प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के धीमे विकास के पीछे के कारण।
- सुझावात्मक सुधार।
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उत्तर
वर्ष 1985 में भारत और चीन की प्रति व्यक्ति आय लगभग समान थी (लगभग $293), परंतु वर्ष 2025 तक चीन की अर्थव्यवस्था $19 ट्रिलियन और भारत की $4.1 ट्रिलियन तक पहुँच गई। यह अंतर चीन की नीति निरंतरता और राष्ट्रीयतावादी शासन दृष्टिकोण बनाम भारत की विखंडित नीति-कार्यान्वयन को दर्शाता है। यह तुलना यह स्पष्ट करती है कि संस्थागत एकरूपता दीर्घकालिक विकास का प्रमुख कारक होती है।
भारत के धीमे विकास के कारण
- नेतृत्व अस्थिरता: नेतृत्व में बार-बार परिवर्तन और अल्पकालिक राजनीतिक कार्यकाल ने नीति निरंतरता को बाधित किया, जबकि चीन में स्थिर शासन ने दीर्घकालिक विकास योजनाओं को संभव बनाया।
- उदाहरण: देंग शियाओपिंग, जियांग जेमिन, हू जिंताओ और शी जिनपिंग के अधीन चीन में निरंतरता रही, जबकि भारत 1990 के दशक में गठबंधन युग की अस्थिरता से जूझता रहा।
- राष्ट्रीय हित पर कमजोर ध्यान: भारत में नीतियाँ प्रायः विचारधारात्मक या चुनावी उद्देश्यों से प्रेरित होती हैं, न कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से।
- परियोजना निष्पादन में कमजोरी: अवसंरचना परियोजनाएँ नौकरशाही, पर्यावरणीय सक्रियता और मुकदमों के कारण विलंबित होती हैं, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ते हैं।
- उदाहरण: थ्री गॉर्जेस डैम (चीन) केवल 10 वर्षों में पूर्ण हुआ, जबकि सरदार सरोवर बाँध (भारत) को 56 वर्ष (वर्ष 1961–2017) लगे।
- नौकरशाही अक्षमता: कठोर प्रक्रियाएँ, भ्रष्टाचार, और जवाबदेही की कमी परियोजनाओं के कार्यान्वयन को धीमा करती हैं तथा निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं।
- उदाहरण: भूमि अधिग्रहण और अनुबंध प्रवर्तन पर भारत की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग अपेक्षाकृत निम्न रही है।
- विदेशी वित्तपोषित सक्रियता: बाहरी वित्तपोषण से प्रेरित आंदोलनों ने कभी-कभी वैध विकास परियोजनाओं को अवरुद्ध किया है।
- उदाहरण: वेदांता के स्टरलाइट प्लांट (वर्ष 2018) का बंद होना और कुडनकुलम परमाणु संयंत्र (2012) के विरोध प्रदर्शन।
तीव्र विकास के लिए शासन सुधार
- दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि: नीति निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु एक दलीय-निरपेक्ष राष्ट्रीय विकास परिषद 2047 की स्थापना की जानी चाहिए।
- नौकरशाही सुधार: प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन, विशेषज्ञों की लैटरल एंट्री और समयबद्ध परियोजना स्वीकृति लागू की जानी चाहिए।
- उदाहरण: PRAGATI प्लेटफॉर्म ने परियोजनाओं की वास्तविक समय निगरानी को सुदृढ़ किया है।
- न्यायिक एवं पर्यावरणीय सुधार: विशेष अवसंरचना न्यायालयों की स्थापना और वैज्ञानिक मानकों पर आधारित पर्यावरणीय स्वीकृति से परियोजना में विलंब कम किया जा सकता है।
- संघीय सहयोग को सुदृढ़ करना: राज्यों के बीच व्यापार, लॉजिस्टिक्स और कर समन्वय को प्रोत्साहित कर एक एकीकृत बाजार विकसित किया जा सकता है।
- उदाहरण: GST परिषद सफल सहकारी संघवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- शिक्षा एवं श्रम सुधार: शिक्षा एवं कौशल को औद्योगिक माँग से संरेखित किया जाए तथा श्रम कानूनों को अधिक लचीला एवं उत्पादक बनाया जाए।
- उदाहरण: स्किल इंडिया मिशन और श्रम संहिता सुधार (वर्ष 2020) को और सशक्त कार्यान्वयन की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीयतावादी विकास भावना: ऐसी समावेशी राष्ट्रीय भावना विकसित करनी चाहिए, जो नागरिकों को साझा विकासात्मक लक्ष्यों के इर्द-गिर्द एकजुट करे।
- उदाहरण: मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया को स्थायी राष्ट्रीय अभियानों के रूप में रूपांतरित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत को लोकतांत्रिक उदारता को संस्थागत दक्षता और नीति स्थिरता के साथ जोड़ना होगा। न्यायिक, प्रशासनिक और औद्योगिक सुधार, आत्मनिर्भरता और सहकारी संघवाद के साथ मिलकर सतत् विकास की नींव रख सकते हैं। एक साझा राष्ट्रीय दृष्टि ही भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी।