प्रश्न की मुख्य माँग
- रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रभावों की विवेचना कीजिए।
- क्षेत्रीय संपर्कता पर प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
चाबहार बंदरगाह पर अमेरिका के प्रतिबंध पर से छूट समाप्त होने से भारत की बहु-संरेखण रणनीति की एक महत्त्वपूर्ण चुनौती सामने आई है जहाँ बढ़ते भू-राजनीतिक दबावों और प्रतिस्पर्द्धी वैश्विक हितों के मध्य रणनीतिक साझेदारियों और संप्रभु निर्णय-निर्माण के संतुलन को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रभाव
- नीतिगत बाधा: अमेरिकी प्रतिबंध भारत की स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की क्षमता को सीमित करते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2026 में अमेरिकी छूट समाप्त होने के बाद भारत को चाबहार संचालन सीमित करना पड़ा।
- संप्रभुता का क्षरण: बाहरी दबाव भारत को उसकी मुख्य रणनीतिक प्राथमिकताओं से विचलित करते हैं।
- उदाहरण: संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद भारत ने दबाव में ईरानी तेल आयात बंद कर दिया।
- पूर्ववर्ती जोखिम: ऐसे दबाव, भविष्य में बाहरी हस्तक्षेप को बढ़ावा दे सकते हैं।
- उदाहरण: ईरान के साथ व्यापार और ब्रिक्स सहयोग को लेकर अमेरिका की चेतावनियाँ।
- रणनीतिक पीछे हटना: दीर्घकालिक परियोजनाओं से हटना भू-राजनीतिक सक्रियता में कमी को दर्शाता है।
- उदाहरण: भारत द्वारा शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल में अपनी हिस्सेदारी ईरानी कंपनी को सौंपने पर विचार।
- विश्वसनीयता में कमी: बार-बार नीतिगत परिवर्तन भारत की रणनीतिक भागीदार के रूप में विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2003 से चाबहार परियोजना पर भारत-ईरान के बीच रुक-रुक कर प्रगति हुई।
क्षेत्रीय संपर्कता पर प्रभाव
- पहुँच में कमी: चाबहार से हटने पर भारत की अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच समाप्त हो जाती है।
- उदाहरण: पाकिस्तान द्वारा ट्रांजिट अनुमति न देने के कारण चाबहार भारत के लिए एकमात्र व्यवहार्य विकल्प था।
- व्यापार में बाधा: इससे क्षेत्रीय व्यापार गलियारों के विस्तार और स्थायित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- उदाहरण: वर्ष 2015 का भारत–ईरान–अफगानिस्तान त्रिपक्षीय समझौता चाबहार के माध्यम से व्यापार बढ़ाने के लिए था।
- रणनीतिक अलगाव: प्रमुख क्षेत्रीय संपर्क ढाँचों में भारत की भागीदारी कमजोर होती है।
- उदाहरण: चाबहार का अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जुड़ाव।
- सहायता में बाधाएँ: क्षेत्र में मानवीय और विकासात्मक सहायता पहुँचाने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- उदाहरण: पहले अमेरिका की छूट के कारण भारत चाबहार के जरिए अफगानिस्तान को गेहूँ और दवाइयाँ भेज पाता था।
- चीन को लाभ: इससे क्षेत्रीय अवसंरचना में चीन के प्रभुत्व के विरुद्ध भारत की रणनीतिक स्थिति कमजोर होती प्रतीत होती दिख रही है।
- उदाहरण: चाबहार को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत ग्वादर बंदरगाह के विकल्प के रूप में देखा जाता था।
आगे की राह
- रणनीतिक संतुलन: भारत को अपने मुख्य रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए।
- वैकल्पिक मार्ग: संपर्क मार्गों का विविधीकरण कर एक ही मार्ग पर निर्भरता कम की जा सकती है।
- उदाहरण: रूस और मध्य एशिया के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को सुदृढ़ करना।
- कूटनीतिक वार्ता: छूट या व्यावहारिक अपवाद प्राप्त करने के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयास आवश्यक हैं।
- उदाहरण: पहले अमेरिका ने भारत को अफगानिस्तान को मानवीय सहायता हेतु चाबहार उपयोग की छूट प्रदान की थी।
- आर्थिक प्रभाव: भारत अपने बड़े बाजार और व्यापारिक महत्त्व का उपयोग कर स्लैबों में लचीलापन लाने के लिए कर सकता है।
- उदाहरण: एक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा उपभोक्ता और व्यापार भागीदार के रूप में भारत की स्थिति उसकी सौदेबाजी क्षमता को मजबूत करती है।
- घरेलू क्षमता निर्माण: मजबूत घरेलू लॉजिस्टिक्स विकसित कर बाहरी व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता कम की जा सकती है।
- उदाहरण: सागरमाला कार्यक्रम के तहत बंदरगाह आधारित अवसंरचना और संपर्कता को सुदृढ़ किया जा रहा है।
निष्कर्ष
चाबहार दुविधा एक ध्रुवीकृत विश्व में भारत की बहु-संरेखण रणनीति की संवेदनशीलता को उजागर करती है। रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना संतुलित कूटनीति, विविध साझेदारियों और सुदृढ़ अवसंरचना के माध्यम से ही संभव है, ताकि बदलती भू-राजनीतिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।