प्रश्न की मुख्य माँग
- कोर मुद्रास्फीति पर ध्यान केंद्रित करने का तर्क।
- उस दृष्टिकोण में चुनौतियाँ।
- मौद्रिक नीति की सफलता राजकोषीय विवेकशीलता से किस प्रकार जुड़ी है?
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उत्तर
भारत वर्ष 2026 में अपने लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) ढाँचे की समीक्षा करने जा रहा है, ऐसे में हेडलाइन बनाम कोर मुद्रास्फीति की बहस मौद्रिक नीति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है। भारत की मुद्रास्फीति मुख्यतः खाद्य मूल्यों, माँग की गतिशीलता और अपेक्षाओं से प्रभावित होती है। साथ ही, FIT तभी प्रभावी बनता है, जब इसे FRBM अधिनियम द्वारा सुनिश्चित राजकोषीय अनुशासन का समर्थन प्राप्त हो, जो दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता की गारंटी देता है।
कोर मुद्रास्फीति पर ध्यान क्यों आवश्यक है?
- मूलभूत माँग-दबाव का सटीक आकलन: कोर मुद्रास्फीति भोजन/ईंधन जैसे अस्थिर कारकों को हटाकर स्थायी प्रवृत्तियों को दर्शाती है।
- आपूर्ति प्रक्रिया पर अनावश्यक प्रतिक्रिया से बचाव: खाद्य मुद्रास्फीति अक्सर मौसमी या मौसम-जनित होती है, जिस पर RBI का नियंत्रण सीमित है।
- पूर्वाभिमुख नीति-निर्माण में सहायक: कोर मुद्रास्फीति मध्यम अवधि की मौद्रिक नीति से बेहतर तालमेल रखती है।
- नीति की अत्यधिक सख्ती से बचाती है: हेडलाइन CPI में अल्पकालिक उछाल नीति को अनावश्यक रूप से कड़ा कर सकता है।
- स्थिर निर्णय-निर्माण में मदद: कोर मुद्रास्फीति की पूर्वानुमेयता बचत और निवेश संबंधी निर्णयों को स्थिर बनाती है।
- उदाहरण: भारत में खाद्य मुद्रास्फीति प्रायः सापेक्ष मूल्यों में बदलाव को दर्शाती है, जब तक कि उसके पीछे माँग-प्रेरित दबाव न हो।
केवल कोर मुद्रास्फीति पर निर्भरता की चुनौतियाँ
- खाद्य मुद्रास्फीति का लागतों पर प्रभाव: भोजन के बढ़ते दाम वेतन और उत्पादन लागत को बढ़ाते हैं, जिससे गैर-खाद्य वस्तुओं की कीमतें भी ऊपर जाती हैं।
- निम्न-आय वर्ग पर हेडलाइन CPI का सीधा प्रभाव: गरीब परिवार सीधे खाद्य मुद्रास्फीति से प्रभावित होते हैं, हेडलाइन CPI की अनदेखी असमानता बढ़ा सकती है।
- उच्च तरलता से व्यापक मुद्रास्फीति का दबाव: मुद्रा आपूर्ति बढ़ने पर खाद्य कीमतों में वृद्धि सामान्य मूल्य-स्तर को भी ऊपर ले जाती है।
- जनता की मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ: लोग तकनीकी कोर CPI नहीं, बल्कि वास्तविक (खाद्य) कीमतों से अपेक्षाएँ बनाते हैं।
- CPI में भोजन का उच्च भार: भारत के CPI सूचकांक में भोजन का बड़ा हिस्सा है, इसलिए हेडलाइन मुद्रास्फीति जीवन यापन लागत को अधिक सटीक दर्शाती है।
मौद्रिक नीति को राजकोषीय अनुशासन की आवश्यकता क्यों?
- मुद्रीकृत राजकोषीय घाटे से मुद्रास्फीति रोकना: 1970–80 के दशक में राजकोषीय अतिरेक से उच्च मुद्रास्फीति उत्पन्न हुई थी; FRBM इसे रोकता है।
- RBI की स्वायत्तता की रक्षा: राजकोषीय संयम RBI पर घाटा-वित्तपोषण का दबाव कम करता है।
- कुल माँग पर नियंत्रण: राजकोषीय शिथिलता मौद्रिक सख्ती को निष्प्रभावी कर सकती है।
- बेहतर नीति संचरण: कम उधारी दर संरचना को स्थिर बनाती है और ‘क्राउडिंग आउट’ से बचाती है।
- FIT और FRBM का पूरक संबंध: दोनों में से किसी का कमजोर होना व्यापक आर्थिक संतुलन को प्रभावित करता है।
निष्कर्ष
भारत की संरचनात्मक वास्तविकताओं को देखते हुए, एक संतुलित मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा आवश्यक है, जिसमें खाद्य-मूल्यों की भूमिका को नजरअंदाज न किया जाए। केवल कोर मुद्रास्फीति पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है। मौद्रिक नीति तभी प्रभावी होगी, जब उसके साथ मजबूत राजकोषीय अनुशासन जुड़ा हो, जो माँग-दबाव को नियंत्रित रखे और नीति की विश्वसनीयता को बनाए रखे। आने वाले दशक में FIT तथा FRBM— दोनों को सुदृढ़ करना भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए अनिवार्य होगा।