प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत की प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा ECI प्रणाली में चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
- मूल्यांकन कीजिए कि रणनीतिक ECE सुधार किस प्रकार रोजगार संबंधी मुद्दों और आर्थिक असमानता का समाधान कर सकते हैं।
- वर्ष 2047 तक ECE परिणामों को बदलने में अभिभावक सहभागिता, संसाधन अनुकूलन और शासन सुधार की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
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उत्तर
भारत की प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा प्रणाली में कमियाँ, बच्चों के समग्र विकास को नुकसान पहुँचाती हैं, विशेषकर गरीब और हाशिए पर स्थित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए। समय पर सहायता के बिना, ये बच्चे स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य के अवसरों में पिछड़ने का जोखिम उठाते हैं, जिससे असमानता बढ़ी जाती है और अध्ययनों से पता चलता है कि शुरुआती निवेश से मजबूत रिटर्न मिलता है, इन कमियों को दूर करना एक समान और कुशल समाज के निर्माण की कुंजी है।
भारत की प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा (ECE) प्रणाली में चुनौतियाँ
- अपर्याप्त शिक्षण समय: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रतिदिन अनिवार्य दो घंटे के बजाय केवल 38 मिनट ही प्रीस्कूल गतिविधियों पर बिताते हैं, जिससे बच्चों की भागीदारी सीमित हो जाती है।
- उदाहरण: 14 लाख आंगनवाड़ियों में से केवल 9 प्रतिशत सरकारी प्री – प्राइमरी स्कूलों में ECE शिक्षक हैं।
- आधारभूत शिक्षण के निम्न परिणाम: पूर्व–प्राथमिक कक्षाओं के 15 प्रतिशत से भी कम बच्चे मूल वस्तुओं को पहचान पाते हैं तथा केवल 30 प्रतिशत ही बड़ी बनाम छोटी संख्याओं को पहचान पाते हैं, जिसके कारण कई बच्चे कक्षा 1 के लिए तैयार नहीं हो पाते।
- वित्तपोषण की निरंतर कमी: वार्षिक ECE व्यय प्रति बालक मात्र ₹1,263 है, जबकि प्रति विद्यालय–आयु वर्ग के छात्र पर ₹37,000 है, जिसके परिणामस्वरूप कंटेंट और प्रशिक्षण की कमी हो जाती है।
- कमजोर पर्यवेक्षण और प्रशासन: एक पर्यवेक्षक औसतन 282 आंगनवाड़ियों की देख-रेख करता है, जिसके कारण शिक्षण पद्धति और बुनियादी ढाँचे की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित नहीं हो पाती है।
- असमान पहुँच और शहरी-ग्रामीण विभाजन: जबकि 5.5 करोड़ बच्चे आंगनवाड़ियों और 56,000 पूर्व – प्राथमिक स्कूलों में नामांकित हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्कूलों में कार्यात्मक शौचालय, पीने योग्य पानी और बुनियादी शिक्षण स्थानों का अभाव है।
रोजगार संबंधी मुद्दों और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए सुधार
- विस्तारित ECE कार्यबल के माध्यम से नौकरियों का सृजन: ECE शिक्षकों को नियुक्त करने से रोजगार में वृद्धि होती है, जिसका उदाहरण उत्तर प्रदेश में 11,000 बालवाटिका भर्तियाँ हैं।
- अंतर-पीढ़ीगत गरीबी चक्र को तोड़ना: गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा से प्रति डॉलर निवेश पर 7-12 डॉलर का ROI प्राप्त होता है ( हेकमैन वक्र), जिससे जीवन भर की कमाई में सुधार होता है और असमानता कम होती है।
- भविष्य में रोजगार क्षमता में वृद्धि: संज्ञानात्मक और सामाजिक-भावनात्मक कौशल का प्रारंभिक विकास अधिक कुशल कार्यबल का निर्माण करता है, जिससे दीर्घकाल में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है।
- संबद्ध सेवा क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना: ECE में वृद्धि से प्रशिक्षण संस्थानों, पाठ्यक्रम डेवलपर्स, शैक्षिक सामग्री और एडटेक की माँग बढ़ती है, जिससे व्यापक आर्थिक गतिविधियों का सृजन होता है।
अभिभावक सहभागिता, संसाधन अनुकूलन और शासन सुधार की भूमिका
- सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से अभिभावकों की सहभागिता: मध्य प्रदेश की बाल चौपाल जैसी पहल खेल-आधारित शिक्षण तकनीकों के माध्यम से अभिभावकों को सशक्त बनाती है, तथा घर पर शिक्षण को सुदृढ़ बनाती है।
- घरेलू सहायता के लिए डिजिटल उपकरणों का लाभ उठाना: व्हाट्सऐप समूह और एडटेक ऐप्स परिवारों को दैनिक गतिविधि संकेत और पर प्रोग्रेस ट्रैकिंग प्रदान कर सकते हैं, जिससे ECE प्रभाव गहरा हो सकता है।
- लक्षित नियुक्ति के माध्यम से संसाधनों का अनुकूलन: अधिक पर्यवेक्षकों और ECE शिक्षकों को नियुक्त करने के लिए धन का आवंटन निरीक्षण अंतराल को संबोधित करता है।
- डेटा- संचालित शासन: उपस्थिति, शिक्षण परिणामों और सामग्री उपयोग की निगरानी के लिए रियल टाइम डैशबोर्ड (UDISE +) को लागू करना जवाबदेही और पाठ्यक्रम – सुधार सुनिश्चित करता है।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): पाठ्यक्रम को सह- अभिकल्पना करने, कार्यबल को प्रशिक्षित करने और बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों व निजी प्रदाताओं के साथ सहयोग करके गुणवत्ता ECI को स्थायी रूप से बढ़ाया जा सकता है।
- उदाहरण: टीच फॉर इंडिया (TFI), टीच फॉर अमेरिका से प्रेरित, एक राष्ट्रव्यापी फेलोशिप है, जहाँ युवा स्नातक और पेशेवर दो वर्ष के लिए नगरपालिका या सरकारी स्कूलों में पूर्णकालिक रूप से पढ़ाते हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ाने, अभिभावकों को सशक्त बनाने, संसाधनों का अनुकूलन करने और शासन को मजबूत करने के इन समन्वित सुधारों से वर्ष 2047 तक भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग किया जा सकता है और आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सकता है।