Q. इजराइल के साथ भारत की भागीदारी वैचारिक स्थिति से रणनीतिक व्यावहारिकता की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। पश्चिम एशिया में भारत की "विभाजन-मुक्त" नीति के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वैचारिक स्थिति से रणनीतिक व्यवहारवाद की ओर परिवर्तन का उल्लेख कीजिए।
  • इस परिवर्तन के निहितार्थों का वर्णन कीजिए।

उत्तर

भारत की पश्चिम एशिया नीति वैचारिक आग्रहों से आगे बढ़कर व्यावहारिक एवं रणनीतिक सहभागिता की दिशा में विकसित हुई है। “डी-हाइफनेशन” (अर्थात् संबंधों को एक-दूसरे से अलग कर देखने) की नीति के माध्यम से भारत ने इजरायल के साथ स्वतंत्र संबंध बनाए रखते हुए अरब देशों के साथ भी अपने संबंधों को सुदृढ़ बनाए रखा है। यह परिवर्तन ऐतिहासिक वैचारिक विचारों की अपेक्षा सुरक्षा, व्यापार तथा प्रौद्योगिकी सहयोग को प्राथमिकता देने की भारत की नीति को प्रतिबिंबित करता है।

वैचारिक स्थिति से रणनीतिक व्यवहारवाद की ओर परिवर्तन

  • स्वतंत्र द्विपक्षीय सहभागिता: भारत फिलिस्तीन संबंधों से अलग रखते हुए इजरायल के साथ सीधे और स्वतंत्र रूप से संबंध स्थापित कर रहा है।
    • उदाहरण: वर्ष 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा एक स्वतंत्र दौरा है, जिसमें फिलिस्तीनी प्राधिकरण के नेतृत्व की भागीदारी नहीं है।
  • सुरक्षा सहयोग: वैचारिक समानता के स्थान पर पारस्परिक सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • उदाहरण: भारत इजरायल से उन्नत हथियार आयात करता है, बराक-8 मिसाइल प्रणाली का संयुक्त विकास करता है तथा आयरन बीम लेजर प्रणाली की खरीद की संभावनाओं का अन्वेषण कर रहा है।
  • आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी सहयोग: राजनीतिक प्रतीकवाद की अपेक्षा व्यापार, निवेश और नवाचार पर अधिक बल दिया जा रहा है।
    • उदाहरण: वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 3.75 अरब डॉलर तक पहुँचा; कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स, जल प्रबंधन और कृषि के क्षेत्रों में सहयोग।
  • क्षेत्रीय सामरिक संतुलन: यह सहभागिता क्षेत्रीय संघर्षों में भारत की संतुलित एवं तटस्थ भूमिका को सुदृढ़ करती है।
    • उदाहरण: भारत ने गाजा शांति पहलों में प्रेक्षक के रूप में भाग लिया, साथ ही इजरायल और अरब देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे।
  • दीर्घकालिक सामरिक साझेदारी: व्यावहारिक दृष्टिकोण वैचारिक एकजुटता के स्थान पर हित-आधारित और स्थायी संबंधों को सुनिश्चित करता है।
    • उदाहरण: संयुक्त रक्षा अनुसंधान एवं विकास समझौते, मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ता तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC)।

इस परिवर्तन के निहितार्थ

  • रक्षा क्षमताओं में वृद्धि: इजरायल की उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच भारत की सुरक्षा तथा आतंकवाद-रोधी क्षमताओं को सुदृढ़ करती है।
    • उदाहरण: बराक-8 वायु रक्षा प्रणाली और निगरानी प्लेटफॉर्म का संयुक्त विकास।
  • आर्थिक विकास के अवसर: विविधीकृत व्यापार एवं निवेश साझेदारियाँ नवाचार और अवसंरचना विकास को प्रोत्साहित करती हैं।
  • प्रौद्योगिकी उन्नति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जल प्रबंधन और कृषि में सहयोग घरेलू क्षमता निर्माण को गति देता है।
    • उदाहरण: उच्च सघनता बागवानी और जल प्रौद्योगिकी पर केंद्रित भारत में 35 उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं।
  • भू-राजनैतिक प्रभावशीलता: डी-हाइफनेशन नीति भारत को पश्चिम एशिया के संघर्षों में एक संतुलित मध्यस्थ की भूमिका निभाने की क्षमता प्रदान करती है।
    • उदाहरण: जनवरी 2026 में भारत ने अरब विदेश मंत्रियों की मेजबानी की, साथ ही इजरायल के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ किया।
  • सामरिक स्वायत्तता: यह परिवर्तन वैचारिक गुटों पर निर्भरता को कम करता है और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को सुदृढ़ करता है।
    • उदाहरण: भारत  IMEC ढाँचे के अंतर्गत इजरायल, खाड़ी देशों और यूरोपीय साझेदारों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखता है।

निष्कर्ष

भारत की व्यवहारिक पश्चिम एशिया नीति सुरक्षा, आर्थिक तथा प्रौद्योगिकी संबंधी लाभों को सुदृढ़ करते हुए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हो रही है। रक्षा सहयोग को और मजबूत करना, व्यापार एवं मुक्त व्यापार समझौते (FTA) वार्ताओं को आगे बढ़ाना तथा नवाचार-आधारित साझेदारियों का प्रभावी उपयोग करना भारत की सामरिक स्वायत्तता को और सुदृढ़ कर सकता है। इससे भारत क्षेत्र में एक विश्वसनीय, प्रभावशाली और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित हो सकता है।

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