प्रश्न की मुख्य माँग
- रणनीतिक संयम से ‘गतिज डिटरेंस’ (Kinetic Deterrence) की ओर बदलाव के कारण
- क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में ‘काइनेटिक डिटरेंस’ की प्रभावशीलता
- इस बदलाव के बावजूद क्षेत्रीय सुरक्षा के समक्ष चुनौतियाँ।
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उत्तर
लंबे समय तक चले राजनयिक जुड़ाव और रणनीतिक संयम से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी जवाबी कार्रवाइयों तक, वर्ष 2016 के बाद भारत की पाकिस्तान नीति में एक निर्णायक परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन सीमा पार आतंकवाद के प्रति बढ़ता जीरो टॉलरेंस और संयमित गतिज डिटरेंस की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है।
इस वैचारिक परिवर्तन के पीछे के कारण
- आतंकवाद का बने रहना: बार-बार बातचीत के प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले जारी रहे, जिससे जुड़ाव-आधारित सामान्यीकरण में भारत का विश्वास कमजोर हुआ।
- उदाहरण: बार-बार राजनयिक पहुँच के बावजूद उरी (2016), पुलवामा (2019) और पहलगाम में हुए हमले।
- वार्ता में विफलता: पाकिस्तान की ओर से सैन्य-समर्थित आतंकवादी कार्रवाइयों के कारण शांति पहल बार-बार विफल रही, जिससे “आतंक और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते” के विचार को बल मिला।
- उदाहरण: लाहौर बस कूटनीति (1999) के बाद कारगिल युद्ध होना; प्रधानमंत्री मोदी की लाहौर यात्रा (2015) के तुरंत बाद पठानकोट हमला होना।
- घरेलू दबाव: आतंकवाद के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रतिशोध के लिए बढ़ते सार्वजनिक दबाव ने सरकारों को संयमित कूटनीति के बजाय मुखर सैन्य प्रतिक्रियाओं की ओर धकेला।
- सैन्य क्षमता: बेहतर खुफिया जानकारी, सटीक मारक क्षमता, ड्रोन और विशेष बलों ने पूर्ण पैमाने पर युद्ध के बिना सीमित सीमा पार जवाबी कार्रवाई को सक्षम बनाया।
- उदाहरण: बालाकोट हवाई हमले (2019) ने नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करने की भारत की इच्छाशक्ति को प्रदर्शित किया।
- निवारण का संकेत: भारत ने आतंकवादी बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचाकर और स्वयं पाकिस्तानी राज्य की जवाबदेही तय करने का संकेत देकर स्पष्ट स्पष्ट मापक स्थापित करने का प्रयास किया।
क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में प्रभावशीलता
- लागत में वृद्धि: गतिज प्रतिक्रियाओं ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी नेटवर्क के लिए परिचालन और राजनयिक लागत को बढ़ा दिया।
- उदाहरण: सर्जिकल स्ट्राइक (2016) के दौरान लॉन्च पैड्स का नष्ट किया जाना।
- रणनीतिक स्पष्टता: भारत ने प्रतिशोध की एक अनुमानित सीमा स्थापित की, जिससे बड़े आतंकवादी हमलों पर भारत की प्रतिक्रिया को लेकर अनिश्चितता कम हुई।
- वैश्विक समर्थन: सीमा पार आतंकवाद को लगातार उजागर करके भारत ने आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय वैधता हासिल की।
- उदाहरण: आतंकवादी वित्तपोषण को लेकर पाकिस्तान पर FATF की ग्रे-लिस्टिंग का दबाव।
- निवारण मूल्य: प्रत्यक्ष प्रतिशोध ने अल्पकालिक निवारण उत्पन्न किया और नियंत्रण रेखा (LoC) के साथ घुसपैठ के बुनियादी ढाँचे को बाधित किया।
- घरेलू आत्मविश्वास: मुखर प्रतिक्रियाओं ने राज्य की क्षमता और सैन्य तत्परता में जनता के विश्वास को मजबूत किया।
बदलाव के बावजूद क्षेत्रीय सुरक्षा के समक्ष चुनौतियाँ
- परमाणु प्रतिस्पर्द्धा: तनाव बढ़ने का उच्च जोखिम बना हुआ है क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु-हथियार संपन्न देश हैं।
- प्रॉक्सी (छद्म युद्ध) की निरंतरता: सैन्य प्रतिशोध के बावजूद पाकिस्तान प्रॉक्सी समूहों को कम लागत वाली रणनीतिक संपत्ति (स्ट्रैटेजिक एसेट्स) के रूप में समर्थन देना जारी रखे हुए है।
- वार्ता का अभाव: निरंतर राजनयिक जुड़ाव की अनुपस्थिति गलत अनुमानों और अनियंत्रित संकटों के जोखिम को बढ़ाती है।
- उदाहरण: समग्र संवाद और व्यापक द्विपक्षीय संवाद निलंबित हुए हैं।
- मानवीय तनाव: द्विपक्षीय तंत्र के निलंबन से आम नागरिक, कैदी, मछुआरे और विभाजित परिवार प्रभावित होते हैं।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: लगातार बनी रहने वाली शत्रुता दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग, व्यापार और कनेक्टिविटी पहलों को कमजोर करती है।
- उदाहरण: भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण सार्क (SAARC) एकीकरण कमजोर बना हुआ है।
निष्कर्ष
गतिज निवारण की ओर भारत के झुकाव ने आतंकवाद के खिलाफ रणनीतिक संकेतन को मजबूत किया है। फिर भी, टिकाऊ क्षेत्रीय स्थिरता के लिए विश्वसनीय सैन्य निवारण के साथ-साथ संयमित राजनयिक प्रयासों, मानवीय जुड़ाव और पाकिस्तान पर उसके आतंकवादी बुनियादी ढाँचे को स्थायी रूप से नष्ट करने के लिए निरंतर अंतरराष्ट्रीय दबाव आवश्यक है।