Q. वैश्विक स्तर पर दालों का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद, भारत अपनी घरेलू माँग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है। खरीद नीतियों और व्यापार समझौतों के विशेष संदर्भ में, भारत के दाल क्षेत्र में संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण कीजिए। दालों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द, 15 अंक)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत के दलहन क्षेत्र में ढाँचागत बाधाओं को रेखांकित कीजिए।
  • दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

दालें भारत की पोषण सुरक्षा का आधार हैं और लगभग 5 करोड़ किसान परिवारों का भरण-पोषण करती हैं। इसके बावजूद, विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बाद भी, भारत माँग और आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए आयात पर निर्भर है, जो खरीद, उत्पादकता और व्यापार नीति के ढाँचे में गंभीर कमियों को दर्शाता है।

भारत के दलहन क्षेत्र में ढाँचागत बाधाएँ 

  • MSP खरीद तंत्र की कमजोरी: चावल और गेहूँ के विपरीत, दालों में सुनिश्चित और बड़े पैमाने पर खरीद का अभाव है। मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत खरीद, कुल उत्पादन के केवल एक छोटे हिस्से को ही कवर करती है।
    • उदाहरण: 2019-24 के दौरान, खरीद उत्पादन के लगभग 3-12% के बीच ही रही, जिससे किसान बुवाई क्षेत्र बढ़ाने के लिए हतोत्साहित हुए।
  • अपर्याप्त खरीद बुनियादी ढाँचा: राज्यों में सीमित खरीद केंद्र होने के कारण किसान निजी व्यापारियों को MSP से कम कीमत पर दाल बेचने के लिए मजबूर हैं।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे वर्षा आधारित राज्यों में, आस-पास सरकारी एजेंसियों की अनुपस्थिति के कारण किसान अक्सर तुअर/अरहर को MSP से नीचे बेचते हैं।
  • वर्षा आधारित खेती और कम उत्पादकता: दालें मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में उगाई जाती हैं, जहाँ सिंचाई और तकनीक का उपयोग न्यूनतम है, जिससे पैदावार अस्थिर बनी रहती है।
    • उदाहरण: भारत में उत्पादकता कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में काफी कम बनी हुई है।
  • आयात-जनित मूल्य अस्थिरता: अचानक बड़े पैमाने पर आयात की अनुमति देने के सरकारी निर्णय घरेलू कीमतों को गिरा देते हैं, जिससे किसानों को हानि होती है।
  • व्यापार समझौते का दबाव: व्यापार वार्ताओं में प्रतिबद्धताएँ (जैसे, अमेरिकी दालों का संभावित आयात) नीतिगत अनिश्चितता और राजनीतिक विरोध की स्थिति उत्पन्न करती हैं।

दालों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उपाय

  • MSP के लिए विधिक या सुनिश्चित समर्थन: खाद्यान्नों के समान विस्तारित खरीद के साथ विश्वसनीय MSP गारंटी प्रदान करना।
    • उदाहरण: मूल्य समर्थन योजना (PSS) के दायरे को बढ़ाकर उत्पादन के कम-से-कम 25-30% तक मजबूत करना।
  • खरीद बुनियादी ढाँचे का विस्तार: खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाना और सहकारी समितियों तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से खरीद का विकेंद्रीकरण करना।
    • उदाहरण: प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को स्थानीय खरीद केंद्रों के रूप में उपयोग करना।
  • उत्पादकता वृद्धि में निवेश: दाल उगाने वाले क्षेत्रों में सिंचाई, जलवायु-अनुकूल बीजों और मशीनीकरण को बढ़ावा देना।
    • उदाहरण: वर्षा आधारित दलहन क्षेत्रों में ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) के तहत सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार।
  • स्थिर और पूर्वानुमेय आयात नीति: अचानक आयात उदारीकरण के बजाय संतुलित टैरिफ-रेट कोटा का उपयोग करना।
    • उदाहरण: घरेलू उत्पादन के पूर्वानुमानों से जुड़े पूर्व-घोषित आयात विंडो निर्धारित किए जाएँ।
  • बाजार प्रोत्साहन और विविधीकरण सहायता: लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए मूल्य शृंखला, प्रसंस्करण इकाइयाँ और प्रोटीन-आधारित उद्योगों का विकास करना।
    • उदाहरण: स्थिर माँग उत्पन्न करने के लिए दालों को मिड-डे मील जैसी पोषण योजनाओं से जोड़ना।

निष्कर्ष

भारत की दालों के आयात पर निर्भरता इसकी क्षमता की कमी को नहीं, बल्कि नीतिगत कमजोरी को दर्शाती है। विश्वसनीय खरीद गारंटी, उत्पादकता सुधारों और सावधानीपूर्वक तय किए गए व्यापार समझौतों के बिना, किसान अनिश्चितता के जाल में फँसे रहेंगे। स्थायी आत्मनिर्भरता और वास्तविक खाद्य सुरक्षा के लिए सामयिक आयात प्रबंधन के बजाय संरचनात्मक सुधार अनिवार्य हैं।

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