Q. तकनीकी हस्तक्षेपों को अक्सर शासन संबंधी चुनौतियों के लिए महत्वपूर्ण उपाय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, फिर भी ये बहिष्कार के नए रूप उत्पन्न कर सकते हैं। भारत के कल्याणकारी ढाँचे में निगरानी-आधारित अनुप्रयोगों की प्रभावकारिता का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत की कल्याणकारी संरचना में निगरानी-आधारित अनुप्रयोगों की प्रभावकारिता।
  • निगरानी-आधारित कल्याणकारी वितरण में चुनौतियाँ।
  • इन चुनौतियों के समाधान हेतु उपाय।

उत्तर

बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, डिजिटल ट्रैकिंग और ऐप-आधारित निगरानी जैसे प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों को प्रायः कल्याण वितरण में अक्षमता और लीकेज के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परंतु इनकी निगरानी-प्रधान संरचना कठोर सत्यापन, अवसंरचना-निर्भर प्रक्रियाओं और कमजोर लाभार्थियों पर अनुपातहीन अनुपालन-भार थोपकर अनजाने में बहिष्करण को बढ़ा सकती है।।

भारत की कल्याण संरचना में निगरानी-आधारित अनुप्रयोगों की प्रभावशीलता

  • लीकेज  नियंत्रण: बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण ‘डुप्लिकेट’ तथा काल्पनिक लाभार्थियों की पहचान को प्रभावी रूप से अवरुद्ध कर कल्याणकारी योजनाओं के लक्ष्यीकरण को सुदृढ़ बनाता है और वितरण शृंखला में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अपव्यय को उल्लेखनीय रूप से सीमित करता है।
    • उदाहरण: आधार प्रमाणीकरण ने कई राज्यों में ‘डुप्लिकेट’ राशन कार्ड पहचानने में सहायता की, जिससे सब्सिडी लीकेज कम हुआ।
  • तीव्र  हस्तांतरण: निगरानी-संलग्न आधार-आधारित प्रणालियाँ, मध्यस्थों को हटाकर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को सक्षम बनाती हैं और भुगतान की समयबद्धता में सुधार होता हैं।
    • उदाहरण: आधार-सक्षम प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने प्रधानमंत्री किसान योजना के अंतर्गत भुगतान प्रक्रियाओं को तीव्र किया।
  • डिजिटल लेखा-परीक्षा अभिलेख: ऐप-आधारित निगरानी खोज योग्य डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करती है, जिससे अग्रिम पंक्ति के कार्मिकों और कार्यान्वयन एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ती है।
    • उदाहरण: ई-श्रम और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना डैशबोर्ड वास्तविक समय प्रशासनिक निगरानी को सक्षम बनाते हैं।
  • विस्तार क्षमता और एकीकरण: एकीकृत डिजिटल पहचान, विभिन्न योजनाओं के बीच समन्वय को सुदृढ़ बनाती है तथा बड़े पैमाने पर लाभार्थियों तक पहुँच सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण: आधार-संलग्न सार्वजनिक वितरण प्रणाली एकीकरण से ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ के तहत पोर्टेबिलिटी संभव हुई।
  • प्रशासनिक बोझ में कमी: स्वचालन कागजी कार्य कम कर अधिकारियों को मैनुअल सत्यापन और दोहराव वाली प्रक्रियाओं से मुक्त करता है।

निगरानी-आधारित कल्याणकारी वितरण में प्रमुख चुनौतियाँ

  • प्रमाणीकरण विफलताएँ: आयु, दिव्यन्गता या नेटवर्क समस्याओं के कारण बायोमेट्रिक असंगति वास्तविक लाभार्थियों को आवश्यक सेवाओं से वंचित कर सकती है।
  • डिजिटल विभाजन: कम संपर्क सुविधा और कम डिजिटल साक्षरता ऐप-आधारित कल्याण सत्यापन प्रणालियों तक पहुँच को बाधित करती है।
    • उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी विफलताओं के कारण मनरेगा उपस्थिति ऐप प्रभावित होता है।
  • गोपनीयता जोखिम: केंद्रीकृत डेटा संग्रह निगरानी, प्रोफाइलिंग और व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग की संभावनाएँ बढ़ाती है।
  • प्रवासियों का बहिष्करण: सख्त पता-आधारित प्रणालियाँ उन प्रवासी श्रमिकों और कमजोर आबादियों को हाशिये पर डाल देती हैं, जो निवास संबंधी विवरण नियमित रूप से अद्यतन नहीं कर पाते या आवश्यक डिजिटल अवसंरचना तक पहुँच नहीं रखते।।
  • श्रमिकों पर अत्यधिक निगरानी: वास्तविक समय पर उपस्थिति या जियोटैग किए गए साक्ष्य की मांग करने वाले ऐप्स कल्याण में सुधार करने के बजाय श्रमिकों को अपराधी बना सकते हैं।

इन चुनौतियों के समाधान

  • बहु-माध्यम प्रमाणीकरण: OTP-आधारित, ऑफलाइन तथा मानव-निगरानी विकल्प प्रदान कर बायोमेट्रिक या नेटवर्क विफलताओं से उत्पन्न बहिष्करण रोका जा सकता है।
  • डेटा संरक्षण सुदृढ़ करना: उद्देश्य-सीमा, विकेन्द्रीकृत भंडारण और स्पष्ट सहमति मानकों को लागू कर निगरानी-प्रसार को रोका जा सकता है।
    • उदाहरण: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023 का सुदृढ़ प्रवर्तन।
  • संपर्क सुविधा में सुधार: ब्रॉडबैंड, सामुदायिक डिजिटल केंद्रों और मोबाइल संपर्क सुविधाओं का विस्तार कर डिजिटल विभाजन आधारित बहिष्करण को कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण: भारतनेट का विस्तार ग्रामीण डिजिटल कल्याण का प्रमुख आधार है।
  • समावेशी डिजाइन: मानव-केंद्रित डिजाइन में वृद्धजनों, प्रवासियों, दिव्यांग व्यक्तियों और दूरस्थ जनसंख्या की विशेष आवश्यकताओं का समावेश किया जाना चाहिए।
  • शिकायत निवारण प्रणाली सुदृढ़ करना: अनुचित बहिष्करण और तकनीकी विफलताओं के समाधान हेतु सुलभ और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

निगरानी-आधारित कल्याण अनुप्रयोग पारदर्शिता और दक्षता बढ़ा सकते हैं, किंतु उनका कठोर, डेटा-आधारित ढाँचा, बहिष्करण को बढ़ाने का जोखिम रखता है। सरल प्रमाणीकरण प्रक्रियाएँ, सुदृढ़ गोपनीयता संरक्षण, समावेशी डिजाइन और उत्तरदायी शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित कर डिजिटल कल्याण को नियंत्रण-प्रधान उच्च-जोखिम प्रणाली से समानतामूलक राज्य समर्थन के प्रभावी साधन में परिवर्तित किया जा सकता है।

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