Q. SHANTI अधिनियम 2025 राज्य के एकाधिकार से हटकर एक प्रतिस्पर्द्धी परमाणु बाजार की ओर एक बड़ा बदलाव है। वर्ष 2047 तक भारत के 100 GW परमाणु लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आदर्श परिवर्तन (शांति अधिनियम)
  • 100 GW लक्ष्य प्राप्त करने में चुनौतियाँ।
  • आगे की राह।

उत्तर

प्रस्तावना

भारत की परमाणु शक्ति विद्युत उत्पादन में ~3% योगदान देती है, जिसकी क्षमता मात्र 1.8% (~8.8 GW) है, जो आवश्यकताओं से बहुत कम है। ‘विकसित भारत’ और ‘नेट-जीरो’ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2047 तक 100 GW तक तेजी से विस्तार की आवश्यकता है, जिससे शांति अधिनियम जैसे सुधार महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

आदर्श परिवर्तन (SHANTI अधिनियम)

  • निजी प्रवेश: निजी फर्मों को संयंत्र बनाने, स्वामित्व रखने और संचालित करने की अनुमति देता है, जिससे परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का एकाधिकार समाप्त होता है।
    • उदाहरण: 90 GW अतिरिक्त क्षमता के लिए लगभग $200 बिलियन के निवेश जुटाने हेतु आवश्यक।
  • बाजार मॉडल: राज्य-नेतृत्व वाले मॉडल से प्रतिस्पर्द्धी परमाणु पारिस्थितिकी तंत्र की ओर परिवर्तन।
    • उदाहरण: उद्योगों (स्टील, डेटा सेंटर) को कैप्टिव परमाणु ऊर्जा अपनाने में सक्षम बनाता है।
  • नियामक स्थिति: वैश्विक मानदंडों के अनुरूप विश्वसनीय निरीक्षण के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक स्वायत्तता प्रदान करता है।
  • दायित्व सुधार: निवेशकों के जोखिम को कम करने और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए CLNDA में संशोधन करता है।
    • उदाहरण: वेस्टिंगहाउस, EDF जैसे आपूर्तिकर्ताओं की दीर्घकालिक चिंताओं को दूर करता है।
  • कानूनी बदलाव: परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और CLNDA 2010 को एक एकीकृत ढाँचे के साथ प्रतिस्थापित करता है।

100 GW लक्ष्य प्राप्त करने में चुनौतियाँ

  • उच्च लागत: परमाणु ऊर्जा विस्तार के लिए भारी पूँजी निवेश (≈ ₹18 लाख करोड़) की आवश्यकता है।
    • उदाहरण: आयातित रिएक्टर डिजाइनों की लागत $5 मिलियन/MW से अधिक है, जबकि PHWRs के लिए यह लगभग $2 मिलियन/MW है।
  • तकनीकी निर्भरता: भारत विदेशी रिएक्टर डिजाइन और तकनीक पर निर्भर है, जो आत्मनिर्भरता को सीमित करता है।
    • उदाहरण: जैतापुर और कोव्वाड़ा जैसी परियोजनाएँ एक दशक से अधिक समय से विलंबित हैं।
  • अपशिष्ट प्रबंधन के मुद्दे: परमाणु अपशिष्ट के दीर्घकालिक निपटान और प्रबंधन पर स्पष्टता का अभाव है।
  • जनता का डर और प्रतिरोध: सुरक्षा चिंताएँ और भूमि अधिग्रहण के मुद्दे बने हुए हैं, जो पिछले वैश्विक परमाणु हादसों और नकारात्मक सार्वजनिक धारणा से प्रभावित हैं।
  • कौशल की कमी: कुशल जनशक्ति की कमी और कमजोर घरेलू आपूर्ति शृंखला एक बड़ी बाधा है।
    • उदाहरण: भारत को चीन के तीव्र रिएक्टर विस्तार मॉडल के समान एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • स्वदेशी फोकस: आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए भारत को PHWRs (220/700 MW) का विस्तार करना चाहिए और स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) विकसित करने चाहिए।
    • उदाहरण: सरकार ने SMR अनुसंधान और विकास के लिए लगभग ₹20,000 करोड़ आवंटित किए हैं।
  • लागत में कमी: ‘फ्लीट मोड’ निर्माण और मॉड्यूलर तकनीकों को अपनाने से लागत और देरी को काफी कम किया जा सकता है।
  • वित्तपोषण मॉडल: निवेश आकर्षित करने के लिए PPP मॉडल और दीर्घकालिक टैरिफ ढाँचे विकसित करने की आवश्यकता है।
  • नियामक स्पष्टता: शुल्क, दायित्व और ईंधन आपूर्ति पर स्पष्ट और पारदर्शी नीतियाँ आवश्यक हैं।
  • जनता का विश्वास: सार्वजनिक विश्वास बनाने के लिए मजबूत सुरक्षा मानकों और अधिक जागरूकता की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

परमाणु ऊर्जा ‘विकसित भारत’ और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो प्राप्त करने के लिए केंद्रीय है। पारदर्शिता और स्वदेशी क्षमता के साथ SHANTI अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन भारत को एक प्रतिस्पर्द्धी, निम्न-कार्बन परमाणु शक्ति के रूप में बदल सकता है।

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