प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के प्रवासन चक्र में अंतराल
- पूरी यात्रा के दृष्टिकोण की आवश्यकता
- आगे की राह: पूरी यात्रा का सुशासन।
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उत्तर
भूमिका
भारत का प्रवासन शासन संकटकालीन प्रतिक्रिया (जैसे निकासी अभियानों) में तो उत्कृष्ट है, लेकिन प्रवासन चक्र के विभिन्न चरणों में खंडित बना हुआ है। यह घटना-आधारित दृष्टिकोण संरचनात्मक कमजोरियों की अनदेखी करता है। अतः एक “संपूर्ण-यात्रा दृष्टिकोण” (Whole-of-journey approach) की आवश्यकता है, जो प्रवासियों की पूरी यात्रा के लिए एक व्यापक और निरंतर ढाँचा प्रदान करे और प्रवासी श्रमिकों के लिए लचीलापन, गरिमा और निरंतरता सुनिश्चित करे।
भारत के प्रवासन चक्र में कमियाँ
- संकट-केंद्रित प्रतिक्रिया: फोकस केवल निकासी या स्वदेश वापसी पर होता है, न कि जीवनचक्र सहायता पर।
- उदाहरण: पश्चिम एशिया से 4.75 लाख भारतीयों की निकासी मजबूत प्रतिक्रिया तो दर्शाती है, लेकिन प्रस्थान से पूर्व और वापसी के बाद की सहायता सीमित है।
- खंडित संस्थान: कई मंत्रालय अलग-अलग हिस्सों को सँभालते हैं, जिससे एकीकृत निगरानी की कमी होती है।
- उदाहरण: विदेश मंत्रालय, श्रम मंत्रालय और राज्य सरकारें एकीकृत प्रवासी ट्रैकिंग के बिना अलग-अलग काम करती हैं।
- अदृश्य प्रवासन शृंखलाएँ: भर्ती-काम-वापसी के चरणों को एकजुट होकर प्रशासित नहीं किया जाता।
- उदाहरण: श्रमिक जिलों/सीमाओं के पार जाते हैं, लेकिन प्रणालियों के लिए आंशिक रूप से अदृश्य रहते हैं।
- कमजोर पूर्वानुमान क्षमता: शासन व्यवधान के बाद प्रतिक्रिया करता है, पहले नहीं।
- उदाहरण: कोविड-19 प्रवासी संकट ने आंतरिक प्रवासियों के लिए तैयारी की कमी को उजागर किया।
- डेटा की कमी: वास्तविक समय और विस्तृत प्रवासन डेटा की कमी नीति नियोजन को सीमित करती है।
संपूर्ण-यात्रा दृष्टिकोण की आवश्यकता
- अधिकारों का संरक्षण: यह सुनिश्चित करता है कि प्रवासियों को प्रवासन के सभी चरणों में उचित वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ और गरिमा मिले।
- उदाहरण: विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर निगरानी के कारण गंतव्य देशों में प्रवासी श्रमिकों को अक्सर शोषण और असुरक्षित स्थितियों का सामना करना पड़ता है।
- कमजोरियों को कम करना: भर्ती और पारगमन (Transit) के दौरान तस्करी, धोखाधड़ी और शोषण के जोखिमों को कम करता है।
- उदाहरण: अनौपचारिक भर्ती माध्यम अक्सर प्रवासियों को कर्ज और अपमानजनक रोजगार की स्थितियों में फँसा देते हैं।
- नीतिगत सामंजस्य: दोहराव और कमियों से बचने के लिए खंडित कानूनों और योजनाओं के बीच तालमेल बिठाता है।
- उदाहरण: कई मंत्रालयों के ओवरलैपिंग अधिदेश प्रवासी कल्याण वितरण में अक्षमता उत्पन्न करते हैं।
- बेहतर समन्वय: निर्बाध शासन के लिए केंद्र, राज्यों और गंतव्य देशों के बीच सहयोग को मजबूत करता है।
- उदाहरण: GCC देशों में प्रवासन के लिए राजनयिक जुड़ाव और घरेलू नीति समर्थन दोनों की आवश्यकता होती है।
- आर्थिक अनुकूलन: प्रवासी कौशल के उत्पादक उपयोग को बढ़ाता है और प्रेषण (Remittance) लाभों को अधिकतम करता है।
- उदाहरण: भारत के कुल प्रेषण में खाड़ी देशों का योगदान लगभग 37.9% है, जो उनके आर्थिक महत्त्व को दर्शाता है।
आगे की राह: संपूर्ण-यात्रा शासन
- संस्थागत अभिसरण: प्रवासन को उसके पूरे जीवनचक्र में प्रबंधित करने के लिए एक एकीकृत और सुव्यवस्थित शासन ढाँचा तैयार करना।
- उदाहरण: प्रस्तावित ‘ओवरसीज मोबिलिटी फैसिलिटेशन एंड वेलफेयर बिल’ का उद्देश्य कल्याण, विनियमन और सुविधा तंत्र को एकीकृत करना है।
- कानूनी सुरक्षा उपाय: प्रवासी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा कानूनों के प्रवर्तन को मजबूत करना।
- उदाहरण: ‘अंतर-राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम’ कमजोर कार्यान्वयन से ग्रस्त है, जिससे कई श्रमिक औपचारिक सुरक्षा से बाहर रह जाते हैं।
- द्विपक्षीय रूपरेखा: प्रवासियों के लिए बेहतर स्थिति सुरक्षित करने के लिए गंतव्य देशों के साथ श्रम समझौतों को गहरा करना।
- उदाहरण: GCC देशों के साथ श्रम समझौता ज्ञापन (MoUs) वेतन, अनुबंध और विवाद समाधान तंत्र को मानकीकृत करने में मदद करते हैं।
- डेटा प्रणाली: प्रवासन प्रवाह और आवश्यकताओं को ट्रैक करने के लिए वास्तविक समय और व्यापक डेटाबेस विकसित करना।
- उदाहरण: ‘केरल प्रवासन सर्वेक्षण’ साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए एक मजबूत मॉडल प्रदान करता है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।
- कौशल और पुनर्निवेश: लौटने वाले प्रवासियों को कौशल पहचान और रोजगार के अवसरों के साथ सहायता प्रदान करना।
निष्कर्ष
संपूर्ण-यात्रा दृष्टिकोण गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप है। भारत को प्रतिक्रियावादी शासन से हटकर निरंतर प्रवासी सहायता की ओर बढ़ना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि गतिशीलता कमजोरी के बजाय सशक्तीकरण का मार्ग बने।