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Q. आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये कि भारत की चुनावी नामांकन प्रक्रिया में प्रक्रियागत तकनीकी प्रणाली किस प्रकार राजनीतिक बहिष्कार का साधन बन सकती हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए सुधार सुझाएं कि यह प्रक्रिया बाधा उत्पन्न करने वाली न होकर सुविधाजनक हो। (15 अंक, 250 शब्द)

November 8, 2025

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • प्रक्रियागत तकनीकी बातें कैसे बहिष्कार का साधन बन जाती हैं?
  • संबंधित प्रणालीगत चुनौतियाँ।
  • सुझाए गए सुधार।

उत्तर

भारत की सशक्त निर्वाचन प्रक्रिया में प्रायः प्रक्रियात्मक औपचारिकताएँ सत्यापन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक बहिष्करण के प्रभावी उपकरण के रूप में प्रयुक्त होती हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत नामांकन की जाँच की कठोर और जटिल प्रक्रिया निर्वाचन अधिकारियों को अत्यधिक विवेकाधिकार प्रदान करती है, जिससे मतदान शुरू होने से पहले ही लोकतांत्रिक विकल्प सीमित हो जाते हैं।

 प्रक्रियात्मक औपचारिकताएँ कैसे बहिष्करण के उपकरण बनती हैं

  • अस्पष्ट “गंभीर दोष” की परिभाषा:  RPA की धारा 36 में “महत्त्वपूर्ण प्रकृति का दोष” शब्द का कोई स्पष्ट अर्थ नहीं दिया गया है। इससे रिटर्निंग ऑफिसर (RO) को अत्यधिक विवेकाधिकार प्राप्त होता है, जिससे वे मनमाने ढंग से नामांकन खारिज कर सकते हैं।
  • प्रमाण-पत्रों का जाल:  उम्मीदवारों को विभिन्न सरकारी विभागों से नो ड्यूज  या क्लियरेंस प्रमाण-पत्र सीमित समय में प्रस्तुत करने होते हैं। प्रशासनिक विलंब के कारण यह प्रक्रिया गरीब या स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए कठिन बन जाती है।
    • उदाहरण: वाराणसी (वर्ष 2019) में एक पूर्व बीएसएफ जवान का नामांकन केवल एक दिन में प्रमाण-पत्र न देने के कारण अस्वीकृत कर दिया गया।
  • अधूरी हलफनामा त्रुटियाँ:  संपत्ति या आपराधिक विवरण हेतु आवश्यक फॉर्म 26 में किसी भी कॉलम को खाली छोड़ देना यदि वह गैर-आवश्यक हो—नामांकन अस्वीकार करने का आधार बन सकता है।
  • शपथ और नोटरीकरण की कठोरता: नामांकन दाखिल करने के बाद लेकिन जाँच से पूर्व शपथ न लेने या नोटरी सील की अनुपस्थिति भी स्वचालित अस्वीकृति का कारण बन जाती है।
  • प्रस्तावकों की संवेदनशीलता:  मान्यता प्राप्त दलों के लिए 1 प्रस्तावक और स्वतंत्र/गैर-दलीय उम्मीदवारों के लिए 10 प्रस्तावक की आवश्यकता राजनीतिक दबाव या धमकी का माध्यम बन जाती है।

संबंधित व्यवस्थागत चुनौतियाँ

  • न्यायिक पुनरीक्षण पर रोक: संविधान का अनुच्छेद-329(b) चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालयों के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है, जिससे नामांकन अस्वीकृति को तत्काल चुनौती देना असंभव हो जाता है।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय (वर्ष 2020) ने अस्वीकृत उम्मीदवारों की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वे केवल चुनाव परिणाम के बाद ही चुनाव याचिका दाखिल कर सकते हैं।
  • अत्यधिक अनुपालन बोझ:  8–10 पृष्ठों वाले हलफनामे और अनेक फॉर्म भरने की प्रक्रिया विशेषकर गरीब और स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए बाधा बन जाती है।
  • ‘छँटाई’ बनाम ‘सहायता’ दृष्टिकोण: रिटर्निंग अधिकारी अक्सर त्रुटियाँ ढूँढने की मानसिकता अपनाते हैं, बजाय इसके कि वे प्रक्रिया को सुगम बनाएँ।
  • कानूनी विलंब: अस्वीकृति के बाद उपलब्ध न्यायिक उपाय लंबी अदालती प्रक्रिया से गुजरते हैं, जिससे चुनावी अस्थिरता उत्पन्न होती है।

सुझाए गए सुधार

  • पूर्व-जाँच सुविधा: नामांकन से पूर्व प्री-स्क्रूटिनी डेस्क  स्थापित की जाए, जहाँ उम्मीदवार अपने फॉर्म की त्रुटियाँ सुधार सकें।
  • प्रावधिक स्वीकृति: नामांकन को शर्तीय रूप से स्वीकृत  किया जाए, जिससे मामूली त्रुटियों के कारण उम्मीदवार तुरंत बाहर न हो जाएँ।
  • मानकीकृत हलफनामा प्रारूप:  फॉर्म में ‘NIL’ या ‘NA’ विकल्प अनिवार्य कर सरल और एकरूप प्रारूप बनाया जाए।
  • डिजिटल सत्यापन:  हस्ताक्षर, दस्तावेज और पहचान की ऑनलाइन प्री-वैलिडेशन प्रणाली विकसित की जाए ताकि मानवीय त्रुटियाँ कम हों।
  • पारदर्शी आपत्तियाँ: आपत्तियाँ दर्ज करने हेतु सिक्योरिटी डिपॉजिट और त्वरित प्रारंभिक स्क्रीनिंग की व्यवस्था हो ताकि निराधार आपत्तियों को रोका जा सके।

निष्कर्ष

भारत का नामांकन तंत्र संविधान में निहित स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिए। एक सहायक, डिजिटल और कम विवेकाधीन प्रणाली अपनाना आवश्यक है, ताकि तकनीकी त्रुटियाँ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्द्धा को बाधित न करें और केवल वास्तविक विधिक आधार पर ही उम्मीदवारों को अपात्र ठहराया जाए।

Critically analyze how procedural technicalities in India’s electoral nomination process can become tools for political exclusion. Suggest reforms to ensure the process is facilitative rather than obstructive. in hindi

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