Q. होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने भारत के उर्वरक क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है। भारत की कृषि सुरक्षा पर इसके कारणों और प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत की कृषि सुरक्षा को प्रभावित करने वाले कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • भारत की कृषि सुरक्षा पर प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने भारत के उर्वरक क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है, जो आयात निर्भरता, सब्सिडी संबंधी विकृतियों और कमजोर विकल्पों से चिह्नित हैं। यह स्थिति कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और किसानों की स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करती है।

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भारत की कृषि सुरक्षा को प्रभावित करने वाले कारण

  • उर्वरकों के लिए उच्च आयात निर्भरता: भारत यूरिया, DAP और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
    • उदाहरण: सरकारी आँकड़ों के अनुसार, लगभग 80–90% पोटाश और 50% DAP आयात किए जाते हैं।
  • भू-राजनैतिक अवरोधों के प्रति संवेदनशीलता: पश्चिम एशियाई मार्गों पर निर्भरता के कारण आपूर्ति बाधित होने का जोखिम बना रहता है।
    • उदाहरण: हॉर्मुज जलडमरूमध्य उर्वरक कच्चे माल के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा सँभालता है।
  • सब्सिडी के कारण यूरिया का अत्यधिक उपयोग: मूल्य विकृति के कारण नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग होता है।
    • उदाहरण: यूरिया को अन्य उर्वरकों की तुलना में अधिक सब्सिडी मिलती है, जिससे इसका असंतुलित उपयोग बढ़ता है।
  • घरेलू उत्पादन क्षमता की कमी: प्राकृतिक गैस और रॉक फॉस्फेट जैसे कच्चे संसाधनों की कमी के कारण घरेलू उत्पादन सीमित है।
    • उदाहरण: DAP उत्पादन के लिए भारत को रॉक फॉस्फेट आयात करना पड़ता है।
  • विकल्पों को अपनाने में धीमापन: जैव उर्वरक और जैविक इनपुट का उपयोग अभी भी सीमित है।
    • उदाहरण: पीएम-प्रणाम योजना जैसी पहलें अभी प्रारंभिक चरण में हैं।

भारत की कृषि सुरक्षा पर प्रभाव

  • किसानों के लिए बढ़ती लागत: वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव के कारण उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे किसानों की लागत में वृद्धि होती है।
    • उदाहरण: यूक्रेन युद्ध के बाद उर्वरक कीमतों में वृद्धि ने भारतीय किसानों को प्रभावित किया।
  • फसल उत्पादकता पर खतरा: आपूर्ति में कमी के कारण उर्वरकों का उपयोग घट सकता है, जिससे धान और गेहूँ जैसी फसलों की उपज प्रभावित होती है।
  • सरकार पर राजकोषीय बोझ: किसानों को राहत देने के लिए सरकार को सब्सिडी व्यय बढ़ाना पड़ता है।
    • उदाहरण: हाल के वर्षों में उर्वरक सब्सिडी ₹2 लाख करोड़ से अधिक हो गई है।
  • मृदा स्वास्थ्य में गिरावट: उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, विशेषकर यूरिया के अत्यधिक प्रयोग, से मृदा उर्वरता में गिरावट आती है, जिससे दीर्घकालिक उत्पादकता प्रभावित होती है।
  • खाद्य सुरक्षा पर जोखिम: कम उत्पादन और बढ़ती लागत से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न होता है।
    • उदाहरण: भारत में 50% से अधिक आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है।

आगे की राह

  • आयात स्रोतों और आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण: पश्चिम एशियाई मार्गों पर निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न देशों से आयात को बढ़ावा देना आवश्यक है।
    • उदाहरण: मोरक्को और रूस जैसे देशों के साथ समझौते।
  • घरेलू उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा: यूरिया और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।
    • उदाहरण: गोरखपुर जैसे यूरिया संयंत्रों का पुनरुद्धार।
  • संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहन: नीतिगत सुधारों के माध्यम से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
    • उदाहरण: पोषक तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना।
  • जैव उर्वरकों और विकल्पों का विस्तार: रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए जैव उर्वरकों और अन्य विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए।
    • उदाहरण: इफको (IFFCO) द्वारा नैनो-यूरिया का प्रोत्साहन।
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को सुदृढ़ करना: दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए मृदा स्वास्थ्य में सुधार आवश्यक है।
    • उदाहरण: मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से किसानों को मृदा की गुणवत्ता संबंधी जानकारी प्रदान करना।

निष्कर्ष

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने भारत की उर्वरक क्षेत्र में कमजोरियों को एक गंभीर कृषि जोखिम के रूप में उजागर किया है। आयात निर्भरता को कम करना, नीतिगत विकृतियों को सुधारना तथा सतत् विकल्पों को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि कृषि प्रणाली को सुदृढ़ बनाया जा सके और दीर्घकालिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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