प्रश्न की मुख्य माँग
- ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 जैसे कानूनी प्रावधानों की सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
- बताइए कि भारतीय शहरों में ध्वनि प्रदूषण के प्रभावी नियंत्रण में बाधा बनने वाली सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ क्या हैं।
- शहरी ध्वनि प्रदूषण के प्रभावी शमन हेतु आवश्यक व्यापक उपाय सुझाइए।
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उत्तर
ध्वनि प्रदूषण केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सुशासन से जुड़ी चुनौती भी है। ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 जैसे कानूनी प्रावधानों के बावजूद कमजोर प्रवर्तन तथा सामाजिक-राजनीतिक सहिष्णुता भारतीय शहरों को लगातार अधिक शोरपूर्ण बना रही है।
कानूनी प्रावधानों की सीमाएँ
- निर्धारित मानक: नियमों के अंतर्गत औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय एवं मौन क्षेत्रों के लिए परिवेशीय ध्वनि सीमा निर्धारित की गई है।
- उदाहरण: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने आवासीय क्षेत्रों के लिए दिन में 50 dB तथा रात्रि में 40 dB की सीमा निर्धारित की है।
- मौन क्षेत्र: अस्पतालों एवं विद्यालयों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को मौन क्षेत्र संबंधी प्रावधानों के माध्यम से संरक्षण प्रदान किया गया है।
- उदाहरण: अस्पतालों एवं शैक्षणिक संस्थानों के 100 मीटर के दायरे को मौन क्षेत्र घोषित किया गया है।
- लाउडस्पीकर नियंत्रण: विशेषकर रात्रि के समय लाउडस्पीकरों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।
- उदाहरण: विशेष अनुमति को छोड़कर रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे तक लाउडस्पीकरों का उपयोग प्रतिबंधित है।
- कमजोर प्रवर्तन: अपर्याप्त निगरानी एवं कम दंड के कारण नियम प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाते।
- उदाहरण: त्योहारों की शोभायात्राएँ एवं चुनावी रैलियाँ अक्सर ध्वनि सीमा का उल्लंघन करती हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती।
- सीमित जागरूकता: नागरिक एवं स्थानीय प्रशासन प्रायः ध्वनि को प्रदूषण के बजाय एक सामान्य असुविधा के रूप में देखते हैं।
- उदाहरण: कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद शहरी क्षेत्रों में प्रेशर हॉर्न एवं पटाखों का लगातार उपयोग किया जाता है।
सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ
- सांस्कृतिक स्वीकृति: धार्मिक उत्सव, विवाह एवं अन्य समारोह सार्वजनिक स्थानों पर अत्यधिक ध्वनि को सामान्य बना देते हैं।
- उदाहरण: गणेश चतुर्थी एवं दीपावली समारोहों में अक्सर निर्धारित ध्वनि सीमा का उल्लंघन होता है।
- राजनीतिक संरक्षण: राजनीतिक रैलियों एवं चुनाव अभियानों में प्रतिबंधों के बावजूद लाउडस्पीकरों का उपयोग किया जाता है।
- उदाहरण: चुनावों के दौरान विजय जुलूसों में सीटी एवं तेज ध्वनि वाले रोड शो आयोजित किए जाते हैं।
- कमजोर पुलिस व्यवस्था: जन-विरोध या राजनीतिक दबाव के भय से पुलिस कई बार कार्रवाई करने से बचती है।
- उदाहरण: स्थानीय आयोजनों में अवैध डी़जे सिस्टम लगातार शिकायतों के बावजूद संचालित होते रहते हैं।
- शहरी भीड़भाड़: अधिक यातायात घनत्व एवं अनियंत्रित हॉर्न बजाने की प्रवृत्ति पृष्ठभूमि ध्वनि स्तर को बढ़ाती है।
- नागरिक उत्तरदायित्व की कमी: साझा सार्वजनिक स्थलों के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण ध्वनि-नियंत्रण मानकों के पालन को कमजोर करता है।
- उदाहरण: अस्पतालों एवं विद्यालयों के आस-पास अनावश्यक हॉर्न बजाना सामान्य बात बनी हुई है।
व्यापक उपाय
- कठोर प्रवर्तन: नियमों के पालन को सुनिश्चित करने हेतु वास्तविक समय निगरानी एवं कड़े दंडात्मक प्रावधान आवश्यक हैं।
- उदाहरण: मुंबई में ध्वनि मानचित्रण एवं स्वचालित डेसिबल सेंसर प्रवर्तन को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
- राजनीतिक संयम: नेताओं को तेज ध्वनि वाले अभियानों एवं सार्वजनिक समारोहों को सीमित कर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
- उदाहरण: चुनाव आयोग चुनाव प्रचार के दौरान लाउडस्पीकर उपयोग पर सख्त नियंत्रण लागू कर सकता है।
- जन-जागरूकता: ध्वनि प्रदूषण को स्वास्थ्य संबंधी समस्या के रूप में देखते हुए निरंतर जन-जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
- उदाहरण: लंबे समय तक शहरी शोर के कारण होने वाली श्रवण क्षमता हानि एवं तनाव पर जागरूकता अभियान।
- शहरी नियोजन: बेहतर क्षेत्रीय नियोजन एवं यातायात प्रबंधन के माध्यम से संरचनात्मक ध्वनि उत्पन्न होने को कम किया जा सकता है।
- उदाहरण: अस्पतालों, विद्यालयों एवं न्यायालयों के आस-पास हरित मौन क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं।
- सामुदायिक सहभागिता: निवासी कल्याण संघों एवं स्थानीय निकायों को उल्लंघनों की निगरानी एवं रिपोर्टिंग में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
- उदाहरण: वार्ड समितियाँ आवासीय क्षेत्रों में बार-बार नियम तोड़ने वालों की पहचान करने में सहायता कर सकती हैं।
निष्कर्ष
शहरी शांति एक सार्वजनिक संपत्ति है, विलासिता नहीं। प्रभावी ध्वनि नियंत्रण के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए नागरिक अनुशासन, राजनीतिक जिम्मेदारी एवं सामाजिक जागरूकता आवश्यक है।