प्रश्न की मुख्य माँग
- बताइए कि कैसे लोकलुभावन वादे राजकोषीय स्थिरता एवं संरचनात्मक परिवर्तन के लिए जोखिम हैं।
- कल्याणकारी उपायों के महत्त्वों को समझाइए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
भारत की चुनावी राजनीति में कल्याण और विकास के बीच की रेखा अक्सर धुँधली हो जाती है, जैसा कि हालिया “मुफ्त उपहार” पर बहस में देखा गया है। जहाँ कल्याणकारी नीतियाँ तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं, वहीं उन्हें दीर्घकालिक विकास के साथ मिलाना राजकोषीय दबाव बढ़ा सकता है और संरचनात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
राजकोषीय स्थिरता एवं संरचनात्मक परिवर्तन के लिए जोखिम
- राजकोषीय बोझ: अत्यधिक सब्सिडी राज्यों के वित्तीय संसाधनों पर दबाव डालती है और राजकोषीय घाटे को बढ़ाती है।
- उदाहरण: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पंजाब जैसे राज्यों में बढ़ते सब्सिडी बोझ को राजकोषीय स्थिरता के लिए जोखिम बताया है।
- राजस्व क्षरण: मुफ्त सेवाएँ लागत वसूली को कम करती हैं और राज्य/नगरपालिका राजस्व को कमजोर बनाती हैं।
- उदाहरण: आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में मुफ्त बिजली योजनाओं से डिस्कॉम (DISCOMs) के राजस्व में कमी आई (आरबीआई राज्य वित्त रिपोर्ट)।
- पूँजी निवेश पर दबाव: राजस्व व्यय के रूप में दी जाने वाली मुफ्त योजनाएँ बुनियादी ढाँचे में पूँजी निवेश को सीमित कर देती हैं।
- उदाहरण: जिन राज्यों में सब्सिडी व्यय अधिक है, वहाँ पूँजीगत व्यय अनुपात कम पाया गया है (15वें वित्त आयोग का विश्लेषण)।
- उत्पादकता में कमी: उपभोग-उन्मुख हस्तांतरण उत्पादक क्षमता को नहीं बढ़ाते, जबकि विकासात्मक निवेश उत्पादकता और विकास को प्रोत्साहित करते हैं।
- संरचनात्मक विलंब: अल्पकालिक राहत पर ध्यान केंद्रित करने से स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योग में आवश्यक संरचनात्मक सुधार में देरी होती है।
- उदाहरण: नीति आयोग के अनुसार, मानव पूँजी निवेश दीर्घकालिक विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
कल्याणकारी उपायों का महत्त्व
- गरीबी उन्मूलन: कल्याणकारी योजनाएँ कमजोर वर्गों को तत्काल सहायता प्रदान करती हैं।
- उदाहरण: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) लाखों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- माँग में वृद्धि: प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण उपभोग बढ़ाते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते हैं।
- उदाहरण: कोविड-19 महामारी के दौरान कैश ट्रांसफर से ग्रामीण माँग में वृद्धि हुई (भारत सरकार के आँकड़े)।
- मानव पूँजी विकास: लक्षित कल्याणकारी उपाय स्वास्थ्य और शिक्षा के परिणामों में सुधार करते हैं।
- उदाहरण: मिड डे मील योजना से स्कूलों में उपस्थिति और पोषण स्तर में सुधार हुआ है।
- सामाजिक स्थिरता: कल्याण योजनाएँ असमानता को कम करती हैं और सामाजिक अशांति को रोकने में सहायक होती हैं।
- उदाहरण: मनरेगा ने संकट के समय रोजगार सुरक्षा प्रदान की।
- पूरक भूमिका: कल्याण और विकास एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए, न कि प्रतिस्थापन।
- उदाहरण: सामाजिक सुरक्षा के साथ बुनियादी ढाँचा विकास को जोड़कर समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
आगे की राह
- स्पष्ट अंतर: नीतिगत निर्माण में कल्याण (अल्पकालिक) और विकास (दीर्घकालिक) के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जाना चाहिए।
- लक्षित सहायता: सार्वभौमिक मुफ्त योजनाओं के बजाय आवश्यकता-आधारित लक्षित हस्तांतरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) सुधारों ने कुशलता बढ़ाई और गड़बड़ियों को कम किया।
- राजकोषीय अनुशासन: राजकोषीय उत्तरदायित्व ढाँचे का पालन करते हुए सब्सिडियों का युक्तिकरण किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) के लक्ष्य सतत् राजकोषीय प्रबंधन का मार्गदर्शन करते हैं।
- पूँजी पर जोर: बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- उदाहरण: केंद्रीय बजटों में पूँजीगत व्यय बढ़ाकर अवसंरचना विस्तार को प्रोत्साहित किया गया है।
- परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण: कल्याणकारी योजनाओं को मापनीय विकास परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए।
- उदाहरण: आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा और जीविका में सुधार को ट्रैक किया जाता है।
निष्कर्ष
यद्यपि कल्याणकारी उपाय समानता और सामाजिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन इन्हें विकास के साथ मिलाने से राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है और संरचनात्मक परिवर्तन कमजोर पड़ सकता है। लक्षित कल्याण और उत्पादक क्षेत्रों में निरंतर निवेश को समेकित करने वाला संतुलित दृष्टिकोण ही समावेशी और स्थायी आर्थिक विकास सुनिश्चित कर सकता है।