Q. POCSO अधिनियम के कठोर 'सहमति की आयु' के तहत बाल संरक्षण और किशोर स्वायत्तता के बीच संघर्ष का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। हाल के न्यायिक विचारों के आलोक में, सहमति से बने किशोर संबंधों की वास्तविकता के साथ सुरक्षा को संतुलित करने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

January 13, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संरक्षण और स्वायत्तता के बीच संघर्ष
  • सुरक्षा और वास्तविकता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए सुझाए गए उपाय।

उत्तर

बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012, ‘बच्चे’ को 18 वर्ष से कम आयु के रूप में परिभाषित करता है, और सहमति की एक निश्चित एवं स्पष्ट  आयु निर्धारित करता है। हालाँकि इसका उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है, लेकिन यह “स्पष्ट” नियम किशोरों की विकसित होती क्षमताओं और प्रेम संबंधी स्वायत्तता के साथ लगातार टकराव उत्पन्न करता है और अक्सर स्वैच्छिक सहपाठी संबंधों को अपराध की श्रेणी में डाल देता है।

संरक्षण और स्वायत्तता के बीच संघर्ष

  • व्यापक अपराधीकरण: कानून नाबालिगों से जुड़े प्रत्येक यौन कृत्य को वैधानिक दुष्कर्म करार देता है, दुर्व्यवहार और सहमति से बने किशोर संबंधों के बीच कोई अंतर नहीं करता है।
    • उदाहरण: नागरिक समाज संगठनों द्वारा वर्ष 2024-25 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 25% POCSO मामले सहमति से बने अंतरंग संबंधों से उत्पन्न होते हैं।
  • स्वायत्तता का हनन: एक कठोर आयु सीमा निर्धारित करके, यह अधिनियम 16-18 वर्ष के किशोरों की विकसित होती क्षमताओं की अनदेखी करता है, जिससे उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता  बाधित होती है।
    • उदाहरण: कलकत्ता उच्च न्यायालय (2024) ने पाया कि POCSO की व्यापक अपराधीकरण नीति, अक्सर एक लड़की की पहचान और एक किशोर की विकसित होती क्षमताओं का उल्लंघन करती है।
  • परिवारों द्वारा दुरुपयोग: माता-पिता अक्सर POCSO का दुरुपयोग अंतरजातीय/अंतरधार्मिक संबंधों को दंडित करने के लिए करते हैं, जिसमें अनिवार्य रिपोर्टिंग और कठोर जमानत नियमों का सहारा लिया जाता है।
  • कलंक और आघात: अनिवार्य चिकित्सा जाच और लंबे समय तक चलने वाले आपराधिक मुकदमे किशोरों को शारीरिक एवं मानसिक आघात पहुँचाते  हैं ।
    • उदाहरण: अनुराध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक ‘गंभीर सामाजिक अंतराल’ को रेखांकित किया, जिसमें बताया गया कि कैसे POCSO का दुरुपयोग बच्चों को भय के माध्यम से चुप करा देता है, जबकि गरीबी एवं कलंक परिवारों को न्याय तक पहुँच को बाधित करते हैं।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: अनिवार्य रिपोर्टिंग (धारा 19) के भय से किशोर-किशोरी आवश्यक यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य (SRH) सेवाओं या सुरक्षित गर्भपात कराने से कतराते हैं।
    • उदाहरण: विभिन्न शोध से पता चलता है कि किशोरियाँ अक्सर POCSO के तहत अस्पताल में रिपोर्टिंग से उत्पन्न होने वाले कानूनी परिणामों से बचने के लिए असुरक्षित गुप्त गर्भपात का सहारा लेती हैं।
  • न्यायिक बोझ: विशेष न्यायालयों में प्रेम संबंधी मामलों की भरमार  है, जिनमें बरी कर दिया जाता है, जिससे वास्तविक बाल शोषण के मुकदमों से ध्यान भटक जाता है।

सुरक्षा और वास्तविकता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए सुझाए गए उपाय

  • कम आयु का अंतर: सहमत यौन कृत्यों के लिए सीमित छूट प्रदान करें, जहाँ भागीदारों के बीच आयु का अंतर (उदाहरण के लिए, 2-3 वर्ष से कम) कम हो।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय (2026) ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह वास्तविक किशोर संबंधों को POCSO के कठोर प्रावधानों से छूट देने के लिए ‘रोमियो-जूलियट’ खंड पर विचार करे।
  • निर्देशित सजा का विवेक: अधिनियम में संशोधन करके न्यायाधीशों को 16-18 वर्ष की आयु के किशोरों से जुड़े मामलों में अनिवार्य न्यूनतम सजा को कम करने या माफ करने की विवेकाधीन शक्ति प्रदान करें।
    • उदाहरण: विधि आयोग (रिपोर्ट 283) ने वर्तमान कठोर ढाँचे की कठोरता को दूर करने के लिए सजा में “निर्देशित न्यायिक विवेक” की सिफारिश की।
  • पूर्व-परीक्षण जाँच: FIR दर्ज करने से पूर्व सहमति से बने मामलों का पता लगाने  के लिए बाल कल्याण समिति (CWC) द्वारा प्रारंभिक मूल्यांकन की व्यवस्था स्थापित करना।
  • यौन स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित आश्रय: धारा 19 में संशोधन करके किशोरों द्वारा गोपनीय प्रजनन स्वास्थ्य सलाह या सेवाओं की माँग करने पर स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रतिरक्षा प्रदान की जाए।
  • पुनर्स्थापनात्मक न्याियक दृष्टिकोण: गैर-शोषणकारी सहकर्मी संबंधों के लिए कारावास के बजाय पारिवारिक मध्यस्थता और गोपनीय परामर्श पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
    • उदाहरण: न्यायालयों ने अनुच्छेद-142 का उपयोग उन मामलों में दोषसिद्धि को रद्द करने के लिए किया है, जहाँ दंपतियों ने बाद में विवाह कर लिया है और स्थिर पारिवारिक जीवन जी रहे हैं।
  • आयु-उपयुक्त शिक्षा: किशोरों को “सहमति” और यौन शोषण के कानूनी निहितार्थों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए व्यापक यौन शिक्षा को विद्यालय के पाठ्यक्रम में एकीकृत करना।

निष्कर्ष

यद्यपि बच्चों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है, फिर भी कानून को एक ऐसा कठोर हथियार नहीं बनना चाहिए, जो उन्हीं युवाओं को पीड़ित करे, जिन्हें वह बचाना चाहता है। POCSO में “निकट आयु” अपवाद को शामिल करने के लिए सुधार करने से यह सुनिश्चित होगा कि आपराधिक न्याय प्रणाली वर्ष 2047 तक भारत के किशोरों की मानवीय गरिमा और विकसित होती स्वायत्तता का सम्मान करते हुए वास्तविक अपराधियों को लक्ष्य बनाएगी।

Critically analyse the conflict between child protection and adolescent autonomy under the POCSO Act’s rigid ‘age of consent’. In light of recent judicial views, suggest measures to balance safety with the reality of consensual adolescent relationships. in hindi

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