प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत की शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक कमियों का विश्लेषण कीजिए।
- इन संरचनात्मक कमियों के प्रभावों पर चर्चा कीजिए।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के संदर्भ में समाधानात्मक उपायों की व्याख्या कीजिए।
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उत्तर
परिचय
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत के केवल 54.81% स्नातक ही रोजगार योग्य (Employable) पाए गए। यह स्पष्ट करता है कि चुनौती केवल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप युवाओं को प्रासंगिक कौशलों से सुसज्जित करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भारत की शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक कमियाँ
- रटने पर आधारित शिक्षा: स्मरण पर अत्यधिक जोर विश्लेषणात्मक एवं समस्या-समाधान क्षमताओं को कमजोर करता है।
- उदाहरण: अनेक स्नातक कॉलेज से निकलने के बाद भी किसी विचार को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने या सरल समस्या को हल करने में असमर्थ पाए जाते हैं।
- कौशल असंतुलन: पाठ्यक्रम उद्योग की आवश्यकताओं एवं उभरती तकनीकों से पर्याप्त रूप से जुड़े नहीं हैं।
- उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार, लगभग आधे भारतीय स्नातक उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में आवश्यक रोजगार-संबंधी कौशलों के अभाव के कारण तुरंत रोजगार योग्य नहीं हैं।
- परीक्षा-केंद्रित संस्कृति: महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं की संस्कृति (Exam Culture) छात्रों को अवधारणात्मक अधिगम के बजाय कोचिंग-निर्भरता की ओर प्रेरित करती है।
- शिक्षण गुणवत्ता की कमी: शिक्षक प्रशिक्षण की कमी सीखने के परिणामों एवं क्षमता विकास को प्रभावित करती है।
- उदाहरण: UDISE+ 2023–24 के अनुसार, भारत में 1,00,166 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ केवल एक शिक्षक कार्यरत है।
- व्यावसायिक शिक्षा की कमी: व्यावसायिक शिक्षा मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा में सीमित है।
- उदाहरण: PLFS 2023–24 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 15–59 वर्ष आयु वर्ग के केवल 4.1% लोगों को औपचारिक व्यावसायिक/तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है।
भारत की शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक कमियों के प्रभाव
- स्नातक बेरोजगारी: कमजोर शिक्षण परिणाम और कौशल की कमी के कारण शिक्षित युवा उपयुक्त रोजगार प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।
- उदाहरण: PLFS 2023–24 के अनुसार, माध्यमिक एवं उससे उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में बेरोजगारी दर 6.5% है, जबकि निरक्षर व्यक्तियों में यह केवल 0.2% है।
- जनसांख्यिकीय बोझ: विश्व के सबसे बड़े युवा वर्ग को कौशलयुक्त न बना पाने से जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के बजाय यह एक बोझ में बदल सकता है।
- उदाहरण: भारत की 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है, जिससे कौशल विकास अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
- उत्पादकता में कमी: आवश्यक तकनीकी एवं विश्लेषणात्मक कौशल की कमी नवाचार और आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा को कमजोर करती है।
- सामाजिक तनाव: परीक्षा दबाव, शैक्षिक असफलता और अपेक्षाओं की पूर्ति न होने से मानसिक तनाव और सामाजिक असंतोष बढ़ता है।
- उदाहरण: NCRB के आँकड़ों के अनुसार, छात्र आत्महत्याएँ वर्ष 2013 में 8,423 से बढ़कर 2024 में 14,488 हो गईं (लगभग 72% वृद्धि)।
- असमानता में वृद्धि: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक असमान पहुँच सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को बढ़ाती है और सामाजिक गतिशीलता को सीमित करती है।
- उदाहरण: ASER रिपोर्ट 2024 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा V के 50% से अधिक छात्र कक्षा II स्तर का पाठ भी नहीं पढ़ सकते।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के आलोक में उपाय
- दक्षता-केंद्रित शिक्षा: रटने पर आधारित शिक्षा से आगे बढ़कर आलोचनात्मक चिंतन तथा अनुभवात्मक अधिगम को प्रोत्साहित किया जाए।
- उदाहरण: NEP-2020 दक्षता-केंद्रित पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन प्रणाली की वकालत करती है।
- व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण: विद्यालय स्तर से ही कौशल शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करना।
- उदाहरण: NEP-2020 का लक्ष्य वर्ष 2025 तक कम-से-कम 50% शिक्षार्थियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण का अनुभव प्रदान करना है।
- मूल्यांकन सुधार: मूल्यांकन प्रणाली को समग्र एवं अनुप्रयोग-आधारित बनाया जाए।
- उदाहरण: मूल्यांकन प्रक्रियाओं के मानकीकरण हेतु परख (PARAKH), 2023 की स्थापना की गई।
- शिक्षक विकास: व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं सतत् क्षमता निर्माण के माध्यम से शिक्षकों की गुणवत्ता को सुदृढ़ किया जाए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (National Professional Standards for Teachers – NPST) की शुरुआत की गई है।
- बहु-विषयक शिक्षा: भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप लचीली और विविध कौशल-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना।
- उदाहरण: अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (2021) बहु-विषयक शिक्षण मार्गों को सक्षम बनाता है।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश तभी सतत् एवं समावेशी विकास का आधार बन सकता है, जब शिक्षा प्रणाली युवाओं को केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि रोजगारयोग्य, नवाचारी और बदलती आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलनशील मानव संसाधन के रूप में विकसित करे। इस दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)-2020 का प्रभावी एवं समयबद्ध क्रियान्वयन शिक्षा को डिग्री-केंद्रित व्यवस्था से क्षमता-केंद्रित व्यवस्था में रूपांतरित करने की कुंजी सिद्ध होगा।