प्रश्न की मुख्य माँग
- आर्थिक अवसरों का विश्लेषण कीजिए।
- सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
भारत द्वारा ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) एवं रणनीतिक उद्योगों को समर्थन देने हेतु महत्त्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की दिशा में प्रयासों को तेज करने के साथ, पूर्वोत्तर भारत को अब सुरक्षा परिधि (Security Periphery) से इतर एक राष्ट्रीय महत्त्व के रणनीतिक संसाधन क्षेत्र के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है।
आर्थिक अवसर
- खनिज सुरक्षा: पूर्वोत्तर भारत के खनिज संसाधनों का उपयोग करके भारत महत्त्वपूर्ण खनिजों के आयात पर निर्भरता कम कर सकता है।
- ऊर्जा संक्रमण: क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण खनिज भारत के स्वच्छ ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी लक्ष्यों को समर्थन दे सकते हैं।
- उदाहरण: भारत का क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (2025) ऐसे रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
- क्षेत्रीय विकास: उत्तरदायी खनिज विकास से ऐतिहासिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में रोजगार सृजन तथा आधारभूत अवसंरचना का विकास संभव हो सकता है।
- औद्योगिक विकास: संसाधनों की उपलब्धता घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत कर सकती है।
- एक्ट ईस्ट नीति के साथ समन्वय: संसाधन-आधारित विकास पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में पूर्वोत्तर भारत की भूमिका को और सुदृढ़ कर सकता है।
- उदाहरण: एक्ट ईस्ट नीति (2014) पूर्वोत्तर क्षेत्र के माध्यम से गहन संपर्क एवं क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखती है।
सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ
- भूमि संवेदनशीलता: खनिज परियोजनाएँ प्रायः पारंपरिक भूमि स्वामित्व और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी होती हैं।
- उदाहरण: समुदाय भूमि परियोजनाओं को विश्वास और प्रतिनिधित्व के दृष्टिकोण से देखते हैं।
- विश्वास की कमी: बहिष्करण के ऐतिहासिक अनुभवों ने बाह्य-प्रेरित विकास पहलों के प्रति संदेह और अविश्वास को जन्म दिया है।
- पहचान संबंधी चिंताएँ: संसाधन दोहन को अक्सर स्वदेशी पहचान और स्वायत्तता को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।
- उदाहरण: छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को स्थानीय शासन के संदर्भ में संवैधानिक रूप से विशेष सुरक्षा प्राप्त है।
- संघर्ष का जोखिम: स्थानीय आकांक्षाओं की उपेक्षा करने पर विकास परियोजनाएँ विवाद एवं संघर्ष के स्रोत में परिवर्तित हो सकती हैं।
- पारिस्थितिकीय लागत: पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन पर्यावरणीय संधारणीयता के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह
- पूर्व परामर्श: विकास परियोजनाओं से पहले समुदायों के साथ सार्थक सहभागिता और सहमति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: प्रभावित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भागीदारी को सुदृढ़ करना।
- अधिकारों का सम्मान: खनिज शासन ढाँचे में पारंपरिक भूमि अधिकारों को मान्यता दी जानी चाहिए, विशेषकर छठी अनुसूची के अंतर्गत प्राप्त सुरक्षा को बनाए रखते हुए।
- लाभों का साझा वितरण: संसाधन दोहन से स्थानीय समुदायों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलना चाहिए।
- उदाहरण: पारदर्शी लाभ-साझाकरण तंत्र को संस्थागत बनाना।
- संधारणीयता सुनिश्चित करना: महत्त्वपूर्ण खनिजों के दोहन में कठोर पर्यावरणीय मानकों का पालन आवश्यक है।
- उदाहरण: कठोर एवं व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessments – EIA) किया जाना चाहिए।
- विश्वास निर्माण: समावेशी शासन को रणनीतिक संसाधन विकास की आधारशिला बनाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत की महत्त्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) से जुड़ी महत्त्वाकांक्षाएँ तभी वास्तविक रूप से सफल हो सकती हैं, जब रणनीतिक उद्देश्यों का लोकतांत्रिक वैधता के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाए। इसके लिए अधिकार-आधारित, परामर्शात्मक और पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिससे पूर्वोत्तर क्षेत्र को केवल संसाधन-आधारित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक वास्तविक और सहभागी विकास साझेदार के रूप में विकसित किया जा सके।