Q. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिसंघ (UNFCCC) के तहत दशकों की वार्ताओं के बावजूद, वैश्विक उत्सर्जन में वृद्धि जारी है और 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य और भी अधिक अप्राप्य होता जा रहा है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन संरचना की संरचनात्मक सीमाओं का विश्लेषण कीजिए और यह आकलन कीजिए कि ठोस जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने में सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया अप्रभावी क्यों रही है। (15 अंक, 250 शब्द)

February 7, 2026

GS Paper IIIEnvironment & Ecology

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन की संरचनात्मक सीमाएँ
  • सामान्य सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया की विफलता के कारण
  • प्रभावी जलवायु शासन के उपाय

उत्तर

भूमिका

अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन वर्तमान में एक महत्त्वपूर्ण गतिरोध की स्थिति में है। 30 वर्षों की कूटनीति के बावजूद, वर्ष 2025 में वैश्विक उत्सर्जन रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुँच गया, तथा पर्यावरणविदों के अनुसार 2030 के दशक की शुरुआत तक 1.5°C की सीमा पार हो जाएगी। ‘टॉप-डाउन’ क्योटो सम्मेलन से ‘बॉटम-अप’ पेरिस समझौते की ओर संक्रमण ने पर्यावरणीय कठोरता के ऊपर राजनीतिक समावेशिता को प्राथमिकता दी है, जिसके परिणामस्वरूप एक ऐसी शासन संरचना तैयार हुई है, जो कूटनीतिक रूप से सफल किंतु पारिस्थितिकी रूप से अपर्याप्त है।

मुख्य भाग

अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन की संरचनात्मक सीमाएँ 

  • वादों की स्वैच्छिक प्रकृति: राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) में एक केंद्रीकृत प्रवर्तन तंत्र की कमी है, जो उन्हें बाध्यकारी दायित्वों की बजाय “सद्भावना संकेत” बनाता है।
  • वित्तीय विखंडन: जलवायु वित्त पर ‘नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य’ (NCQG) के लिए स्पष्ट, समयबद्ध परिभाषा की अनुपस्थिति वैश्विक दक्षिण की शमन क्षमता में बाधा डालती है।
    • उदाहरण: जबकि विकासशील देशों को खरबों डॉलर की आवश्यकता है, वर्ष 2026 तक वास्तविक सार्वजनिक वित्त प्रवाह स्थिर रहा है या वास्तविक रूप में गिरावट आई है।
  • संप्रभुता बनाम विज्ञान: वेस्टफेलियन प्रणाली राष्ट्रों को दीर्घकालिक वैश्विक सीमाओं के ऊपर अल्पकालिक आर्थिक विकास तथा घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अनुमति देती है।
    • उदाहरण: COP30 में जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की भाषा को आसान बनाना, IPCC के “कार्बन बजट” पर राष्ट्रीय हितों के प्रभुत्व को दर्शाता है।
  • जवाबदेही फ्रेमवर्क का अभाव: उन्नत पारदर्शिता फ्रेमवर्क (ETF) डेटा तो प्रदान करता है, लेकिन गैर-अनुपालन या “ग्रीनवाशिंग” के लिए दंडात्मक उपायों का अभाव है।

सामान्य या आम सहमति आधारित निर्णय क्यों अप्रभावी हैं?

  • “न्यूनतम साझा तत्त्व” (Lowest Common Denominator) प्रभाव: लगभग 200 देशों के मध्य आम सहमति प्राप्त करने के लिए, अंतिम नियमों से अक्सर विशिष्ट, कार्रवाई योग्य और बाध्यकारी भाषा हटा दी जाती है।
    • उदाहरण: जीवाश्म ईंधन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के वीटो को रोकने के लिए “फेज-आउट” जैसे महत्त्वपूर्ण शब्दों को प्रायः “फेज-डाउन” में बदल दिया जाता है।
  • व्यक्तिगत वीटो पॉवर: कोई भी एक देश पूरी वैश्विक प्रक्रिया को रोक सकता है, जिससे महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया में “अल्पमत की तानाशाही” की स्थिति उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-6 (कार्बन बाजार) पर प्रक्रियात्मक विवादों ने बहुमत के समझौते के बावजूद वैश्विक कार्यान्वयन में लगभग एक दशक की देरी की।
  • वार्ता की धीमी गति: जलवायु विज्ञान दशकों के पैमाने पर काम करता है, लेकिन आम सहमति वाली कूटनीति “ग्लेशियर की गति” से चलती है, जिससे “टिपिंग पॉइंट्स” को संबोधित करना असंभव हो जाता है।
  • असममित शक्ति गतिशीलता: धनी राष्ट्र अक्सर नुकसान और क्षति के लिए बाध्यकारी जवाबदेही से बचने हेतु आम सहमति का लाभ उठाते हैं, अंततः, यह प्रक्रिया कमजोर द्वीपीय देशों को ठोस संरक्षण नहीं, बल्कि मात्र घोषणात्मक उपलब्धियाँ ही प्रदान करती है।

प्रभावी जलवायु शासन के उपाय

  • बहुमत की ओर रुख: तकनीकी और कार्यान्वयन संबंधी निर्णयों के लिए “योग्य बहुमत” मतदान को अपनाना, ताकि व्यक्तिगत वीटो को रोका जा सके।
  • बाध्यकारी क्षेत्रीय समझौते: स्टील या शिपिंग जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए “क्लाइमेट क्लब” या बहुपक्षीय समझौते करना, जो सामान्य UNFCCC गतिरोध को दरकिनार कर सकें।
    • उदा: ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस (GBA) मुख्य COP प्लेनरी के बाहर सक्रिय, बहुपक्षीय कार्रवाई के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य करता है।
  • व्यापार-लिंक्ड जवाबदेही: कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे तंत्रों के माध्यम से जलवायु अनुपालन को व्यापार समझौतों में एकीकृत करना।
  • प्रत्यक्ष वित्त पहुँच: विश्व बैंक और IMF में सुधार करना, ताकि वैश्विक पूँजी प्रवाह को स्वैच्छिक दान की बजाय सीधे 1.5°C लक्ष्यों के साथ जोड़ा जा सके।

निष्कर्ष

UNFCCC एक सार्वभौमिक मंच के रूप में अपरिहार्य बना हुआ है, लेकिन इसके आम सहमति से प्रेरित प्रयास अब 1.5°C लक्ष्य की तात्कालिकता के अनुकूल नहीं हैं। जैसा कि भारत का वर्ष 2026 ब्रिक्स नेतृत्व बताता है, भविष्य बहुकेंद्रीय शासन में निहित है, जहाँ क्षेत्रीय गठबंधन और क्षेत्रीय “कार्यान्वयन योजनाएँ” वैश्विक प्रतिज्ञाओं को पूरक बनाती हैं। जब तक महत्त्वाकांक्षा को ठोस और प्रवर्तनीय कार्रवाई में नहीं बदला जाता, तब तक 1.5°C का लक्ष्य केवल काग़ज़ी वादा ही बना रहेगा।

Despite decades of negotiations under the UNFCCC, global emissions continue to rise and the 1.5°C target becomes more unattainable. Analyse the structural limitations of the current international climate governance architecture and assess why consensus-based decision-making has been ineffective in driving substantive climate action. in hindi

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