Q. भारत में वीआईपी संस्कृति औपनिवेशिक मानसिकता और शासन में सहानुभूति की कमी की अभिव्यक्ति है। लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में इसके नैतिक आयामों का विश्लेषण कीजिए तथा नागरिक-केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 29, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में वीआईपी संस्कृति के नैतिक आयामों का विश्लेषण कीजिए।
  • नागरिक-केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

भारत में वीआईपी संस्कृति विशेषाधिकार और पदानुक्रमित शासन की औपनिवेशिक विरासत को दर्शाती है, जो अक्सर लोकतांत्रिक आदर्शों के विपरीत जाती है। यह निष्पक्षता, गरिमा और लोकहित से जुड़े नैतिक प्रश्नों को उजागर करती है तथा संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिक-केंद्रित प्रशासन की प्रकृति पर पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में वीआईपी संस्कृति के नैतिक आयाम

  • मानवीय गरिमा का उल्लंघन: प्राथमिकता आधारित व्यवहार, जैसे ट्रैफिक प्रतिबंध, विशेष विशेषाधिकार या सार्वजनिक सम्मान, नागरिकों के बीच एक पदानुक्रम स्थापित करता है, जिससे समान सम्मान के सिद्धांत को कमजोर किया जाता है।
  • निष्पक्षता और समानता का ह्रास: चयनात्मक शासन, जैसे केवल वीआईपी दौरे के दौरान सड़कों की मरम्मत या क्षेत्रों का सौंदर्यीकरण, वितरणात्मक न्याय का उल्लंघन करता है और असमानता को बढ़ावा देता है। यह संकेत देता है कि सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच नागरिकता के बजाय दर्जे पर निर्भर करती है, जो अनुच्छेद-14 का विरोध करता है।
  • सार्वजनिक हित की उपेक्षा: राजनीतिक रैलियों या वीआईपी आवागमन के लिए ट्रैफिक बाधित करना, सामूहिक कल्याण के बजाय व्यक्तिगत या अभिजात वर्ग की सुविधा को प्राथमिकता देता है। ऐसी प्रथाएँ अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम भलाई के नैतिक सिद्धांत पर खरी नहीं उतरती हैं।
  • औपनिवेशिक विरासत और शक्ति दूरी: वीआईपी संस्कृति औपनिवेशिक काल की सत्ता और विशेषाधिकार की धारणाओं को बनाए रखती है, जिससे लोकसेवकों में सहानुभूति की कमी उत्पन्न होती है। यह एक ऐसे शासन दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहाँ शासक नागरिकों से अलग माने जाते हैं, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही के विपरीत है।

नागरिक-केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देने के उपाय

  • संस्थागत सुधार और नियमों का पालन: वीआईपी विशेषाधिकारों को सीमित करने वाले दिशा-निर्देशों (जैसे- सायरन के सीमित उपयोग, ट्रैफिक रोकने पर नियंत्रण) का कड़ाई से पालन प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करता है और कानून के समक्ष समानता को मजबूत करता है।
  • लोकसेवकों का नैतिक संवेदनशीलता विकास: गरिमा, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित जैसे ढाँचों के आधार पर नैतिक प्रशिक्षण, मूल्य-आधारित निर्णय-निर्माण को प्रोत्साहित कर सकता है। सहानुभूति और लोकसेवा उन्मुखता पर जोर, पदानुक्रमित व्यवहार को कम करता है।
  • जवाबदेही और पारदर्शिता को सुदृढ़ करना: नागरिक चार्टर, सामाजिक लेखापरीक्षा और शिकायत निवारण तंत्र यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि शासन संबंधी निर्णय जनता के प्रति जवाबदेह हों, जिससे मनमानी पक्षपातपूर्ण व्यवहार को रोका जा सके।
  • नैतिक नेतृत्व और नागरिक संस्कृति को बढ़ावा देना: विनम्रता का प्रदर्शन करने वाले नेता, जैसे- कतार में खड़े होना या विशेषाधिकारों से बचना नैतिक उदाहरण स्थापित करते हैं। इससे ऐसी संस्कृति विकसित होती है, जहाँ सार्वजनिक पद को प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सेवा के रूप में देखा जाता है।

निष्कर्ष

वीआईपी संस्कृति, नागरिकता के बजाय दर्जे को प्राथमिकता देकर लोकतांत्रिक नैतिकता को कमजोर करती है। इससे निपटने के लिए गरिमा, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित पर आधारित संस्थागत सुधार और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता है, ताकि शासन समावेशी, जवाबदेह और वास्तव में नागरिक-केंद्रित बन सके।

VIP culture in India is a manifestation of colonial hangover and an empathy deficit in governance. Analyse its ethical dimensions in the context of democratic values and suggest measures to foster a citizen centric administration. in hindi

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