Q. NSO के 80वें दौर के स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जागरूकता और बीमा कवरेज में वृद्धि के बावजूद, ‘आउट ऑफ पाकेट’ व्यय (OOPE) भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। बीमा कवरेज के विस्तार के बावजूद OOPE के बने रहने के कारणों का विश्लेषण कीजिए और इस चुनौती से निपटने के लिए व्यापक उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

May 1, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ‘आउट ऑफ पाकेट’ व्यय (OOPE) के बने रहने के कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • इससे निपटने के लिए व्यापक उपाय सुझाइए।

उत्तर

संस्थागत प्रसवों में वृद्धि, बीमा कवरेज में विस्तार और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ते उपयोग के साथ भारत में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। फिर भी, ‘आउट ऑफ पाकेट’ व्यय (OOPE) बना हुआ है, जो दर्शाता है कि स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के विस्तार के बावजूद वित्तीय सुरक्षा अभी भी अपूर्ण है।

‘आउट ऑफ पाकेट’ व्यय (OOPE) बने रहने के कारण

  • सीमित कवरेज: अधिकांश बीमा योजनाएँ मुख्यतः अस्पताल में भर्ती को कवर करती हैं, जबकि बाह्य-रोगी देखभाल (OPD), जाँच और दवाइयाँ अक्सर कवरेज से बाहर रहती हैं।
    • उदाहरण: आयुष्मान भारत–PMJAY मुख्य रूप से द्वितीयक और तृतीयक स्तर के अस्पताल उपचार पर केंद्रित है, जिससे नियमित ओपीडी खर्च अधिकतर कवर नहीं होते हैं।
  • निजी क्षेत्र पर निर्भरता: सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में गुणवत्ता की कमी के कारण कई मरीज निजी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं, जिससे प्रत्यक्ष खर्च बढ़ता है।
    • उदाहरण: NSO सर्वेक्षण (2025) के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक ओपीडी उपयोग केवल 35% है यानी अधिकांश लोग अभी भी निजी सेवाओं पर निर्भर हैं।
  • दवाइयों की लागत: दवाइयों पर खर्च घरेलू स्वास्थ्य व्यय का बड़ा हिस्सा है, विशेषकर दीर्घकालिक बीमारियों में।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के अनुसार, सार्वजनिक योजनाओं के बावजूद दवाइयाँ OOPE का प्रमुख घटक बनी हुई हैं।
  • जांच का बोझ: प्रयोगशाला परीक्षण और विशेषज्ञ जाँच अक्सर सीधे भुगतान से होते हैं, भले ही परामर्श सब्सिडी पर उपलब्ध हो।
    • उदाहरण: मधुमेह, कैंसर या हृदय रोग से पीड़ित मरीजों को बार-बार जाँच कराने के लिए बीमा की सीमा से बाहर खर्च करना पड़ता है।
  • अनौपचारिक भुगतान: छिपे हुए शुल्क, परिवहन खर्च और उपचार के दौरान आय का नुकसान जैसे खर्च बीमा के दायरे में नहीं आते हैं।

व्यापक उपाय 

  • ओपीडी को शामिल करना: बीमा कवरेज को केवल अस्पताल में भर्ती तक सीमित न रखकर बाह्य-रोगी सेवाओं (OPD), जाँच और आवश्यक दवाइयों तक विस्तारित करना।
    • उदाहरण: PMJAY के अंतर्गत स्वास्थ्य लाभ पैकेजों का धीरे-धीरे विस्तार कर दीर्घकालिक ओपीडी उपचार को शामिल किया जा सकता है।
  • मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल: स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों को सुदृढ़ कर महँगे निजी उपचार और अंतिम चरण में अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता को कम करना।
    • उदाहरण: आयुष्मान आरोग्य मंदिर स्थानीय स्तर पर निवारक और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करते हैं।
  • मुफ्त दवाइयाँ: सार्वजनिक अस्पतालों में आवश्यक दवाओं और जाँच की सार्वभौमिक निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करना, जिससे OOPE में सीधे कमी आए।
    • उदाहरण: तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन का मॉडल केंद्रीकृत खरीद के माध्यम से सस्ती दवाइयों की उपलब्धता बढ़ाने में सफल रहा है।
  • बेहतर सार्वजनिक अस्पताल: मानव संसाधन, अवसंरचना और विशेषज्ञ सेवाओं में सुधार कर सरकारी अस्पतालों पर लोगों का विश्वास बढ़ाना, ताकि महँगे निजी उपचार पर निर्भरता घटे।
  • पोर्टेबल सुरक्षा: ई-स्वास्थ्य अभिलेख, बीमा पोर्टेबिलिटी और प्रवासी-अनुकूल सेवाओं का एकीकरण कर पूरे देश में निर्बाध स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन विभिन्न राज्यों में उपचार की निरंतरता और आसान क्लेम सुविधा प्रदान करता है।

निष्कर्ष

‘आउट ऑफ पाकेट’ व्यय (OOPE) को कम करने के लिए केवल बीमा विस्तार पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यापक वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। सशक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, सस्ती दवाइयाँ, ओपीडी कवरेज और समान पहुँच- इन सभी का समन्वय ही भारत में वास्तविक सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज सुनिश्चित कर सकता है।

Despite an increase in health-seeking behaviour and insurance coverage as revealed by the NSO 80th Round Health Survey, out-of-pocket expenditure (OOPE) remains a significant challenge for India’s healthcare system. Analyze the reasons why OOPE persists even with expanding insurance coverage, and suggest comprehensive measures to overcome this challenge. in hindi

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