Q. वर्ष 1945 के बाद से जो अंतरराष्ट्रीय नियमों और कानूनों पर आधारित दुनिया की व्यवस्था बनी थी, वह अब खतरे में है। वर्तमान वैश्विक व्यवस्था ‘सभी देशों के लिए समान नियम’ के बजाय ‘प्रभुत्वशाली देशों के बढ़ते प्रभाव’ पर आधारित हो रही है। इस 'नई वैश्विक अव्यवस्था' में योगदान देने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए और भारत जैसी मध्यम शक्तियों के रणनीतिक हितों पर इसके प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ‘नई वैश्विक अव्यवस्था’ के लिए उत्तरदायी कारकों की चर्चा कीजिए।
  • भारत जैसी मध्यम शक्तियों के रणनीतिक हितों पर प्रभावों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

वर्ष 1945 के पश्चात् स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जिसे संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया, संप्रभु समानता और सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित थी। आज, हालाँकि एकपक्षवाद, मानकों का चयनात्मक पालन और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएँ “कानून की प्रधानता” से “शक्ति ही न्याय है” की ओर संक्रमण का संकेत देती हैं, जिससे एक अस्थिर ‘नई वैश्विक अव्यवस्था’ उत्पन्न हो रही है।

‘नई वैश्विक अव्यवस्था’ के लिए उत्तरदायी कारक

  • पुनरुत्थानवादी व्यवस्था: प्रमुख शक्तियाँ क्षेत्रीय संप्रभुता और स्थापित मानकों के समक्ष चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं तथा विधिक संयम की अपेक्षा रणनीतिक महत्त्वाकांक्षा को प्राथमिकता दे रही हैं।
    • उदाहरण: रूस द्वारा वर्ष 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(4) का उल्लंघन था, जो आक्रामकता पर प्रतिबंध लगाता है (UNGA प्रस्ताव ES-11/1, 2022)।
  • चयनात्मक बहुपक्षवाद और संस्थागत वापसी: वैश्विक संस्थाओं से बाहर निकलना या उन्हें कमजोर करना सामूहिक शासन तंत्र को क्षीण करता है।
    • उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका की विश्व स्वास्थ्य संगठन (2020 की घोषणा) तथा यूनेस्को से अलग होना।
  • सामूहिक सुरक्षा तंत्रों का पक्षाघात: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो, राजनीतिक आक्रामकता के विरुद्ध निर्णायक प्रतिक्रिया को अवरुद्ध करता है।
  • परस्पर निर्भरता का शस्त्रीकरण: व्यापार, वित्त, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा का उपयोग बढ़ते हुए दबाव के साधन के रूप में किया जा रहा है।
    • उदाहरण: वर्ष 2022 में रूस पर यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध।
  • वैकल्पिक शक्ति केंद्रों का उदय और प्रतिस्पर्द्धी मानक: उभरती शक्तियाँ संस्थागत प्रभाव और मानकात्मक ढाँचों को पुनः आकार दे रही हैं।
    • उदाहरण: ब्रिक्स का विस्तार (2023–24) तथा शंघाई सहयोग संगठन की वृद्धि।

भारत जैसे मध्यम शक्तियों के रणनीतिक हितों पर प्रभाव

  • सुरक्षा सुभेद्यताओं में वृद्धि: मानकों का क्षरण बल-आधारित क्षेत्रीय संशोधनवाद को वैधता प्रदान करता है, जिससे भारत की सीमाएँ प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव।
  • रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव: गुट-राजनीति गुटनिरपेक्ष स्थिति को सीमित करती है।
    • उदाहरण: यूक्रेन पर आक्रमण के कारण रूस पर लगे प्रतिबंधों के बीच क्वाड में भागीदारी और रूस के साथ निरंतर संलग्नता के बीच भारत का संतुलन।
  • आर्थिक और ऊर्जा जोखिम: खंडित व्यापार व्यवस्थाएँ और प्रतिबंध व्यवस्थाएँ आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा प्रवाह को बाधित करती हैं।
  • मानक-उद्यमिता का अवसर: संस्थागत प्रवाह मध्यम शक्तियों को उभरते शासन ढाँचों को आकार देने का अवसर प्रदान करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 में G20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाने में भारत का नेतृत्व।
  • विषय-आधारित गठबंधनों की आवश्यकता: खंडित व्यवस्था में लचीली, क्षेत्र-विशिष्ट साझेदारियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।
    • उदाहरण: पारंपरिक पश्चिमी मंचों से परे जलवायु बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाने हेतु अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में भारत की भागीदारी।

निष्कर्ष

नियम-आधारित व्यवस्था से प्रतिस्पर्द्धी शक्ति-राजनीति की ओर संक्रमण, पतन नहीं बल्कि परिवर्तन का संकेत है। भारत जैसी मध्यम शक्तियों के लिए अस्तित्व और प्रभाव संतुलित रणनीतिक स्वायत्तता, गठबंधन-निर्माण, और मानक-उद्यमिता पर निर्भर करते हैं।

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