प्रश्न की मुख्य माँग
- राज्यों के बढ़ते ऋण के संरचनात्मक कारणों की चर्चा कीजिए।
- राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के उपाय सुझाइए।
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उत्तर
वर्ष 2026–27 तक भारत के लगभग आधे प्रमुख राज्यों के राजस्व घाटे में बने रहने का अनुमान है। बढ़ता ऋण-जीडीपी अनुपात राजकोषीय स्थिरता को कमजोर कर रहा है, विकासात्मक व्यय को सीमित कर रहा है तथा राज्यों की केंद्र पर निर्भरता बढ़ा रहा है, जिससे सहकारी संघवाद पर भी दबाव उत्पन्न हो रहा है।
राज्यों के बढ़ते ऋण के संरचनात्मक कारण
- राजस्व घाटा: राज्य वेतन, सब्सिडी और ब्याज भुगतान पर भारी व्यय करते हैं, जबकि नियमित कर एवं गैर-कर राजस्व अपर्याप्त रहते हैं, जिससे दैनिक खर्चों के लिए भी उधारी लेनी पड़ती है।
- उदाहरण: वित्त मंत्रालय की मासिक आर्थिक रिपोर्ट (MER) 2026 के अनुसार, 18 प्रमुख राज्यों में से 9 के वर्ष 2026 तक राजस्व घाटे में बने रहने का अनुमान है।
- कल्याणकारी योजनाओं का बोझ: कृषि ऋण माफी एवं लोकलुभावन योजनाओं के विस्तार से प्रतिबद्ध व्यय बढ़ता है, जबकि उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण नहीं होता, जिससे राजकोषीय स्थिरता कमजोर होती है।
- उदाहरण: पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बढ़ते सब्सिडी बोझ को RBI की स्टेट फाइनेंसेज रिपोर्ट्स में बार-बार राजकोषीय चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है।
- कमजोर कर आधार: GST क्षतिपूर्ति पर निर्भरता, स्वयं के कर संग्रहण की सीमित क्षमता तथा संपत्ति कर/उपयोगकर्ता शुल्क की कमजोरी राज्यों की स्वतंत्र राजकोषीय क्षमता को कम करती है।
- उदाहरण: GST क्षतिपूर्ति में देरी के कारण कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद अनेक राज्यों पर राजकोषीय दबाव बढ़ा।
- पूँजीगत निवेश पर कम लाभ: कमजोर क्रियान्वयन एवं कम प्रतिफल वाली परियोजनाओं हेतु लिया गया ऋण भविष्य में पर्याप्त राजस्व उत्पन्न नहीं कर पाता, जिससे विकास समर्थन के बिना ऋण संचय बढ़ता है।
- बजट से बाहर ऋण: राज्य सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) एवं सरकारी गारंटियों के माध्यम से वास्तविक देनदारियों को बजट से बाहर रखा जाता है, जिससे छिपा हुआ ऋण बढ़ता है और राजकोषीय प्रबंधन में पारदर्शिता कमजोर होती है।
- उदाहरण: FRBM समीक्षाओं में विद्युत DISCOM देनदारियों एवं गारंटियों को प्रमुख ऑफ-बजट राजकोषीय जोखिम बताया गया है।
राजकोषीय समेकन के उपाय
- राजस्व अनुशासन: उधारी को केवल पूँजी निर्माण तक सीमित रखा जाना चाहिए, जबकि नियमित व्यय का वित्तपोषण सामान्य राजस्व से किया जाना चाहिए, ताकि लगातार बने रहने वाले राजस्व घाटे से बचा जा सके।
- उदाहरण: FRBM ढाँचा सतत् राज्य वित्त के लिए राजस्व घाटे को समाप्त करने पर बल देता है।
- बेहतर कराधान व्यवस्था: जीएसटी अनुपालन में सुधार, संपत्ति कर को सुदृढ़ करना तथा डिजिटल कर प्रशासन का विस्तार कर राज्यों के स्वयं के राजस्व स्रोतों को बढ़ाया जाना चाहिए।
- उदाहरण: वित्त आयोग की सिफारिशें मजबूत नगर कराधान एवं बेहतर कर लोचशीलता (Tax Buoyancy) पर बल देती हैं।
- तर्कसंगत व्यय: अनावश्यक सब्सिडियों को कम कर सामाजिक अवसंरचना पर प्राथमिकता से व्यय किया जाना चाहिए, जिससे दीर्घकालिक विकास एवं ऋण चुकाने की क्षमता में सुधार हो।
- ऋण पारदर्शिता: RBI ने राज्यों के ऋण का यथार्थ मूल्यांकन सुनिश्चित करने हेतु बजट से बाहर की उधारियों को भी शामिल करने की सिफारिश की है।
- केंद्र–राज्य समन्वय: राजकोषीय परिषदों को सुदृढ़ करना तथा सहकारी उधारी सीमाओं को विकसित करना आवश्यक है, ताकि राजकोषीय अनुशासन और संघीय विश्वास दोनों बनाए रखे जा सकें।
निष्कर्ष
राजकोषीय समेकन का अर्थ कठोर मितव्ययिता नहीं, बल्कि अधिक विवेकपूर्ण सार्वजनिक वित्त प्रबंधन होना चाहिए, जहाँ राज्य अस्तित्व बनाए रखने के लिए कम और विकास के लिए अधिक उधारी लें। सतत् ऋण प्रबंधन न केवल आर्थिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है, बल्कि सहकारी संघवाद की भावना को बनाए रखने के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।