Q. 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) नीति के तहत हाल के दिनों में अमेरिका-भारत संबंधों में आए बदलाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। बढ़ती 'लेन-देन आधारित कूटनीति' (Transactional Diplomacy) के बीच भारत को अपनी 'सामरिक स्वायत्तता' को कैसे संतुलित करना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

June 6, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • इस परिवर्तन से प्राप्त होने वाले लाभों का विश्लेषण कीजिए।
  • इस परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों अथवा हानियों की चर्चा कीजिए।
  • रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के उपायों का परीक्षण कीजिए।

उत्तर

परिचय

‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) दृष्टिकोण के तहत टैरिफ विवादों तथा रणनीतिक प्राथमिकताओं में बढ़ते मतभेदों के कारण भारत–अमेरिका संबंधों में हाल के वर्षों में तनाव देखने को मिला है। मूल्य-आधारित अभिसरण से लेन-देन आधारित सहभागिता (Transactional Engagement) की ओर यह परिवर्तन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की निरंतर परीक्षण कर रहा है।

इस परिवर्तन के लाभ

  • रणनीतिक यथार्थवाद: दोनों देशों के मध्य संबंध अधिक हित-आधारित (Interest-Driven) बन गए हैं, जिससे जहाँ पारस्परिक लाभ संभव हैं, वहाँ व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
    • उदाहरण: तनावों के बावजूद दोनों देश मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) के लिए क्वाड (QUAD) के माध्यम से सहयोग जारी रखे हुए हैं।
  • विविधीकृत साझेदारियाँ: किसी एक साझेदार पर निर्भरता कम होने से भारत को अपने रणनीतिक विकल्पों का विस्तार करने की प्रेरणा मिलती है।
    • उदाहरण: भारत ने समानांतर रूप से I2U2, ब्रिक्स तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) के माध्यम से अपने संबंधों को मजबूत किया है।
  • घरेलू क्षमता का सुदृढ़ीकरण: बाह्य अनिश्चितताएँ अधिक आर्थिक आत्मनिर्भरता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रोत्साहित करती हैं।
    • उदाहरण: आत्मनिर्भर भारत तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना घरेलू विनिर्माण को मजबूत बनाने का प्रयास करती हैं।
  • राष्ट्रीय हितों के आधार पर वार्ता: लेन-देन आधारित कूटनीति भारत को राष्ट्रीय हितों के आधार पर वार्ता करने के लिए प्रेरित करती है।
    • उदाहरण: पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत ने रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
  • मुद्दा-आधारित सहयोग: यह परिवर्तन पूर्ण रणनीतिक समानता की आवश्यकता के बिना चयनात्मक सहयोग को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: भारत–अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी पहल (iCET) के तहत सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी है।

इस परिवर्तन के नुकसान

  • विश्वास की कमी: नीतियों में बार-बार होने वाले बदलाव दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं के प्रति विश्वास को कमजोर करते हैं।
  • व्यापारिक तनाव: आर्थिक राष्ट्रवाद द्विपक्षीय व्यापार में अनिश्चितता को बढ़ाता है।
    • उदाहरण: ‘अमेरिका फर्स्ट’ दृष्टिकोण के अंतर्गत भारतीय निर्यातों पर 50% टैरिफ लगाए जाने की घोषणा ने व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ाया।
  • रणनीतिक अनिश्चितता: अप्रत्याशित नीतियाँ भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक योजना को जटिल बनाती हैं।
  • क्षेत्रीय जोखिम: भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति अमेरिका की घटती संवेदनशीलता प्रतिद्वंद्वी देशों को प्रोत्साहित कर सकती है।
    • उदाहरण: भारत–पाकिस्तान युद्धविराम से संबंधित अमेरिकी मध्यस्थता के कथनों ने नई दिल्ली में असहजता उत्पन्न की।
  • आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता: संरक्षणवादी उपाय प्रौद्योगिकी एवं निवेश प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं।
    • उदाहरण: यदि अमेरिकी निर्यात नियंत्रण अधिक कठोर होते हैं, तो महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की प्रगति प्रभावित हो सकती है।

रणनीतिक स्वायत्तता का संतुलन

  • बहु-संरेखण: किसी एक गुट तक सीमित हुए बिना विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ संबंधों को बढ़ावा दिया जाए।
    • उदाहरण: भारत एक साथ क्वाड (QUAD), ब्रिक्स (BRICS), SCO और G20 में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
  • आर्थिक सुदृढ़ता: बाहरी निर्भरताओं और कमजोरियों को कम करने के लिए घरेलू प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाया जाए।
    • उदाहरण: बजट 2025 में घोषित राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन औद्योगिक लचीलेपन को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
  • मुद्दा-आधारित सहभागिता: समान हितों वाले क्षेत्रों में सहयोग किया जाए, जबकि नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखा जाए।
    • उदाहरण: iCET के अंतर्गत सहयोग जारी रखते हुए भारत ने रूस के मुद्दे पर अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखी है।
  • संस्थागत संवाद: विवादों के समय रहते समाधान हेतु संरचित कूटनीतिक तंत्रों का विस्तार किया जाए।
    • उदाहरण: नियमित 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद रणनीतिक मतभेदों पर चर्चा और समाधान का मंच प्रदान करते हैं।
  • रणनीतिक स्पष्टता: भारत को अपनी प्राथमिकताओं और सीमाओं को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करना चाहिए।
    • उदाहरण: भारत द्वारा आधिकारिक वक्तव्यों में लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” पर बल दिया जाता रहा है।

निष्कर्ष

भारत को सिद्धांत-आधारित बहु-संरेखण की संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए, जो लेन-देन आधारित कूटनीति से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाते हुए अपनी निर्णय-निर्माण स्वायत्तता को सुरक्षित रखे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि रणनीतिक साझेदारियाँ राष्ट्रीय हितों को सीमित करने के बजाय उन्हें सुदृढ़ करने का माध्यम बनें।

Critically analyze the recent shift in US-India relations under the ‘America First’ policy. How should India balance its Strategic Autonomy amidst growing Transactional Diplomacy? in hindi

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