्मक भेदभाव की नीतियाँ महत्त्वपूर्ण साधन बनी हुई हैं, फिर भी लगातार बनी रहने वाली संरचनात्मक बाधाएँ उनकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। क्रियान्वयन तंत्र को सुदृढ़ करना, शिक्षा तक पहुँच में सुधार करना तथा संस्थागत भेदभाव को दूर करना भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों और सार्वजनिक संस्थाओं में वंचित समुदायों के सार्थक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Affirmative action policies such as reservations were envisioned in the Indian Constitution as instruments to address historical and structural inequalities faced by marginalised communities. In this context, examine the challenges in ensuring adequate representation of SC, ST, and Other Backward Classes in higher education and public institutions. in hindi

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