प्रश्न की मुख्य माँग
- यह किस प्रकार ‘सामाजिक अनुबंध (Social Contract)’ के उल्लंघन को दर्शाता है, इसका विश्लेषण कीजिए।
- इस दृष्टिकोण के विरुद्ध प्रस्तुत किए जा सकने वाले विपक्ष में तर्क (Counter-Arguments) दीजिए।
- इस संकट को ‘जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend)’ में बदलने हेतु उपाय सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश एक अंतर्निहित सामाजिक अनुबंध पर आधारित है, जिसमें यह अपेक्षा निहित है कि योग्यता, प्रयास एवं कौशल के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक उन्नति संभव होगी। जब संस्थाएँ इस वादे को पूरा करने में विफल रहती हैं, तो युवाओं की आकांक्षाएँ निराशा एवं व्यवस्था के प्रति अविश्वास में परिवर्तित हो सकती हैं।
‘सामाजिक अनुबंध’ के उल्लंघन के रूप में इसके कारण
- योग्यता का क्षरण: परीक्षा एवं भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताएँ योग्यता-आधारित व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करती हैं, जिससे लाखों युवाओं के लिए सामाजिक गतिशीलता के अवसर प्रभावित होते हैं।
- गतिशीलता में विलंब: भर्ती प्रक्रियाओं में देरी युवाओं के रोजगार में प्रवेश तथा आर्थिक स्वतंत्रता की प्राप्ति को स्थगित कर देती है।
- रोजगार असुरक्षा: आर्थिक वृद्धि के बावजूद गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं में सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति की संभावना के प्रति विश्वास को कमजोर करती है।
- उदाहरण: शिक्षित युवा वर्ग बढ़ती शिक्षा उपलब्धता के बावजूद सार्थक एवं सुरक्षित रोजगार की अनिश्चितता को लेकर चिंतित रहता है।
- विश्वास में कमी: अवसरों की निष्पक्षता को लेकर धारणा कमजोर होने से नागरिकों का सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास कम होता है।
- उदाहरण: निष्पक्षता में विश्वास स्वयं एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्थागत अवसंरचना है, जो लोकतांत्रिक वैधता को आधार प्रदान करती है।
- अंतर-पीढ़ीगत चिंताएँ: परिवारों में यह चिंता बढ़ती है कि क्या अगली पीढ़ी को बेहतर अवसर प्राप्त हो पाएँगे या नहीं।
विपक्ष में तर्क
- निरंतर आशावाद: संस्थागत कमियों के बावजूद युवाओं की आकांक्षाएँ एवं आगे बढ़ने की उम्मीदें मजबूत बनी रहती हैं।
- आंशिक वास्तविकता: सभी परीक्षाएँ एवं भर्तियाँ प्रणालीगत अनियमितताओं से प्रभावित नहीं होतीं।
- उदाहरण: UPSC जैसी संस्थाएँ पारदर्शी प्रक्रियाओं के माध्यम से व्यापक सार्वजनिक विश्वास बनाए रखती हैं।
- आर्थिक जटिलता: रोजगार परिणाम केवल प्रशासनिक दक्षता पर नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक आर्थिक परिवर्तनों पर भी निर्भर करते हैं।
- उदाहरण: तकनीकी परिवर्तन एवं स्वचालन (Automation) विभिन्न क्षेत्रों में श्रम माँग को निरंतर पुनर्संरचित कर रहे हैं।
- अवसरों का विस्तार: शिक्षा एवं डिजिटल कनेक्टिविटी के क्षेत्र में अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- उदाहरण: विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों एवं डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म्स के विस्तार ने पहुँच को व्यापक बनाया है।
- साझा उत्तरदायित्व: गतिशीलता एवं रोजगार संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए केवल सरकार नहीं, बल्कि सभी हितधारकों की सामूहिक भूमिका आवश्यक है।
- उदाहरण: कौशल विकास एवं रोजगार सृजन में उद्योग जगत की भागीदारी भारत के कार्यबल को समाहित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
संकट को जनसांख्यिकीय लाभांश में बदलने के उपाय
- परीक्षा की निष्पक्षता: परीक्षा सुरक्षा को तकनीक आधारित प्रणाली एवं कठोर जवाबदेही के माध्यम से सुदृढ़ किया जाए।
- उदाहरण: सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 परीक्षा में पेपर लीक एवं संगठित नकल को रोकने का प्रयास करता है।
- समयबद्ध भर्ती: निश्चित भर्ती कैलेंडर तैयार कर नियुक्ति प्रक्रियाओं को समयबद्ध एवं त्वरित बनाया जाए।
- उदाहरण: कई सरकारी एजेंसियों ने वार्षिक भर्ती कार्यक्रम अपनाकर अनिश्चितता को कम किया है।
- रोजगार-केंद्रित विकास: नीतियों का मूल्यांकन उनके रोजगार सृजन क्षमता के आधार पर किया जाए।
- कौशल एवं शिक्षा का समन्वय: शिक्षा प्रणाली और श्रम बाजार की आवश्यकताओं के बीच के अंतराल को कम किया जाए।
- उदाहरण: स्किल इंडिया मिशन (2015) युवाओं को उद्योग-उन्मुख कौशल प्रदान करने का लक्ष्य रखता है।
- आर्थिक सुरक्षा सुदृढ़ीकरण: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा में निवेश बढ़ाकर मानव संसाधन क्षमता को उत्पादक अवसरों में परिवर्तित किया जाए।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश स्वतःस्फूर्त या स्वचालित नहीं है। योग्यता पर आधारित विश्वास को पुनर्स्थापित करना, गुणवत्तापूर्ण रोजगार का विस्तार करना तथा संस्थागत निष्पक्षता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि युवाओं की आकांक्षाओं को समावेशी विकास एवं लोकतांत्रिक सुदृढ़ता के एक सशक्त वाहक के रूप में परिवर्तित किया जा सके।