प्रश्न की मुख्य माँग
- बताइए कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या हैं।
- अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के शारीरिक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
- व्यापक नीतिगत उपाय सुझाइए।
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उत्तर
प्रारंभिक बचपन में अत्यधिक स्क्रीन उपयोग अब केवल पालन-पोषण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। यह विशेष रूप से जीवन के पहले तीन वर्षों में, जब मस्तिष्क के संज्ञानात्मक विकास की सीमा अधिक होती है, तब मस्तिष्क विकास, व्यवहार, नींद और शारीरिक वृद्धि को प्रभावित करता है।
अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के मनोवैज्ञानिक प्रभाव
- ऑटिज्म का जोखिम (Autism Risk): एक वर्ष से पहले अधिक स्क्रीन संपर्क का संबंध तीन वर्ष की आयु तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के अधिक लक्षणों से जुड़ा है।
- उदाहरण: एम्स दिल्ली (2026) के 250 बच्चों पर अध्ययन में अधिक स्क्रीन समय के साथ ऑटिज्म संकेतकों में वृद्धि देखी गई।
- वाणी विकास में देरी: एम्स के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन उपयोग माता-पिता और बच्चे के बीच संवाद को कम करता है, जिससे भाषा विकास प्रभावित होता है और भाषण विकास के पड़ावों में देरी होती है।
- ध्यान संबंधी समस्याएँ: तेजी से बदलने वाली डिजिटल सामग्री बच्चों की ध्यान क्षमता को कम करती है और आवेगपूर्ण व्यवहार बढ़ाती है।
- उदाहरण: इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने संज्ञानात्मक विकास की सुरक्षा के लिए 2 वर्ष से कम आयु में सीमित स्क्रीन उपयोग की सलाह दी है।
- भावनात्मक तनाव: स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता से चिड़चिड़ापन, भावनात्मक असंतुलन और तनाव प्रबंधन की कमजोर क्षमता बढ़ती है।
- सामाजिक कमी: आमने-सामने के संवाद में कमी से नेत्र संपर्क, सहानुभूति और सामाजिक संचार कौशल कमजोर हो जाते हैं।
अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के शारीरिक प्रभाव
- नींद संबंधी समस्याएँ: स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलेटोनिन के उत्पादन को बाधित करती है, जिससे नींद की गुणवत्ता खराब होती है और नींद का चक्र अनियमित हो जाता है।
- उदाहरण: सोने से पूर्व, स्क्रीन उपयोग करने वाले बच्चों में देर से सोना और बार-बार नींद टूटना अधिक देखा जाता है।
- कम शारीरिक गतिविधियाँ: अधिक स्क्रीन समय बाहरी खेल और शारीरिक गतिविधियों को कम करता है, जिससे निष्क्रिय जीवनशैली बढ़ती है।
- उदाहरण: शहरी बच्चों में मोबाइल और टीवी के कारण खेल के समय में उल्लेखनीय कमी देखी जा रही है।
- मोटापे का जोखिम: निष्क्रिय आदतें और स्क्रीन देखते समय खाना खाने की प्रवृत्ति बचपन में मोटापे का खतरा बढ़ाती है।
- उदाहरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिदिन कम-से-कम 180 मिनट शारीरिक गतिविधियों की सिफारिश करता है।
- आँखों पर तनाव: लंबे समय तक उपकरणों का उपयोग करने से डिजिटल आई स्ट्रेन, सिरदर्द और दृष्टि संबंधी शुरुआती समस्याएँ होती हैं।
- उदाहरण: इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) दो वर्ष से कम आयु में स्क्रीन उपयोग सीमित रखने की सलाह देती है, ताकि दृष्टि और विकास संबंधी समस्याएँ रोकी जा सकें।
- गलत शारीरिक मुद्रा: उपकरणों के साथ लंबे समय तक बैठने से गर्दन में खिंचाव, रीढ़ की हड्डी में समस्या और मांसपेशीय विकास कमजोर होती है।
- उदाहरण: बाल रोग विशेषज्ञों द्वारा स्कूल जाने वाले बच्चों में “टेक नेक (Tech neck)” के लक्षण बढ़ते हुए देखे जा रहे हैं।
व्यापक नीतिगत उपाय
- स्क्रीन दिशा-निर्देश: शिशुओं और बच्चों के लिए आयु-विशिष्ट राष्ट्रीय स्क्रीन-समय मानक तैयार किए जाएँ, जिनमें चिकित्सीय तथा विकासात्मक मार्गदर्शन शामिल हो।
- अभिभावक जागरूकता: सुरक्षित डिजिटल आदतों और प्रारंभिक स्क्रीन उपयोग के जोखिमों पर अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- उदाहरण: पोषण (POSHAN) अभियान और स्वास्थ्य मंत्रालय के सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) अभियानों में इस संदेश को शामिल किया जा सकता है।
- प्रारंभिक पहचान: आंगनवाड़ी और बाल रोग सेवाओं में ऑटिज्म और व्यावहारिक संकेतों की प्रारंभिक जाँच को सुदृढ़ किया जाए।
- उदाहरण: एम्स के अनुसार, पहले तीन वर्षों में मस्तिष्क की उच्च लचीलापन के कारण ऑटिज्म की शीघ्र पहचान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- विद्यालय स्तर पर पहल: स्कूलों में खेल, पठन और ऑफलाइन सामाजिक सीख को बढ़ावा देकर डिजिटल निर्भरता कम की जाए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 अनुभवात्मक और गतिविधि-आधारित शिक्षण के माध्यम से समग्र विकास का समर्थन करती है।
- बाल रोग परामर्श: नियमित बाल रोग परामर्श में स्क्रीन-समय का मूल्यांकन और अभिभावकों को मार्गदर्शन शामिल किया जाए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) में डिजिटल अति-उपयोग से संबंधित विकासात्मक जाँच को जोड़ा जा सकता है।
निष्कर्ष
बच्चों के स्क्रीन उपयोग का प्रबंधन परिवार, विद्यालय, स्वास्थ्य तंत्र और राज्य- सभी की साझा जिम्मेदारी है। प्रारंभिक हस्तक्षेप, जागरूकता और संतुलित डिजिटल आदतें, बाल विकास की सुरक्षा और स्वस्थ भविष्य की पीढ़ियों के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।