Q. हाल ही में पराली जलाने की घटनाओं में कमी से संबंधित आँकड़ों में सामने आई विसंगतियों के संदर्भ में, भारत में पराली जलाने के आकलन के लिए उपयोग किए जाने वाले वर्तमान आँकड़ों और निगरानी पद्धतियों की सीमाओं का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • डेटा और निगरानी पद्धतियों में कमियाँ।
  • इनका समाधान कैसे करें?

उत्तर

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने में 90 प्रतिशत कमी के हालिया दावों पर उपग्रह साक्ष्यों के आधार पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, क्योंकि वास्तविक रूप से जले हुए क्षेत्र में गिरावट कहीं कम दिखाई देती है। आग की घटनाओं की गणना और जले हुए क्षेत्र के आकलन के बीच यह असंगति वर्तमान निगरानी पद्धतियों की खामियों को उजागर करती है। इससे भारत में पराली-दहन के आकलन की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न हुआ है।

वर्तमान आँकड़ों और निगरानी पद्धतियों की सीमाएँ

  • आग-गणना संकेतकों पर अत्यधिक निर्भरता: उपग्रहों द्वारा दर्ज आग की घटनाओं को वास्तविक प्रदूषण प्रभाव के स्थानापन्न के रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे दहन के पैमाने और तीव्रता का सही आकलन नहीं हो पाता।
    • उदाहरण: आग की घटनाओं में 90 प्रतिशत कमी के दावे के बावजूद, जले हुए क्षेत्र के आँकड़े वर्ष 2022 से वर्ष 2025 के बीच केवल लगभग 30 प्रतिशत कमी दर्शाते हैं।
  • जले हुए क्षेत्र का अपर्याप्त मापन: वास्तविक रूप से प्रभावित भूमि को दर्शाने वाला जला हुआ क्षेत्र, न तो व्यवस्थित रूप से प्राथमिकता में रखा जाता है और न ही वर्षवार सार्वजनिक किया जाता है।
    • उदाहरण: स्वतंत्र आकलनों के अनुसार, जला हुआ क्षेत्र लगभग 31,500 वर्ग किलोमीटर (वर्ष 2022) से घटकर 19,700 वर्ग किलोमीटर (वर्ष 2025) हुआ, जो आधिकारिक दावों से संरेखित  नहीं है।
  • उपग्रह निगरानी में समयगत रिक्तताएँ: ध्रुवीय कक्षा आधारित उपग्रह दिन के सीमित समय में ही भारत का अवलोकन करते हैं, जिससे अन्य समय पर लगाई गई अग्नि की घटनाएँ दर्ज नहीं हो पाती।
    • उदाहरण: ये उपग्रह प्रायः सुबह 10 बजे से दोपहर 1:30 बजे के बीच गुजरते हैं, जबकि किसानों द्वारा आग शाम के समय लगाए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
  • किसानों में बचाव-आधारित व्यवहार: निगरानी प्रणालियाँ अनभिज्ञता पूर्वक किसानों को दहन प्रक्रिया समाप्त करने के स्थान पर पहचान से बचने हेतु अपने तरीकों में बदलाव के लिए प्रेरित करती हैं।
  • स्रोत-विभाजन साक्ष्यों का अभाव: रासायनिक पहचान तकनीकों की कमी के कारण दिल्ली में मानसूनोत्तर प्रदूषण के लिए पराली-दहन की स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
    • उदाहरण: प्रदूषकों की संरचना जानने हेतु आवश्यक द्रव्यमान-वर्णक्रमीय विश्लेषण नहीं किया गया है।

आँकड़ों और निगरानी पद्धतियों में सुधार के उपाय

  • जले हुए क्षेत्र को मुख्य संकेतक बनाना: अग्नि-गणना से हटकर व्यापक जले हुए क्षेत्र के आकलन पर ध्यान केंद्रित किया जाए, ताकि वास्तविक आधारभूत प्रभाव परिलक्षित हो।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2024 में स्पष्ट रूप से जले हुए क्षेत्र के आकलन के उपयोग का निर्देश दिया।
  • बहु-उपग्रह आँकड़ों का एकीकरण: ध्रुवीय और भूस्थिर उपग्रहों के आँकड़ों को मिलाकर चौबीसों घंटे निगरानी सुनिश्चित की जाए और समयगत पक्षपात घटाया जाए।
    • उदाहरण: भूस्थिर उपग्रहों के निरंतर अवलोकन से ऐसे पैटर्न सामने आए जो ध्रुवीय उपग्रहों से छूट गए थे।
  • पारदर्शिता और सार्वजनिक प्रकटीकरण: वर्षवार जले हुए क्षेत्र और प्रयुक्त कार्यप्रणाली के आँकड़े सार्वजनिक किए जाएँ, जिससे स्वतंत्र जाँच संभव हो और विश्वास निर्माण हो।
  • प्रदूषण स्रोत-विभाजन उपकरणों का उपयोग: कणिकीय पदार्थ के रासायनिक विश्लेषण द्वारा वायु प्रदूषण में पराली-दहन के प्रत्यक्ष योगदान का आकलन किया जाए।
  • प्रोत्साहनों को सत्यापित परिणामों से जोड़ना: अनुदानों और प्रोत्साहनों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित जले हुए क्षेत्र और प्रदूषण प्रभाव में कमी से जोड़ा जाए, न कि केवल आग को घटनाओं की गणना से।

निष्कर्ष

पराली-दहन का सटीक आकलन केवल आग की घटनाओं की संख्या पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और पारदर्शी मानकों पर आधारित होना चाहिए। जले हुए क्षेत्र के विश्लेषण, बहु-उपग्रह निगरानी और प्रदूषण स्रोत-निर्धारण को एकीकृत करने से वर्तमान विकृतियों को सुधारा जा सकता है। विश्वसनीय आँकड़े प्रभावी नीति-निर्माण और वायु-प्रदूषण संबंधी प्रशासन में जन-विश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

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