प्रश्न की मुख्य माँग
- विकास और जनसंख्या नियंत्रण के विभिन्न स्तरों को प्रदर्शित करने वाले राज्यों में समान प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर प्रकाश डालिये।
- “एक व्यक्ति, एक वोट” के आह्वान के साथ इस आवश्यकता को संतुलित करने की चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जनसांख्यिकीय विभाजन को दूर करने के उपाय सुझाइये।
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उत्तर
‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान मतदान शक्ति सुनिश्चित करता है। हालाँकि, विभिन्न विकास स्तरों और जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों में समान प्रतिनिधित्व के साथ इसे संतुलित करना, लोकतांत्रिक प्रणालियों के लिए एक गंभीर चुनौती है। उदाहरण के लिए, भारत इस मुद्दे से जूझ रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य, जिनकी आबादी अधिक है, उनका राजनीतिक प्रभाव अधिक है, जबकि कम आबादी वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व कम है। इस जनसांख्यिकीय विभाजन का समाधान करने के लिए चुनावी सुधार पर एक सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
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भिन्न विकास और जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों में समान प्रतिनिधित्व की आवश्यकता
- संघीय निष्पक्षता: समान प्रतिनिधित्व, विकास और जनसांख्यिकीय विविधताओं को मान्यता देकर संघीय सद्भाव सुनिश्चित करता है, जिससे भारत की लोकतांत्रिक संरचना की अभिन्न
विविधता को संरक्षित किया जा सके।
- उदाहरण के लिए: केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य जनसंख्या नियंत्रण के मामले में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्य हैं, लेकिन कम जनसंख्या अनुपात के कारण संसद में इनके राजनीतिक प्रभाव के कम होने का जोखिम है।
- जनसांख्यिकीय समता: जनसंख्या नियंत्रण की सफलता के लिए प्रतिनिधित्व को संतुलित करना आवश्यक है। प्रतिनिधित्व को संतुलित करने से देश की राजनीति में राज्यों का प्रतिनिधित्व भी नहीं कम होता और वे सतत प्रथाओं की ओर अग्रसर हो पाते हैं।
- उदाहरण के लिए: आंध्र प्रदेश की प्रजनन संक्रमण नीतियाँ, केवल जनसंख्या मानदंडों के आधार पर प्रतिनिधित्व को कम करने के बजाय एक उचित समता मॉडल के निर्माण को प्रेरित कर सकती हैं।
- विकास प्रोत्साहन: कम प्रजनन दर को विकास के एक संकेतक के रूप में मान्यता देने से उच्च जनसंख्या वृद्धि और धीमी प्रगति वाले क्षेत्रों के असंगत राजनीतिक प्रभाव को रोका जा सकता है।
- उदाहरण के लिए: उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले बिहार और उत्तर प्रदेश को केवल बड़ी जनसंख्या के आधार पर सीटें हासिल करने के बजाय विकासात्मक उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- क्षेत्रीय संतुलन: प्रतिनिधित्व समता, क्षेत्रीय असमानताओं का समाधान करने करने वाली समावेशी नीतियों को बढ़ावा देती है और यह सुनिश्चित करती है कि राष्ट्रीय शासन में उन्नत सामाजिक-आर्थिक सूचकांक वाले राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाए।
- उदाहरण के लिए: दक्षिणी राज्य प्रतिनिधित्व में जनसांख्यिकीय असमानताओं को संतुलित करने के लिए प्रवास को बढ़ावा देते हुए न्यायसंगत नीतियों का समर्थन करते हैं ।
- जनसंख्या घनत्व पर ध्यान: राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अन्य मापदंडों के साथ-साथ जनसंख्या घनत्व पर भी विचार करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सघन आबादी वाले लेकिन प्रगतिशील क्षेत्रों को राजनीतिक हाशिए पर न जाना पड़े।
- उदाहरण के लिए: प्रगति करने के बावजूद, दिल्ली और तमिलनाडु में, केवल गणना-आधारित दृष्टिकोण के तहत कम प्रतिनिधित्व का जोखिम है।
‘एक व्यक्ति, एक वोट’ और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व में संतुलन की चुनौतियाँ
- संघीय असंतुलन: जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का सख्त पालन उत्तर-दक्षिण विभाजन को बढ़ाता है, संघीय तनाव को उत्पन्न करता है और सहयोगात्मक नीति निर्माण में समझौता करता है।
- सफलता को हतोत्साहित करना: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आती है,यह एक प्रकार की विडंबना है जिसके कारण प्रगतिशील राज्य प्रजनन क्षमता में कमी की नीतियों को बनाए रखने से हतोत्साहित होते हैं।
- उदाहरण के लिए: प्रजनन क्षमता की सफलता के कारण संसदीय सीट में कमी के डर से आंध्र प्रदेश, जन्म-समर्थक नीतियों पर पुनर्विचार कर रहा है।
- अधिक प्रतिनिधित्व का जोखिम: अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र संघीय निर्णय लेने में हावी हो सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारत के सकल घरेलू उत्पाद और विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
- विकास संबंधी जड़ता: अनुपातहीन प्रतिनिधित्व के कारण विकास संबंधी जड़ता को बढ़ावा मिलने का खतरा है, क्योंकि उच्च प्रजनन क्षमता वाले क्षेत्र स्थायी सामाजिक-आर्थिक उन्नति की तुलना में राजनीतिक लाभ पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
- शासन संबंधी चुनौतियाँ: असमान प्रतिनिधित्व संसाधनों के आवंटन और विकास पर अधिक प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की ओर ध्यान केंद्रित करने के कारण कुशल शासन में बाधा उत्पन्न करता है।
- उदाहरण के लिए: अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को संसाधन आवंटित करने से केरल जैसे विकसित राज्यों के लिए कम संसाधन बचते हैं , जिससे राष्ट्रीय प्रगति प्रभावित होती है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जनसांख्यिकीय विभाजन को दूर करने के उपाय
- भारित प्रतिनिधित्व: संतुलित संघीय प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या के साथ-साथ HDI, साक्षरता और प्रजनन दर जैसे विकास सूचकांकों को ध्यान में रखकर सीटों का आवंटन करना चाहिए।
- उदाहरण के लिए: जर्मनी की संघीय प्रणाली जनसंख्या मीट्रिक से परे भूमि-विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर प्रतिनिधित्व को संतुलित करती है।
- प्रवासन को बढ़ावा देना: जनसांख्यिकीय और विकासात्मक असमानताओं को संतुलित करने के लिए अंतर-राज्यीय प्रवास को प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे प्रजनन-आधारित राजनीतिक समायोजन पर निर्भरता कम होगी।
- उदाहरण के लिए: दक्षिणी राज्य उत्तरी क्षेत्रों से कुशल प्रवास को बढ़ावा देते हैं, जिससे जनसांख्यिकीय असंतुलन कम होता है।
- संविधान संशोधन: प्रति व्यक्ति आय और स्वास्थ्य परिणामों जैसे गैर-जनसंख्या मानदंडों को परिसीमन में शामिल करने के लिए अनुच्छेद 82 को संशोधित करना चाहिए।
- उदाहरण के लिए: 15 वें वित्त आयोग ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अनुकूलनीय समता-आधारित संसाधन आवंटन मॉडल की सिफारिश की।
- प्रोत्साहन योजनाएंँ: प्रतिनिधित्व संबंधी अंतराल को कम करते हुए जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को बनाए रखने के लिए कम प्रजनन क्षमता बनाए रखने वाले राज्यों को विशेष अनुदान या प्रशासनिक विशेषाधिकारों से पुरस्कृत करना चाहिए।
- बहु-मीट्रिक दृष्टिकोण: समग्र सीट आवंटन सूत्र के लिए जनसंख्या घनत्व, प्रजनन दर, आर्थिक योगदान और सामाजिक संकेतकों को भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।
- उदाहरण के लिए: फ्राँस की चुनाव प्रणाली समतापूर्ण शासन के लिए क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक संकेतकों का उपयोग करके प्रतिनिधित्व को समायोजित करती है।
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राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जनसांख्यिकीय विभाजन को कम करने के लिए, एक गतिशील प्रतिनिधित्व मॉडल प्रस्तुत करना आवश्यक है जो जनसंख्या और विकास सूचकांक दोनों को ध्यान में रखता हो। भविष्य के चुनावी सुधारों में प्रतिनिधित्व के लिए बहुआयामी मानदंड शामिल होने चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि धीमी जनसंख्या वृद्धि या उच्च विकास वाले राज्यों का अधिक निष्पक्ष प्रतिनिधित्व हो। इसके अतिरिक्त, विकेंद्रीकृत निर्णय लेने को बढ़ावा देना और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाना, विविध राज्यों में समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को मजबूत करेगा।
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